अमित शाह का 150+ का दावा, कर पाएगी बीजेपी?

अमित शाह

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    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

आज पूरे देश की नज़रें गुजरात विधानसभा चुनावों की तरफ हैं जहां हफ़्ते भर बाद वोटिंग होने वाली है.

अपने ही गृह राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक साख दांव पर लगी हुई है और कई विश्लेषकों का मानना है कि इस बार लोग उनसे खफ़ा हैं और चुनावी नतीजों में ये बात सामने आएगी.

उधर, राहुल गांधी और गुजरात के तीन युवा नेताओं (हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवाणी) को वहां काफ़ी समर्थन मिलता दिख रहा है. कई लोग मानते हैं कि ये चारों इस बार भाजपा को कड़ी टक्कर देने वाले हैं.

लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को पूरा भरोसा है कि गुजरात में उनकी पार्टी 150 सीटों से अधिक पर जीतेगी. हाल में 151वें नंबर के चुनाव क्षेत्र वग्रा में अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए शाह ने कहा था, "मुझे पूरा यकीन है कि दिसंबर में होने वाले चुनाव में हम 151 सीटें अपने खाते में डाल सकेंगे."

हाल में उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा, "150 से अधिक सीटों पर जीत कर भाजपा ही सरकार बनाने जा रही है. मैं इस बात पर ग़लत नहीं हो सकता."

गुजरात

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दावे की वजह?

राजनीतिक विश्लेषक विद्युत ठाकर मानते हैं 151 सीटें तो नहीं लेकिन यहां भाजपा के हाथ से बहुमत छिन जाए, ऐसा तो इस बार नहीं होने वाला. वो कहते हैं कि इस बार भाजपा के खाते में 115 से 120 सीटें तो ज़रूर आएंगी.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि अमित शाह के इस दावे के पीछे तीन बड़े कारण हैं. वो कहते हैं, कि बीजेपी के पास तीन-चार ऐसे शस्त्र हैं जिनका उत्तर कांग्रेस के पास नहीं है.

वो कहते हैं, "पहला तो ये कि नरेंद्र मोदी गुजरात की अस्मिता का प्रतीक हैं वो हुकुम का इक्का है या कहें तो पार्टी का ट्रंप कार्ड हैं. वो गुजरात के लोगों पर इस कदर छाए हुए हैं कि उनकी बात चलेगी."

अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी

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इमेज कैप्शन, अल्पेश ठाकोर, हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी

कमिटेड वोटबैंक

विद्युत ठाकर मानते हैं कि हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर ने कांग्रेस के पक्ष में एक माहौल तो पैदा किया है लेकिन कांग्रेस उसका लाभ उठाने के लिए तैयार ही नहीं हैं.

वो कहते हैं, "मोदी के पास एक बड़ी मशीनरी है, कार्यकर्ताओं की बड़ी फ़ौज है जो लोगों के पास जा कर उन तक संदेश पहुंचा सके. भाजपा के विरोधियों के पास ऐसी मशीनरी है ही नहीं."

तीसरा कारण वो ये बताते हैं कि भाजपा के पास यानी मोदी के पास एक कमिटेड वोटबैंक हैं जो उन्हीं को वोट देगा. वो कहते हैं इस वोटबैंक को "इस बात से कोई मतलब नहीं है कि चुनाव में उम्मीदवार कौन हैं."

जिग्नेश मेवाणी

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युवा नेता कहां हैं प्रचार में?

विद्युत ठाकर कहते हैं कि युवा नेताओं की तरफ़ उम्मीद से देखने का कोई मतलब रह ही नहीं गया है क्योंकि दो युवा नेता अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी अपने ही चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं.

उन्होंने कहा, "इन दो नेताओं ने चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया है और भाजपा ने इन्हें स्थानीय मुद्दों में उलझा कर रखा है. वो अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर निकल नहीं पा रहे हैं, तो प्रचार कैसे करेंगे."

वो मानते हैं कि बीते 22 साल से गुजरात में बहुमत से फासले पर रही कांग्रेस को पहली मर्तबा जीत की उम्मीद बंधी है लेकिन वो इस बार भी जीत नहीं पाएगी.

