नजरियाः पूर्वोत्तर भारत का चुनाव मोदी जीते हैं या मीडिया?

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- Author, मुकेश कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारतीय जनता पार्टी को अपनी बड़ी नाकामियों को छिपाने और छोटी उपलब्धियों को 'महाविजय' बताने में महारत हासिल है.
त्रिपुरा जैसे छोटे-से राज्य में विजय को वह 'विश्वविजय' की तरह प्रस्तुत कर रही है, जश्न मनाने में जुटी है जबकि मेघालय की नाकामी का ज़िक्र तक नहीं हो रहा है.
वह बड़ी चतुराई से ये भी छिपा रही है कि त्रिपुरा और नगालैंड में उसकी कामयाबी का श्रेय उसके सहयोगी दलों को जाता है न कि उसे.
उसने इस स्याह सचाई पर भी परदा डालने में कामयाबी हासिल की है कि पूर्वोत्तर को जीतने के लिए उसने कैसे-कैसे दलों से गठजोड़ किया है.
धन और चुनावी मशीनरी का बेजा इस्तेमाल के आरोप तो अपनी जगह हैं ही, और कांग्रेस भी कभी इन हथकंडों को पूर्वोत्तर भारत में अपनाती रही है.

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अलगाववादी संगठनों के साथ बीजेपी
कहा जा सकता है कि त्रिपुरा की बीजेपी दरअसल बीजेपी है ही नहीं, वह दूसरे दलों के लोगों का जमावड़ा है, बस उस पर बीजेपी का लेबल भर लगा है.
वैसे एक असम को छोड़ दें तो पूरे पूर्वोत्तर का यही हाल है.
हर जगह हेमंत बिश्व सरमा के तोड़-फोड़ से भाजपा ने अपनी राजनीतिक ताक़त खड़ी की है और सत्ता भी हथियाई है.
अरुणाचल प्रदेश का मामला तो पूरी तरह से दल-बदल पर ही आधारित है, मणिपुर पर सत्ता पर काबिज़ होने के लिए भी उसने जो कमाल दिखाया वो लोकतांत्रिक मानदंडों के अनुरूप तो नहीं ही था, वहाँ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी.
राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रवाद का दम भरने वाली बीजेपी ने त्रिपुरा में अगर अलगाववादी संगठनों से हाथ न मिलाया होता तो उसकी वही गत बन सकती थी जो पिछले चुनाव में हुई थी.

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आईपीएफटी की पहचान
वोटों के प्रतिशत में बहुत मामूली अंतर बताता है कि बीजेपी-आईपीएफटी (इंडिजिनस पीपल फ्रंट ऑफ त्रिपुरा) के कंधों पर सवार नहीं हुई होती तो वह जीत ही नहीं सकती थी.
ध्यान रहे आईपीएफटी की पहचान एक उग्रवादी संगठन के रूप में रही है और वह हिंसक गतिविधियों में लिप्त भी रहा है.
आईपीएफटी आदिवासियों के लिए अलग राज्य की माँग करता रहा है. उसने चुनाव के दौरान भी इसकी माँग दोहराई थी.
जीत के बाद भी उसका रवैया बदला नहीं है और उसने माँग कर डाली है कि आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए.
ये उसकी ओर से कड़ा संकेत है और आने वाले दिनों की राजनीति की ओर भी इशारा कर रहा है. दूसरे आदिवासी संगठन इस गठजोड़ को करीब से देख रहे हैं.

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जीत के जश्न में डूबा मीडिया
नगालैंड में बीजेपी ने नगालैंड जन विमुक्ति मोर्चे के साथ हाथ मिलाकर चुनाव लड़ा और अब सरकार बनाने की ओर अग्रसर है.
ये मोर्चा आज़ाद नगालैड की माँग का हिमायती रहा है और उसने अभी तक अपनी माँग छोड़ी नहीं है.
केवल दो सीटें जीतकर बीजेपी मेघालय में सरकार बनाने की जुगत में लगी है. जाहिर है कि ये जुगत से ही संभव होगा.
उस तरीके को लोकतांत्रिक और नैतिक तो नहीं कहा जा सकेगा.
इसे बीजेपी की शानदार कामयाबी के रूप में प्रचारित करना भारत के संविधान का अपमान नहीं तो और क्या है?

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हेडलाइन से ग़ायब मुद्दे
दुर्भाग्य ये है कि मीडिया बीजेपी के इस प्रचार अभियान की पताका लेकर चल रहा है. वह ऐसे बर्ताव कर रहा है मानो पूर्वोत्तर में बीजेपी की नहीं उसकी जीत हुई हो.
वह बीजेपी के जश्न में शामिल ही नहीं है बल्कि उसे राष्ट्रीय उत्सव के रूप में प्रस्तुत भी कर रहा है.
पीएनबी घोटाला, राफ़ेल सौदा और कोठारी घपला हेडलाइन से ग़ायब हो गए हैं.
पहले श्रीदेवी की मृत्यु और उसके बाद पूर्वोत्तर की जीत का जश्न मीडिया ने ऐसे मनाया मानो शोर पैदा करके बड़े मुद्दों को दबा देने की मंशा रही हो.

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तथ्यों को छिपा रहा मीडिया?
कायदे से होना चाहिए था कि मीडिया पूर्वोत्तर के चुनाव का ईमानदारी से पोस्टमार्टम करता. उन तथ्यों को रेखांकित करता जिन्हें जनता से छिपाया जा रहा है.
इससे भी आगे बढ़कर उसकी ज़िम्मेदारी तो ये बनती थी कि वो बताए कि पूर्वोत्तर में इस तरह की राजनीति के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं.
मीडिया के शोर में आज हमें ये भले ही न दिखाई दे रहा हो, मगर संघ परिवार पूर्वोत्तर में राजनीतिक आधार बनाने का जो अभियान चला रहा है उसके नतीजे जल्दी ही सामने आने शुरू होंगे क्योंकि बड़ी ईसाई और मुस्लिम आबादी वाले इलाक़ों में हिंदू वर्चस्व की स्थापना प्रेम और शांति से तो नहीं ही होगी.
पूर्वोत्तर की राजनीति हमेशा से अस्थिर रही है. अभी जो कुछ हो रहा है वह कोई स्थायी परिवर्तन नहीं है लेकिन सत्ता के जो नए समीकरण बनाए जा रहे हैं, वे क्षेत्र की राजनीति को और भी संकटपूर्ण बना सकते हैं.

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नेतृत्व की जय जय
मीडिया के एकतरफ़ा कवरेज ने विपक्षी दलों को भी बचाव की मुद्रा में ला रखा है.
एक तो उन्हें उतनी जगह ही नहीं दी जाती और अगर दी भी जाती है तो नकारात्मक अंदाज़ में.
रणनीति यही होती है कि विपक्षी दलों को नाकारा साबित करके बीजेपी और उसके नेतृत्व की जय जय की जाए.
मीडिया का ये रुख़ लोकतंत्र में उसके लिए निर्धारित की गई भूमिका के विरूद्ध है.
विरोध और प्रतिरोध को जगह न देकर वह निरंकुशता को मज़बूत कर रहा है जिसके ख़तरे बहुत गंभीर हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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