मनमोहन सिंह से क्या सीख सकते हैं नरेंद्र मोदी-अरुण जेटली?

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- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
साल 2008 का वक़्त. जब दुनिया भर में आर्थिक तबाही मची थी. मेरिल लिंच और लीमैन ब्रदर्स जैसे दिग्गज ढह रहे थे. हर कोने से शेयर बाज़ारों के गर्त छूने की ख़बरें आ रही थीं.
देश का हाल भी कुछ ऐसा ही था. दलाल पथ पर निवेशकों के लाखों-करोड़ों हर रोज़ गायब हो रहे थे, पिंक स्लिप थमाकर छंटनियां हो रही थीं और नई नौकरियां का अकाल पड़ता दिख रहा था.
जब लगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी, तभी सरकारी सूझबूझ ने हालात संभालने शुरू किए. एक अरब से ज़्यादा आबादी का पहला बड़ा फ़ायदा तब दिखा जब घरेलू उपभोग ने कमज़ोर अर्थतंत्र को अपने कंधे पर रखकर संभाला.
ग्रामीण इलाकों में बिक्री बनी रही, बड़े कारोबारों पर कुछ असर ज़रूर हुआ, लेकिन छोटे उद्योगों पर वो प्रभाव नहीं दिखा. लेकिन ये सब हुआ कैसे. इस सवाल का जवाब बाद में. पहले आज की स्थिति.

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क्या आर्थिक मंदी की तरफ़ बढ़ रहे हैं हम?
''आज अर्थव्यवस्था की क्या हालत है? निजी निवेश गिर रहा है. इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन सिकुड़ रहा है. कृषि संकट में है, कंस्ट्रक्शन और दूसरे सर्विस सेक्टर धीमे पड़ रहे हैं, निर्यात मुश्किल में है, नोटबंदी नाकाम साबित हुई और गफ़लत में लागू किए गए जीएसटी ने कइयों को डुबो दिया, रोज़गार छीन लिए. नए मौके नहीं दिख रहे. तिमाही ग्रोथ रेट धीमी पड़ रही है.''
ये अटल सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा के शब्द हैं. और वो 27 सितंबर, 2017 को ये सब बातें कह रहे हैं.
उनकी बातों में कितना सच है, ये अर्थशास्त्री बता सकते हैं. लेकिन ये हम सभी देख रहे हैं कि नोटबंदी का वो फ़ायदा नहीं हुआ जिसके सपने सरकार ने देखे थे.
अगर वाकई हम मंदी की ओर बढ़ रहे हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली मौजूदा हालात से निपटने के लिए क्या कर सकते हैं. क्या साल 2008 में देश को संकट से बाहर निकालने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम की नीतियों से कुछ सीख ली जा सकती है?

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यशवंत सिन्हा को सही बताया
ये सवाल बीबीसी हिन्दी ने आर्थिक जानकारों से किया तो क्या कुछ मिला, ये रहा ब्योरा.
आर्थिक जानकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने यशवंत सिन्हा के लेख पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यशवंत सिन्हा ने जो कहा है, वो सच है.
उन्होंने कहा, ''साल 2008 में जब दुनिया भर में आर्थिक मंदी आई थी तो यूपीए सरकार में प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम ने सुझाव दिया कि हमें और पैसा खर्च करना है. इससे वित्तीय घाटा बढ़ गया था. आने वाला वक़्त बताएगा कि मोदी सरकार और उनके वित्त मंत्री यही रास्ता अपनाते हैं या नहीं.''
जानकारों का मानना है कि जब एक आर्थिक संकट आता है तो हर देश में सरकार अपना खर्च बढ़ाने की कोशिश करती है क्योंकि उस वक़्त बेरोज़गारी और निवेश की समस्या होती है. अगर निजी क्षेत्र निवेश नहीं करता है तो सरकार को निवेश करना होगा.

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हालात वाकई इतने खराब हैं?
उन्होंने कहा, ''एक-डेढ़ साल में चुनाव आने वाले हैं. ज़्यादा वक़्त बाकी नहीं है. शायद उस समय सरकार ऐसा करेगी. जब ऐसा होता है तो वित्तीय घाटा बढ़ता है और मुद्रास्फ़ीति पर इसकी छाप दिखती है.''
आम आदमी इन दिनों पेट्रोल के दामों से परेशान है, लेकिन सरकार के लिए ये फ़ायदे का सौदा साबित हो सकता है.
ठाकुरता ने कहा, ''सरकार ने पेट्रोल का दाम बढ़ाकर राजस्व बढ़ा लिया है, ऐसे में उससे भी खर्च किया जा सकता है. समय बताएगा कि सरकार की क्या रणनीति है अर्थव्यवस्था की उन्नति के लिए. क्योंकि इस समय उसकी हालत बहुत ही ख़राब है.''
उन्होंने कहा कि सरकार के विरोधी तो पहले से यही कहते आ रहे थे. अब जब यशवंत सिन्हा जैसे भाजपा से जुड़े लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया है तो लोगों को नज़र आने लगा है. ये बात सभी को पता थी कि क्या स्थिति चल रही है.

