क्या चीफ़ जस्टिस को हटाने की तैयारी कर रहा है विपक्ष?

चीफ जस्टिस दीपक मिश्र

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जनवरी के दूसरे हफ़्ते में सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने एक संवाददाता सम्मेलन कर कहा था कि देश की सर्वोच्च अदालत में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा.

सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ.

उस वक़्त चारों न्यायाधीशों से सवाल पूछा गया कि आप मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाना चाहते हैं? इस पर जस्टिस चेलमेश्वर ने जवाब दिया था कि ये देश को तय करना है.

अब देश के मुख्य न्यायाधीश को हटाने की चर्चा की पहल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी ने की है.

सुप्रीम कोर्ट

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बीबीसी से बातचीत में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने इस बात की पुष्टि की.

सीताराम येचुरी ने कहा, "अभी तक निर्णय नहीं हुआ है, लेकिन विपक्षी पार्टियों के साथ इस पर चर्चा ज़रूर चल रही है."

येचुरी के मुताबिक़, "दो हफ़्ते का वक्त गुज़र चुका है, जब से सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ गंभीर शिकायत की. हम चाहते थे इसका हल खुद न्यायपालिका निकाले लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है."

येचुरी ने आगे कहा, "ऐसे में लोकतंत्र के दूसरे दो महत्वपूर्ण अंग विधायिका और कार्यपालिका की ज़िम्मेदारी बनती है कि इस मामले को सुलझाए. मतलब ये कि दायित्व अब सरकार और संसद पर है.

येचुरी के मुताबिक़ "इसलिए हमने सोचा कि इस पर चर्चा हो, लेकिन अभी तक ऐसे प्रस्ताव पर कोई निर्णय नहीं हुआ है."

राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी

भाजपा का पक्ष

विपक्ष के इस आने वाले प्रस्ताव पर बीबीसी ने बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी से बात की.

उनके मुताबिक़, "कोई भी ऐसा प्रस्ताव मज़ाक के अलावा और कुछ नहीं है. उनको हटाने के लिए मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ एक चार्ज होना चाहिए. देश के मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ कौन सा चार्ज है, विपक्ष पहले ये तो बताए?"

स्वामी ने बीबीसी से बातचीत में कई और कारण गिनाए जिनकी वजह से वो विपक्ष के महाभियोग की पहल को हास्यास्पद बता रहे हैं.

उनके मुताबिक़, "विपक्ष के पास इस तरह का कोई प्रस्ताव लाने के लिए ज़रूरी संख्या भी नहीं है. इतना ही नहीं येचुरी का खुद पार्टी में कोई सपोर्ट नहीं है. कल को उनकी पार्टी ही उनकी लाइन से ख़ुद को अलग कर ले तो फिर क्या होगा?"

सुब्रमण्यम स्वामी के मुताबिक़ कांग्रेस किसी भी सूरत में इस प्रस्ताव पर सीताराम येचुरी का साथ नहीं देगी.

ये पूछे जाने पर कि स्वामी को इस बात को लेकर कांग्रेस पर इतना भरोसा क्यों है, स्वामी कहते हैं, "कांग्रेस को पता है कि वो इस मुद्दे पर पिटेगी. अभी रामजन्मभूमि पर वो पीछे हटे हैं. पहले वो इस मुद्दे पर बहुत आक्रामक थे. फिर जनता का मूड देख कर पीछे हट लिए. राहुल आज कर्नाटक के मुख्यमंत्री को कहते हैं कि हिंदू टेरर की बात न करो, वो जानते हैं देश में आज हिंदुत्व का माहौल है."

चीफ जस्टिस दीपक मिश्र

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क्या है नियम?

देश के मुख्य न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया क्या है, इस पर बीबीसी ने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप से बात की.

उनके मुताबिक़, "महाभियोग का प्रावधान देश के संविधान में सिर्फ़ राष्ट्रपति के लिए है और किसी के लिए नहीं है. इसलिए इस शब्द का इस्तेमाल ही ग़लत है."

तो फिर मुख्य न्यायाधीश को कैसे हटाया जा सकता है? इस पर उन्होंने बीबीसी को बताया कि मुख्य न्यायाधीश को हटाने के लिए अलग प्रक्रिया है.

उनके मुताबिक़, "संविधान की धारा 124 में मुख्य न्यायाधीश को हटाने का प्रावधान है. इसके मुताबिक़ संविधान का उल्लंघन करने पर उन्हें हटाया जा सकता है".

सुभाष कश्यप के मुताबिक़, "दोनों सदनों में से एक सदन में कार्यवाही शुरू हो सकती है. लोकसभा में 100 सदस्यों को मुख्य न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने होंगे और राज्यसभा में 50 सदस्यों की सहमति की ज़रूरत पड़ती है."

सुभाष कश्यप आगे बताते हैं, "इसके बाद एक जांच कमेटी बैठती है, वो कमेटी अपनी रिपोर्ट संसद को देती है, उसके बाद ही प्रस्ताव पर दोनों सदनों में वोटिंग होती है. मुख्य न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए दो तिहाई बहुमत की ज़रूरत होती है, जिसके बाद उस प्रस्ताव को राष्ट्रपति को भेजा जाता है.

फिर राष्ट्रपति के आदेश के बाद ही मुख्य न्यायाधीश को हटाया जा सकता है."

जस्टिस सौमित्र सेन

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इतिहास में कब-कब हुआ ऐसा?

कोलकाता उच्च न्यायालय के जस्टिस सौमित्र सेन को हटाने के लिए पहली बार 2011 में राज्यसभा में प्रस्ताव लाया गया था.

तब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी और प्रशांत चटर्जी के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के नेता अरुण जेटली ने ये प्रस्ताव पेश किया.

राज्यसभा के इतिहास में वो पहला मौक़ा था, जब किसी जस्टिस को हटाने के लिए प्रस्ताव लाया गया.

इससे पहले लोकसभा में भी जस्टिस को हटाने के लिए एक बार प्रस्ताव लाया जा चुका है.

वर्ष 1993 में जस्टिस वी रामास्वामी के ख़िलाफ़ लोकसभा में लाया गया प्रस्ताव गिर गया था, क्योंकि कांग्रेस सदस्यों ने सदन का बहिष्कार कर दिया था.

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