नरेंद्र मोदी क्यों हैं यशवंत सिन्हा के निशाने पर

इमेज स्रोत, AFP/Getty Images
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
यशवंत सिन्हा के 'I Need To Speak Now' यानी 'अब मुझे बोलना पड़ेगा' शीर्षक वाले लेख ने जहां देश की मंद पड़ती अर्थव्यस्था पर बहस तेज़ की है, वहीं सवाल ये भी उठ रहा है कि पूर्व वित्त मंत्री ने मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली की तीखी आलोचना के लिए यही वक़्त क्यों चुना?
और क्या ये महज़ जेटली और उनकी नीतियों की निंदा है या सिन्हा जेटली के बहाने नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रहे हैं?
राजनीतिक विश्लेषक शेखर अय्यर कहते हैं, ''बीजेपी के एक बड़े वर्ग में चिंता है कि अर्थव्यवस्था मौजूदा पतली हालत से अगले साल-ढ़ेढ़ साल में निकल पाएगी या नहीं! और अगर ऐसा नहीं होता तो 2019 चुनावों में वो जनता के सामने क्या मुंह लेकर जाएंगे?'

इमेज स्रोत, MANJUNATH KIRAN/AFP/Getty Images
चिंता चुनावों की
अय्यर नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में दिए गए भाषण की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं जहां प्रधानमंत्री ने देश हित में पार्टी से परे सोचने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था.
बीजेपी पर लंबे समय से नज़र रखनेवाले राजनीतिक पत्रकार प्रदीप कौशल इस पूरे मामले को दो साल बाद होनेवाले आम चुनावों की रोशनी में नहीं देखते और कहते हैं, ''उसमें बहुत वक़्त है.''
प्रदीप कौशल कहते हैं, ''यशवंत सिन्हा ने कोई नई बात नहीं कही है, ख़ुद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि अर्थव्यवस्था के पटरी पर लाने के लिए सरकार ने कुछ क़दम उठाने का मन बनाया है. हाल ही में सरकार ने आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन किया है और यशवंत सिन्हा के लेख को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए.''

इमेज स्रोत, PRAKASH SINGH/AFP/Getty Images
सिन्हा की चिट्ठी
प्रदीप कौशल का ये भी मानना है कि ये पहली बार नहीं है कि जब यशवंत सिन्हा ने पार्टी के भीतर के किसी मुद्दे को उठाया हो. वो पहले भी ऐसा करते रहे हैं.
शेखर अय्यर इससे इत्तेफ़ाक़ रखते हैं और 2009 की यशवंत सिन्हा की उस चिट्ठी की याद दिलाते हैं जिसमें उन्होंने आम चुनावों में हार के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की बात करते हुए पार्टी में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
तब बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह हुआ करते थे.
आर्थिक मुद्दे
प्रदीप कौशल यशवंत सिन्हा के दूसरे मामलों को भी उठाने के क्रम में उस प्रतिनिधिमंडल की बात करते हैं जो उनके नेतृत्व में कश्मीर गया था.
कौशल बताते हैं, ''हालांकि ये कोई आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल नहीं था, लेकिन वहां से वापस आने के बाद यशवंत सिन्हा ने बयान जारी किया, कुछ सुझाव भी दिए. उहोंने प्रधानमंत्री से मिलने का समय भी मांगा जहां वो इन मामलों की शायद चर्चा करना चाहते थे. लेकिन प्रधानमंत्री से उन्हें वक़्त नहीं मिल पाया.''
कौशल कहते हैं आर्थिक मुद्दा तो एक बात है यशवंत सिन्हा दूसरे मामलों को भी वक्त-वक़्त पर उठाते रहे हैं.
सिन्हा की कड़वाहट
अय्यर कहते हैं कि यशवंत सिन्हा कहीं न कहीं पार्टी में बिल्कुल अलग-थलग पड़ चुके हैं, ''पार्टी ने न उन्हें चुनावों में टिकट दिया न ही बाद में हुए झारखंड विधानसभा चुनावों में उनका नाम मुख्यमंत्री के तौर पर कहीं आया तो उसकी खटास उनके भीतर कहीं न कहीं है.''
वो यशवंत सिन्हा के वित्त मंत्री के कार्यकाल की बात करते हुए कहते हैं कि उनका दौर भी पूरी तरह विवादों से अलग नहीं रहा था और अटल बिहारी वाजेपेयी मंत्रिमंडल में हुए फेरबदल में उन्हें वित्त से हटाकर विदेश मंत्रालय का कार्यभार दिया गया था.
ज़िम्मेदार कौन
राजनीति के जानकार मानते हैं कि हाल में पुनर्गठित आर्थिक सलाहकार परिषद में भी उन्हें किसी तरह की कोई भूमिका नहीं मिली तो उनकी खटास और बढ़ी है.
ये पूछने पर कि क्या जेटली के बहाने सिन्हा मोदी पर निशाना लगा रहे हैं, कौशल कहते हैं, ''आज सरकार में जो भी फैसला होता है कहते हैं तीन ही लोग लेते हैं - मोदी, शाह और जेटली. ऐसे में जीएसटी या नोटबंदी के लिए सिर्फ़ जेटली को किस तरह ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है?''
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















