बिहार में पकड़ौआ विवाह में फिर आई तेज़ी

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
"हम पांच बहनें थीं. एक को छोड़कर बाकी सब की शादी पकड़ौआ विवाह से हुई." ये बताते हुए 48 साल की पूनम के होंठ सिर्फ़ बंद और खुल रहे थे, लेकिन दिमाग़ साल 1984 से 1991 के बीच घटी घटनाओं पर जा चिपका था.
साल 1984 में वो सातवीं में ही तो पढ़ती थीं जब नौंवीं में पढ़ने वाले मनोज से उनकी शादी हुई. मनोज को पूनम के घरवाले और कुछ लठैत लोग अपने साथ बहला-फुसला कर ले आए थे. पूरा एक दिन मनोज को कमरे में बंद रखा गया और दूसरे दिन रीति रिवाज़ के साथ शादी. तिलमिलाए मनोज के परिवार ने पूरे सात साल तक पूनम को नहीं अपनाया, लेकिन बाद में जब अपनाया तो पूरे प्रेम के साथ.
बिहार के बेगूसराय की पूनम बताती हैं, "पिताजी की ग़लती थी. पकड़ के शादी करने पर उनकी ज़िम्मेदारी तो ख़त्म हो गई, लेकिन अगर ये दूसरी शादी कर लेते तो? किस्मत अच्छी थी कि ससुराल अच्छा था. सास ने मुझे मां का प्यार दिया और पति ने सम्मान."
तीन बच्चों की मां पूनम दिल्ली में रहती हैं जहां उनके पति मनोज सरकारी कर्मचारी हैं. लेकिन बिहार में प्रचलित सभी पकड़ौआ विवाह की ऐसी 'हैप्पी एंडिंग' नहीं होती.

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क्या है पकड़ौआ विवाह?
पकड़वा या पकड़ौआ विवाह यानी वो विवाह जिसमें शादी योग्य लड़के का अपहरण करके उसकी जबरन शादी करवाई जाती है. कुछ साल पहले इसी विषय पर एक फ़िल्म और भाग्यविधाता नाम का सीरियल आया था. 80 के दशक में उत्तर बिहार में ख़ासतौर पर बेगूसराय में पकड़ौआ विवाह के मामले ख़ूब सामने आए.
आलम ये था कि बाकायदा हर सात से आठ गांव पर इसके लिए गिरोह चलते थे और शादी के सीज़न में इनकी बहुत डिमांड रहती थी. इंटर की परीक्षा देते छात्र, नौकरीपेशा लड़कों को ख़ास ताकीद दी जाती थी कि वो शादी के सीज़न में जल्दी घर से नहीं निकलें.
बीती 23 जनवरी को सहरसा में एक 17 वर्षीय छात्र का अपहरण करके 23 साल की युवती से जबरन शादी करा दी गई थी. इस मामले में बख्तियारपुर थाने में रिपोर्ट भी दर्ज की गई है.
बेगूसराय के जी डी कॉलेज में प्रोफ़ेसर मदन मोहन चक्रवर्ती कहते हैं, "बेगूसराय को लेनिनग्राद भी कहा जाता है, इसलिए किसी भी समस्या के ख़िलाफ़ विद्रोह का भी ये केन्द्र है. ये भूमिहार बहुल इलाक़ा है और इस समाज में दहेज बहुत चलता है. इसी दहेज के ख़िलाफ़ सामाजिक परिवर्तन के लिए गैर कानूनी ही सही, लेकिन लोगों ने ये तरीका अपनाया. आज भी शादी के सीज़न मे दो से तीन फ़ीसदी शादियां पकड़ौआ विवाह ही होती हैं."

