नज़रिया: इमरजेंसी जैसे हालात में रह रहे हैं हमलोग?

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- Author, कुलदीप नैयर
- पदनाम, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार
24 जून 1975 की रात थी. उस वक्त मैं इंडियन एक्सप्रेस में काम करता था. किसी ने मुझे फ़ोन कर कहा कि पुलिस अख़बार की गाड़ी को दफ़्तर परिसर से बाहर नहीं जाने दे रही है.
जिस पुलिस वाले से मैंने बात की उसने मुझे बताया कि इमरजेंसी लगा दी गई है एक भी अख़बार को बिना सेंसरशिप अधिकारी के इजाज़त के बिना प्रसारित करने का आदेश नहीं है.
इसके बाद मुझे पता चला कि मौलिक अधिकार तक निलंबित कर दिए गए हैं.
एक लाख से ज़्यादा लोगों को हिरासत में ले लिया गया था. विपक्ष के सभी बड़े नेता गिरफ़्तार कर लिए गए थे जिसमें जयप्रकाश नारायण भी शामिल थे. प्रेस का मुंह बंद कर दिया गया था.

हर वक्त ख़ौफ़ का साया मंडराता रहता था. कोई अपनी ज़ुबान नहीं खोलना चाहता था नहीं तो उसके गिरफ़्तार होने का डर लगा रहता था.
व्यवसायी और उद्योगपतियों को उनके उद्योग-धंधों पर छापा मार कर निशाना बनाया जा रहा था.
मीडिया खोखली हो चुकी थी. यहां तक कि प्रेस कौंसिल ने भी चुप्पी लगा बैठी थी. प्रेस की आज़ादी की रक्षा करने के लिए यह सर्वोच्च संस्था थी.
जस्टिस अय्यर के नेतृत्व में प्रेस कौंसिल व्यवस्था का ही एक हिस्सा बन गई थी और सूचना मंत्री वीसी शुक्ला के आदेशों का पालन कर रही थी.

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इमरजेंसी के दौरान सूचना-प्रसारण को लेकर शुक्ला के आदेश और प्रेस की फ़रमाबरदारी को श्वेत पत्र जारी किया गया था.
दोबारा सत्ता में हुई थी वापसी
बहरहाल आपातकाल लगाने वालीं इंदिरा गांधी ने इस्तीफ़ा दिया. उनका शुरुआती फ़ैसला था कि वो पहले गद्दी छोड़ेंगी और फिर अवाम के बीच माफ़ी मांगने जाएंगी.
ऐसा उन्होंने किया भी. वो शानदार बहुमत के साथ सत्ता में दोबारा आईं. लोगों को उनको लेकर संशय दूर हुआ लेकिन लोग, इमरजेंसी में होने वाली ज़्यादतियों और सरकार के उठाए क़दमों को लेकर भड़के हुए थे.
हालांकि उनके बेटे संजय गांधी और उनके विश्वास पात्र बंसीलाल ने राज सत्ता को अपनी जागीरदारी की तरह चलाया और किसी भी तरह की आलोचना बर्दाश्त नहीं की.

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लोगों में वो हमेशा ऐसी दिखती रही कि वो निर्दोष हैं और जो कुछ हो रहा था, उसका उनको भान नहीं था.
हालात इतने बदतर हो चले थे कि ब्लैंक वारंट तक जारी किए जा रहे थे. पुलिस इसका बेजा इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए कर रही थी.

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आज लोग यह तेज़ी से महसूस कर रहे हैं कि अगर दशकों पहले इंदिरा गांधी का एकक्षत्र राज था तो आज की तारीख में यही राज नरेंद्र मोदी का है.
ज़्यादतर अख़बारों और टेलीविज़न चैनलों ने उनके काम करने को तरीके को मान लिया है जैसा कि इंदिरा गांधी के वक़्त में कर लिया था.
मोदी राज में बदतर स्थिति
हालांकि नरेंद्र मोदी का एकक्षत्र राज इस मामले में और बदतर हो गया है कि बीजेपी सरकार के किसी भी कैबिनेट मंत्री की कोई अहमियत नहीं रह गई है और कैबिनेट की सहमति सिर्फ कागज़ी कार्रवाई बन कर रह गई है.
सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर किसी भी इमरजेंसी जैसे हालात की मुखालफ़त करनी चाहिए जैसा कि पहले भी कर चुके हैं.
लेकिन अरुण जेटली जैसे लोग जो इमरजेंसी के दौर को देख चुके है और उसके भुक्तभोगी रह चुके हैं, मौजूदा हालात में उनकी सोच संघ के हिसाब से नहीं निर्देशित हो सकती है. उन्हें इमरजेंसी के दौरान जेल भी हुई थी.

