नजरिया: 'जो पत्रकार सत्तापक्ष की तरफ नहीं झुके उनके लिए संदेश'

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- Author, उर्मिलेश
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
छत्तीसगढ़ की पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा को शुक्रवार तड़के उनके घर से गिरफ़्तार किया है.
ये बहुत हैरान कर देने वाली एक घटना है. छत्तीसगढ़ पुलिस का एक रिकॉर्ड रहा है. छत्तीसगढ़ पुलिस बिना किसी नोटिस दिए, वारंट दिखाए देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों में शुमार विनोद वर्मा को रात के अंधेरे में उठा ले गई.
सूचना मिलने पर जब अन्य पत्रकार ग़ाज़ियाबाद के इंदिरापुरम थाने में पहुंचे तो उन्हें मिलने तक की इजाज़त नहीं दी गई.
पत्रकारों से कहा गया कि आप लोग चुपचाप बैठे रहिए और हम लोग कर रहे हैं, करने दीजिए.

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'इमरजेंसी जैसा माहौल'
इस घटना से मुझे एक झटका लगा है. ऐसा लगा कि ये कोई और हुक़ूमत है जो भारत के नागरिकों पर राज कर रही है.
एकबारगी तो लगा कि इमरजेंसी जैसा माहौल है, जब लोगों को रात में जाकर पुलिस उनके घर से उठा लेती थी.
उस दौर में मैं छात्र था और देखा था कि कैसे लोगों के घर जाकर किस तरह अचानक दस्तक दी जाती थी और उनसे पूछा जाता है कि वो कौन हैं और गिरफ़्तार कर लिया जाता था.
ये घटना केवल विनोद वर्मा का मामला नहीं है. ये पत्रकारों को डराने धमकाने की कोशिश लगती है.
ये पत्रकार समुदाय के बीच एक भय का माहौल बनाने की कोशिश है.
क्योंकि देश में पत्रकार समुदाय का एक बड़ा हिस्सा सत्तापक्ष की ओर झुक गया है और जो लोग नहीं झुक हैं, उनके लिए ये एक संदेश है.

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'आज़ादी की स्थिति वैसे भी खस्ताहाल'
भारत में प्रेस की आज़ादी की स्थिति वैसे भी खस्ताहाल है. पत्रकारों की सुरक्षा पर बनी अंतरराष्ट्रीय समिति भी इस पर चिंता जता चुकी है.
रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स का भी कहना है कि भारत में प्रेस की आज़ादी की स्थिति लगाताकर ख़राब होती जा रही है.
प्रेस की आज़ादी को लेकर पिछली बार जो रिपोर्ट आई थी उसके मुताबिक़, प्रेस की आज़ादी के मामले में 180 देशों में भारत का स्थान 136वां है.
इसमें भी छत्तीसगढ़ की स्थिति और ज़्यादा चिंतनीय है. वहां पिछले कई सालों से कई पत्रकारों की हत्याएं हुई हैं, कई पत्रकारों की गिरफ़्तारियां हुई हैं.
अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार संतोष यादव को अदालत के हस्तक्षेप के बाद रिहा किया गया.
एक न्यूज़ वेबसाइट की महिला पत्रकार को तो डरा धमका कर छत्तीसगढ़ से भगाया गया.

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'दलितों, आदिवासियों का पक्ष लेने वाले बनते हैं निशाना'
छत्तीसगढ़ मे तो ये स्थिति है कि उन पत्रकारों को खासकर निशाना बनाया जाता है जो दलितों, आदिवासियों का पक्ष लेते हैं.
यही नहीं यहां उन पत्रकारों को भी निशाना बनाया जाता है जिनके लेखन से विपक्षी पार्टियों को किसी न किसी तरह फायदा पहुंचता है.
जहां तक छत्तीसगढ़ की पुलिस की कार्यशैली की बात है तो गुरुवार की दोपहर को छत्तीसगढ़ में एफ़आईआर दर्ज की गई और शुक्रवार की रात में ही पुलिस दिल्ली और फिर दिल्ली से रात में ही ग़ाज़ियाबाद पहुंच गई, मानो वो किसी गैंगस्टर या अपराधी के पीछे पड़ी हो.
ये भी हो सकता है कि पुलिस एफ़आईआर से पहले ही यहां पहुंच गई हो. बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ से कई पुलिस अफ़सर यहां पहुंचे थे.
एफ़आईआर और उसके तत्काल बाद ही छत्तीसगढ़ पुलिस के दिल्ली और फिर उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद में पहुंचना, कई सवाल खड़े करता है.
ऐसा सलूक तो किसी माफ़िया, अपराधी या गैंगस्टर के साथ भी देखने को नहीं मिलता है.

'इमरजेंसी से भी भयानक स्थिति'
विनोद वर्मा बीबीसी जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान, देशबंधु और अमर उजाला के साथ काम कर चुके हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ पर किताब लिखी है.
जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया तो कोई वारंट नहीं दिखाया गया. ना ही गिरफ़्तारी के दौरान अपना जाने वाले मानक तौर तरीक़ों को अपनाया गया.
ऐसे पत्रकार के साथ इस तरह का तौर तरीक़ा अख़्तियार करना समझ नहीं आता.
इमरजेंसी के दौरान भी कई बार वारंट दिखा दिया जाता था लेकिन इस मामले में तो ये भी ज़रूरत नहीं महसूस की गई.
ये तो इमरजेंसी से भी भयानक स्थिति है.
किसी पत्रकार के साथ ऐसा किया जाना बेहद अलोकतांत्रिक और तानाशाहीपूर्ण रवैया है.
ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने ऐसा, सरकार में शीर्ष स्थान पर बैठे लोगों के इशारे पर किया है.
(बीबीसी संवाददाता संदीप राय की वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश से बातचीत के आधार पर )
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