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बंदूक तानकर मंडप पर बैठाना
हालांकि दहेज के ख़िलाफ़ होने का नाम लेकर हो रहे इन पकड़ौआ विवाह का दंश सबसे ज्यादा दूल्हा और दुल्हन को ही भोगना पड़ता है. दरभंगा की कमला की शादी उनके पिता ने जबरन करवाई थी. सामाजिक दबाव में ससुराल वालों ने उन्हें अपना तो लिया, लेकिन दिल में कसक अभी भी कायम है.
कमला बताती है, "हर वक्त मन में ग्लानि महसूस होती है और डर भी लगता है कि जाने कौन-सी बात पर घर वाले बिगड़ जाएं. अपने परिवार वाले का किया हम भोगने को मज़बूर हैं."
ऐसी शादियों में दूल्हे की स्थिति का अंदाज़ा आप सहरसा के 27 साल के आलोक से बातचीत करके लगा सकते हैं. 13 मई, 2012 को आलोक के एक दोस्त ने पार्टी का लालच देकर उनका अपहरण कर लिया. 10 की संख्या में लोगों ने बंदूक तानकर मंडप पर बैठाया और जबरन शादी करवा दी.

'मेरे लिए डरावना सच'
आलोक बताते हैं कि तीन साल तक वो समाज से लड़ते रहे, लेकिन आख़िरकार खुद के ऊपर 'थोपी' हुई कम पढ़ी लिखी दुल्हन को सामाजिक दबाव के चलते विदा कर ले आए.
दो बच्चों के पिता आलोक कहते हैं, "दिल तो अभी भी कटा-कटा रहता है. किसी की भी ज़िंदगी के लिए शादी यादगार होती है, मेरे लिए तो वो डरावना सच है."
बता दें कि जहां सामाजिक दबाव में इन शादियों को मान्यता मिलती है वहीं अब तेज़ी से इन्हें ख़ारिज भी किया जा रहा है. हाल ही में मोकामा में बीती 3 दिसंबर को पेशे से इंजीनियर विनोद की शादी जबरन करवा दी गई थी जिसका वीडियो वायरल हुआ था. विनोद ने ये शादी मानने से इंकार कर दिया.
बातचीत में उन्होंने कहा, "जबरन भैंस से शादी करवा देंगे तो क्या उसे भी मैं अपनी बीवी मान लूंगा? और इन मामलों मे पुलिस की मिलीभगत रहती है. कोई एफ़आईआर नहीं होती, इसलिए इन लोगों का मन बढ़ा हुआ है."
दिलचस्प है कि बीते चार सालों में पकड़ौआ विवाह के मामले बढ़े हैं. बिहार पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों के मुताबिक साल 2014 में 2526, 2015 में 3000, 2016 में 3070 और नवंबर 2017 तक 3405 शादी के लिए अपहरण हुए. ग़ौरतलब है कि इसमें प्रेम प्रसंग में घर से भागने वाले प्रेमी युगल का आंकड़ा शामिल नहीं है.
अगर प्रेम प्रसंग में भागने वालों का आंकड़ा भी शामिल कर दिया जाए तो बिहार में होने वाले कुल अपहरण का 70 फ़ीसदी सिर्फ़ प्रेम या शादी के लिए होता है. राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो 2015 की रिपोर्ट भी कहती है कि बिहार मे 18 से 30 साल के युवकों का सबसे ज़्यादा अपहरण हुआ. ये देश में इस उम्र समूह में हुए अपहरण का तक़रीबन 16 फ़ीसदी है.

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पटना स्थित ए. एन. सिन्हा संस्थान के पूर्व निदेशक डी. एम. दिवाकर कहते हैं, "पकड़ौआ विवाह का इतिहास 100 साल से भी ज़्यादा पुराना है. लेकिन अभी उसमें उछाल आने की चार वजहें प्रमुख हैं.
पहला तो पूंजी के दबाव में दहेज का विकराल चेहरा हमारे सामने है, दूसरा लड़कियों की अशिक्षा, तीसरे गैर कृषि व्यवसाय में दूल्हे की चाहत लगातार बढ़ रही है और चौथी ये है कि सामाजिक ताने-बाने में जातीय जकड़ अभी भी कायम है."
दिलचस्प है कि पकड़ौआ विवाह में उछाल ऐसे वक्त में सामने आ रहा है जब बिहार सरकार दहेजबंदी का एजेंडा ले कर ज़ोर-शोर से कार्यक्रम चला रही है.