वो कहते हैं, "150 सीट शायद बीजेपी न जीत पाए लेकिन सरकार तो उसकी बनेगी, इसमें कोई शंका नहीं है. 2012 के चुनावों में भाजपा के खाते में 115 सीटें आई थीं, उससे कम तो वो इस बार नहीं लाएगी."

ईवीएम

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'ज़मीनी हक़ीकत कुछ और है'

अहमदाबाद में वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दयाल मानते हैं कि अमित शाह का आत्मविश्वास गुजरात की ज़मीनी हक़ीक़त से अलग दिखता है. दरअसल, भाजपा की स्थिति यहां ख़राब है.

वो कहते हैं कि अमित शाह के 150 से अधिक के आंकड़े तक पहुंचने के दावे को लेकर गुजरात में चर्चा शुरू हो गई है और इसमें ईवीएम के साथ छेड़छाड़ को ले कर बातें सामने आ रही हैं.

वो कहते हैं, "लोग अब इस पर बात करने लगे हैं कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए ईवीएम के साथ छेड़छाड़ कर सकती है. उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद और पहले भी भाजपा पर ऐसे आरोप लगे हैं."

आम आदमी पार्टी

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इमेज कैप्शन, उत्तर प्रदेश निकाय चुनवों के बाद आम आदमी पार्टी की प्रेस कॉ़न्फ्रेंस

ईवीएम का मुद्दा

इसी हफ़्ते उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों के नतीजे आने के बाद आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया था कि जहां पर बैलट पेपर से चुनाव हुए वहां आम आदमी पार्टी जीती है.

पार्टी का दावा था कि दूसरे दलों को मिलने वाले वोट का एक फ़ीसदी वोट चुरा कर दूसरी पार्टी में जोड़ दिया जाता है.

प्रशांत दयाल कहते हैं, "फिर से चर्चा हो रही है कि अगर मैदानी हक़ीक़त कुछ और है और अमित शाह दावा करते हैं कि वो 151 सीटें ले कर आएंगे तो लोगों को आशंका है कि ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है. लेकिन ऐसा कोई आधार नहीं है जहां पर चुनाव हुए वहां पर भाजपा ने ईवीएम के साथ छेड़छाड़ की हो."

वो मानते हैं कि शहरी इलाकों में भाजपा के लिए उतनी मुश्किल नहीं है जितना ग्रामीण इलाक़ों में. उनका कहना है कि दोनों जगहों लोगों के मुद्दे अलग-अलग हैं शहरी वोटर्स के लिए समस्या रोज़गार, पानी, बिजली या सड़कें नहीं हैं.

राहुल गांधी

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इमेज कैप्शन, अहमदाबाद से करीब 25 किलोमीटर दूर रस्का गांव में राहुल गांधी

ग्रामीण इलाक़ों में नाराज़गी अधिक

प्रशांत दयाल की राय में, "यहां लोगों के मन में असुरक्षा की भावना है. भाजपा ने लोगों के मन में डर डाला हुआ है कि कांग्रेस गई तो गुजरात में फिर से दंगे हो जाएंगे और कर्फ्यू लग जाएगा. शहरी वोटर अपनी सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है."

ग्रामीण वोटर के बारे में प्रशांत दयाल कहते हैं कि "अभी तक भाजपा का दावा था और ग्रामीण इलाक़ों के वोटर मानते थे कि उनके इलाक़ों की जो स्थिति है उसके लिए कांग्रेस ज़िम्मेदार है.

"लेकिन अब वो ये सवाल कर रहे हैं कि पिछले 22 सालों से प्रदेश में सत्ता पर भाजपा विराजमन है और बीते तीन साल से केंद्र में मोदी हैं. अब जब भाजपा कांग्रेस पर आरोप लगाती है तो लोगों को ये बात हजम नहीं होती."

वो कहते हैं "वो अब भाजपा के आरोप से सहमत नहीं होते और इस कारण अब करीब-करीब सभी ग्रामीण इलाक़े भाजपा के हाथ से निकल रहे हैं."

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