क्या कांग्रेस की तंगहाली चुनाव हारने का कारण बन सकती है?

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- Author, अपर्णा द्विवेदी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
साल 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस की क़रारी हार के बाद मध्यप्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव काफ़ी परेशान थे. उनकी चिंता की वजह ये थी कि पार्टी राज्य कार्यालय के रख रखाव के लिए धन कैसे जुटाया जाए.
पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे अरुण यादव ने फ़ैसला किया कि भोपाल में पार्टी के दो मंजिला जवाहर भवन के एक हिस्से को किराए पर चढ़ा देंगे ताकि छह या सात लाख रुपये प्रति माह का किराए आने पर पार्टी कार्यालय के मासिक व्यय को पूरा किया जा सकेगा.
उन्होंने तो ये उपाय कर अपनी चिन्ता का समाधान कर दिया लेकिन कांग्रेस की बुरी स्थिति ने एक बार फिर सबको उसी चिन्ता में डाल दिया.

"पार्टी फंड पर निर्भर न हों उम्मीदवार"
अब ये चिन्ता सिर्फ अरुण यादव की नहीं रही बल्कि कांग्रेस के करीब करीब सारे प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी अधिकारियों की है. क्योंकि अब ये साफ़ हो गया है कि कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त धन नहीं है.
कांग्रेस ने गुजरात विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों को कहा है कि वो पार्टी फंड पर निर्भर ना हो. और तो और कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के खर्चों पर भी भारी कटौती की है. ये पहली बार है कि इन चुनावों में कांग्रेस ने किसी सोशल मीडिया कंपनी की मदद नहीं ली है.
इस बार ये काम कांग्रेस की अपनी सोशल मीडिया टीम कर रही है. हालांकि कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी इसे कटौती नहीं मान रहे हैं. उनका मानना है कि पार्टी आत्मनिर्भर हो रही है.
हालांकि पार्टी के पास धन की किल्लत का मुद्दा बार बार उठ रहा है. साल 2017 के शुरुआत में पांच राज्यों - उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के चुनाव हुए.
इनमें से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला तो पंजाब में कांग्रेस ने बाजी जीती. गोवा में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. कुल 40 सीटों में से कांग्रेस के खाते में 17 सीटें गई हैं जबकि सत्तारूढ़ बीजेपी को 13 सीटें ही मिली हैं.
मणिपुर में भी स्थिति गोवा जैसी ही है. वहां भी किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. यहां सरकार बनाने के लिए कम से कम 31 सीटों की ज़रूरत है जबकि कांग्रेस को 28 सीटें मिली हैं और बीजेपी के खाते में 21 सीटें गई हैं.
मजे की बात थी कि कांग्रेस दोनों राज्यों गोवा और मणिपुर में ज़्यादा सीटों के बावजूद सरकार नहीं बना पाई. बीजेपी ने कांग्रेस के हाथों से दोनों राज्यों के अपनी तरफ़ खींच लिया और सरकार बना ली. बीजेपी की इस झपटमारी के पीछे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दबे दबे स्वरों में पार्टी में संसाधनों की कमी को ज़िम्मेदार मानते हैं.

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संसाधनों की कमी
आंकड़ों पर नजर डाले तो राजनीतिक सुधारों के क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस को साल 2012 से साल 2016 के बीच मिलने वाले कारपोरेट फंड में भारी कमी आई है. कांग्रेस को मात्र 198.16 करोड़ मिले जबकि बीजेपी को 705.81 करोड़ मिले.
ये आंकड़ा कांग्रेस के लिए सबसे ज़्यादा डराने वाला है. क्योंकि कांग्रेस ज़्यादातर कॉरपोरेट फंड पर निर्भर करती थी. लेकिन कांग्रेस के ख़जाने में तेजी से कमी आ रही है. पार्टी को मिलने वाले डोनेशन में कमी आई है.
कांग्रेस का रिजर्व फंड सूखता जा रहा है. ट्विटर पर इस तरह की भी खबरें हैं कि कांग्रेस को ओवरड्रॉफ्ट की मदद लेनी पड़ रही है. यही नहीं पार्टी नेताओं को फंड इकठ्ठा करने के निर्देश दिए गए हैं.
बताया जा रहा है कि विपक्ष में आने के बाद कांग्रेस को पहली बार ऐसी हालात का सामना करना पड़ रहा है. क्या कारण है कि पार्टी में फंड की इतनी कमी आ गई है.

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एक के बाद एक राज्यों को गंवाना
जब शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह की सरकारों का समय ख़त्म होगा तो कांग्रेस को मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से बाहर हुए 15 साल हो जाएंगे. ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु में तो वे साहसी विपक्षी दल होने की साख खो चुके हैं.
1977, 1989, 1996 और 1998 में सत्ता गंवाने के बाद भी कांग्रेस के पास विधायकों की संख्या में कमी नहीं आयी. राज्यों में कांग्रेस अपनी सरकारों की मौजूदगी के बाद केंद्र पर सत्ता हासिल करने में कामयाब रही.
लेकिन मौजूदा समय में कांग्रेस के पास विधायकों की संख्या में कमी आयी है. देश के बड़े सूबों से कांग्रेस साफ़ हो चुकी है. कुल पांच राज्यों में काबिज कांग्रेस के पास मात्र दो बड़े राज्य हैं.
हालांकि कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा इसे गंभीर समस्या नहीं मानते. उनका मानना है कि अगर पार्टी ओवरड्राफ्ट में चल भी रही हैं तो इसमें कोई हर्ज नहीं है.
इस समस्या से निपटने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की तंगहाल हालात का जायजा लेने के लिए एक उप-समिति के गठन की बात की है जो कि ना सिर्फ कारणों का जायजा लेगी बल्कि उससे निपटने के लिए उपाय भी बताएगी.
साथ ही कांग्रेस पदाधिकारियों का मानना है कि अब कांग्रेस उम्मीदवारों को फंड के मामले में आत्मनिर्भर होना चाहिए.
कांग्रेस इस समस्या को दो तरह से निपटने में लगी है. एक अपने खर्चे को समेटने में और दूसरा पार्टी फंड को बढ़ाने में जुट गई है.