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यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि इमरजेंसी फिर से लागू होगा क्योंकि जनता सरकार ने संविधान में संशोधन करके इसे असंभव कर दिया है.
फिर भी ऐसे हालात बनाए जा सकते हैं जो बिना किसी क़ानूनी दायरे के इमरजेंसी जैसे नतीजे में तब्दील हो जाए.
जनमत इतना मज़बूत बन चुका है कि अब इमरजेंसी जैसा क़दम संभव नहीं है. लोग सड़कों पर किसी भी उस सरकार के ख़िलाफ़ निकल सकते हैं जो निरंकुश या इमरजेंसी जैसे हालात पैदा करते हुए लगेंगे.

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वाकई में जो बात मायने रखती है. वो है संस्थानों की मज़बूती. इमरजेंसी के पहले की तरह भले ही संविधानिक संस्थानों की मज़बूती ना रह गई हो लेकिन ये संविधानिक संस्थान अभी भी इतने मज़बूत हैं जो उनकी आज़ादी छिनने वाले किसी भी क़दम की मजबूत मुखालफ़त कर सकते हैं.
हाल ही में कुछ ऐसे उदाहरण दिखे हैं जो इस उम्मीद को पुख़्ता करते हैं.
इस मामले में उत्तराखंड का मामला देखा जा सकता है. विधानसभा में शक्ति परिक्षण के दिन पहले ही सदन को भंग कर दिया गया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गर्वनर के आदेश को पलटते हुए सदन को फिर से बहाल किया.

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एक और मामले को देखे. महाराष्ट्र के हाई कोर्ट ने एक केस में सेंसर बोर्ड को चेतावनी दी कि वो दादी मां जैसा व्यवहार करना बंद करे और काटने-छांटने पर ज़ोर देने के बजाए फ़िल्मों को प्रमाणपत्र देने के अपने काम पर ज़्यादा ध्यान दें.
इस केस में सेंसर बोर्ड की ओर से 90 कट के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कोर्ट ने सिर्फ़ एक कट की इजाज़त दी थी.
इसने आलोचकों को एक हिम्मत दी कि संविधानिक संस्थानों में सुधार हो रहे हैं और आने वाले समय में उनमें इतनी ताक़त आ जाएगी जैसी कि इमरजेंसी से पहले होती थी.
ग़लती दोहराने की हिम्मत नहीं
इंदिरा गांधी जैसी ग़लती दोहराने की हिम्मत किसी में नहीं होगी. हालांकि बाद में उन्होंने फिर से संविधान बहाल किया.
इमरजेंसी से जो सबक हमने सिखा है वो बेकार नहीं जाने वाला. लोगों में वो पुराना आत्मविश्वास मौजूद है कि उनकी आज़ादी में बेड़ियां नहीं लगाई जा सकी थी और ना ही उन्हें असहमत होने से रोका जा सका था.
इंदिरा गांधी के विश्वासपात्र आरके धवन ने एक बार सोनिया गांधी के बारे में बताया था कि उन्हें इमरजेंसी लगने के बारे में कोई भान नहीं था. जब वो इमरजेंसी के बारे में सुनी तो ये उनकी सोच से विपरीत था.

कहा जाता है कि वो और उनके पति राजीव गांधी इमरजेंसी के बाद इटली लौटने के बारे में सोच रहे थे ताकि 'खुले माहौल' में अपने बच्चों की परवरिश कर सकें.
आरके धवन के इमरजेंसी पर सोनिया गांधी के इस नज़रिए को बताने के बाद उनके लिए जरूरी हो गया कि वो अपना पक्ष रखे.
चालीस साल के बाद भी लेकिन गांधी परिवार इस पर स्पष्ट रूख के साथ सामने नहीं आया है.
माफ़ी मांग लें तो बेहतर
जो कुछ हुआ इसकी अकेली ज़िम्मेवारी उन्हीं की थी. चुनाव में सरकारी तंत्र का ग़लत दुरुपयोग करने की वजह से इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोषी करार दिया था.

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आरके धवन की बात से ऐसा लगता है कि गांधी परिवार में इमरजेंसी को लेकर कोई अफ़सोस की भावना नहीं थी. हालांकि मनमोहन सिंह ने इस सोची-समझी चुप्पी को संभालने की बहुत कोशिश की.
लेकिन अच्छा तो यह होगा कि जल्दी ही गांधी परिवार अवाम से इमरजेंसी के लिए माफ़ी मांग लें. यह उनके लिए अच्छा होगा और देश के लिए भी.
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