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खर्चों पर रोक
कांग्रेस कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने अपने केन्द्रीय कार्यालय और विभिन्न राज्य इकाइयों को चलाने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को ख़र्च पर कटौती करने के निर्देश जारी कर दिए हैं. साथ ही कांग्रेस के सदस्यों को पार्टी के खजाने में अपना योगदान बढ़ाने के लिए कहा गया है.
पार्टी के पदाधिकारी को उनकी यात्रा और मनोरंजन ख़र्चों को छोड़ने के लिए कहा गया है. उदाहरण के लिए, पार्टी महासचिव को हर महीने 15,000 रुपये का ईंधन भत्ता मिलता है.
ऐसे पार्टी महासचिव को कि सांसद भी हैं उनका ईंधन भत्ता रद्द कर दिया गया है और सांसद में मिलने वाली सुविधा में इस खर्चे को डाल दिया गया है.
साथ ही पार्टी सचिवों को सूचित किया गया है कि वे विमान किराया के हकदार नहीं हैं और इसके बजाय ट्रेन को ले जाना होगा. पार्टी के ख़र्चे पर चार्टर्ड उड़ानें पूरी तरह से मना है.

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फंड इकट्ठा करने के नए उपाय
2004 में कांग्रेस ने सरकार की स्थापना से पहले, पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी, जिसने पार्टी के भीतर फंड जुटाने और वित्तीय आवंटन के तरीके सुझाए थे.
इस समिति ने सिफ़ारिश की थी कि प्रत्येक सक्रिय सदस्य को राज्य इकाई को हर साल 100 रुपये का योगदान देना चाहिए. इस व्यवस्था ने लोगों को पार्टी से जोड़ा और साथ ही फंड की कमी को भी पूरी की लेकिन वर्तमान व्यवस्था में ये फंड पार्टी की बढ़ती मांगों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं.
नए उपायों में कांग्रेस ने सभी सदस्यों को पार्टी की किट में हर साल 250 रुपये का योगदान करने के लिए कहा है. यह उस 100 रुपये से अतिरिक्त है जो पहले से प्रत्येक सदस्य को देना होता था.
साथ ही पार्टी हर राज्य में 100 सदस्यों की पहचान करने की प्रक्रिया में भी जो एक लाख रुपए का दान दे सकें ताकि पार्टी की राज्य इकाइयों के खर्चों को पूरा किया जा सके.
हाल फ़िलहाल में हर कांग्रेस सांसद और राज्य के विधायक को संगठन में एक माह का वेतन देना है. साथ ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य को पार्टी में प्रतिवर्ष 600 रुपये का योगदान करना पड़ता है, जबकि प्रदेश कांग्रेस समिति के सदस्य राज्य इकाई में 300 रुपये देते हैं.

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कॉरपोरेट दान
कांग्रेस के फंड काफी कुछ कॉरपोरेट द्वारा दिए गए दान पर निर्भर होते थे. लेकिन 2014 की हार के बाद हार का सिलसिला थमा नहीं.
आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा में पार्टी की हार के बाद तो कांग्रेस के लिए उद्योगपतियों के पैसे का प्रवाह सूख गया है.
कांग्रेस वर्तमान में मात्र पांच राज्यों में सत्ता में है लेकिन यह केवल नकद संपन्न पंजाब और कर्नाटक से वित्तीय सहायता पाने की उम्मीद कर सकता है.

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केरल मॉडल
कॉरपोरेट फंड के विकल्प के रूप में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का मानना है कि पार्टी को केरल मॉडल को अपनाना चाहिए और आम जनता से फंड लेना चाहिए. केरल में प्रदेश कांग्रेस बड़े उद्योगपतियों के पास जाने के बजाय आम लोगों को पास जाती है और उनसे फंड जमा करती है.
राहुल गांधी का मानना है कि अब बदलते समय में हमें यहीं मॉडल केन्द्रीय स्तर पर भी लाना चाहिए. इससे जनता पार्टी के साथ जुड़ेगी और पार्टी के पास फंड की समस्या भी नहीं होगी.
गुजरात चुनाव में राहुल गांधी ने काफी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है और नए समीकरण के साथ बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं. लेकिन क्या उनकी चुनौती बीजेपी जैसी धनवान पार्टी को हिला पाएगी.
कांग्रेस के नेता बार बार ये आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी उम्मीदवारों को खरीद रही है. अब सवाल ये उठता है कि क्या कांग्रेस की तंगहाली की वजह से वो चुनाव में पीछे रह जाएगी.
इस समय कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वो बीजेपी शासित राज्यों पर अपनी जीत दिखाएं साथ ही अपने राज्यों को ना खोएं. राहुल गांधी का केरल मॉडल तभी काम करेगा जब वो आम जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता फिर से साबित करें.
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