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बेरोज़गारी का क्या होगा?
ठाकुरता के मुताबिक अभी लेबर ब्यूरो का नया आंकड़ा आया है जिसमें कहा गया है कि स्वाधीन भारत में पहली बार बेरोज़गारी इतनी बढ़ गई है. पिछले तीन-चार साल (2013-14 और 2015-16) में रोज़गार के कुल आंकड़ों में कमी दर्ज की गई है.
साल 2008 में सरकार ने घरेलू उपभोग बढ़ाया था और उसके लिए उसने पैसा खर्च किया. अपना सरकारी घाटा बढ़ाया. अलग-अलग कार्यक्रम शुरू किए गए. जिससे फ़ायदा हुआ, क्या दोबारा ऐसा होगा?
उन्होंने कहा, ''उस समय भी कहा गया था कि सरकारी घाटा बढ़ेगा तो उसका असर महंगाई पर होगा. लेकिन ये फ़ैसला हुआ कि ऐसा हो तो हो, लेकिन सरकार को अपना खर्च बढ़ाना ही होगा. शायद वही कहानी दोहराई जाएगी. आने वाले वक़्त में मोदी सरकार भी ऐसा ही कुछ कर सकती है.''

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साल 2008 के सबक क्या?
दूसरे जानकार भी मानते हैं कि सरकार को तुरंत कारोबार में भरोसा पैदा करना होगा. 'द वायर' के वरिष्ठ संपादक और आर्थिक पत्रकार एम के वेणु ने कहा कि साल 2008 का जो वित्तीय संकट था, वो वैश्विक था. उसका असर सभी जगह हुआ था. भारत में भी हुआ. क्योंकि अगर वैश्विक कारोबार और निवेश पर असर पड़ता है तो उसका असर भारत पर भी होता है क्योंकि वो उसका अहम हिस्सा है. हमारे यहां भी दबाव आया था. फ़ाइनेंशियल बाज़ार गिरा, शेयर बाज़ार लुढ़का, रियल्टी सेक्टर कमज़ोर हुआ, कारोबार पर काफ़ी असर हुआ.
उन्होंने कहा, ''मगर उस वक़्त भारत में जो नीति अपनाई गई, उसके दो अहम हिस्से थे. पहला, वित्तीय गियर लगाया गया. सरकार ने अपने खर्च बढ़ाए जिससे उपभोग का स्तर बनाए रखा जा सके. और दूसरा, रिज़र्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति में बदलाव किया. उसके ज़रिए राहत दी गई. बाज़ार को सस्ता पैसा मुहैया कराया गया.''

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फ़ायदा नहीं उठा पाई मोदी सरकार?
वेणु ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''इन्हीं नीतियों की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था संभली रही और दुनिया भर में आई मंदी पर उसका सीमित असर ही हुआ. साल 2008 में मंदी आई थी, लेकिन भारत ने साल 2009-10 और साल 2010-11 तक को ख़ुद को संभाले रखा.''
उन्होंने कहा कि उस मंदी का लंबा असर भी हुआ, ग्रोथ रेट भी गिरा, लेकिन इतना नहीं गिरा जितना हम अब देख रहे हैं. जबकि जब मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी तब वित्त मंत्री ने भी कहा था कि भारत बढ़िया स्थिति में है. तेल और मेटल के दाम गिर रहे थे, जिससे भारत को काफ़ी फ़ायदा हुआ. करंट अकाउंट डेफ़िसिट (चालू खाते का घाटा यानी निर्यात और आयात का अंतर) कम था.
एक तरह से देखें तो सरकार माकूल हालात का फ़ायदा नहीं उठा पाई. फ़ायदा क्यों नहीं उठा पाई, इसके जवाब में उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाने के बजाय इन्होंने ढांचागत सुधारों के नाम पर कुछ ऐसी चीज़ें कर दीं, जिनसे फ़ायदा नहीं हुआ.

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नोटबंदी गलत दांव?
जैसे काले धन से निपटने के नाम पर नोटबंदी की गई, जीएसटी भी जल्दबाज़ी में लागू किया गया. ऐसे में जो रिकवरी धीरे-धीरे हो रही थी, वो पूरी तरह रिकवर होने से पहले ये सारी चीज़ें आ गईं. इससे अर्थव्यवस्था को चोट पहुंची- ख़ास तौर से छोटे उद्योगों को नुकसान पहुंचा. इसका भी ख़ामियाज़ा भुगत रहे हैं.
मनमोहन सरकार की नीतियों से मोदी और जेटली क्या सीख सकते हैं, इस पर वेणु ने कहा, ''एक तो आरबीआई की ब्याज़ दरें अब भी ज़्यादा है. बैंकों के ज़्यादा पैसा मुहैया कराया जा सकता है. इससे फ़र्क पड़ सकता है. लेकिन दिक्कत ये है कि बैंकों की हालत भी ख़राब है. पिछली मंदी का सामना करने वाली कंपनियां उनका पैसा लौटा नहीं पा रही हैं जिससे उनका संकट भी बढ़ गया है.''
''50 कंपनियां ऐसी हैं जो 10 लाख करोड़ रुपए नहीं लौटा पा रही हैं. ऐसे में बैंकों को पैसा देना बहुत ज़रूरी हो गया है ताकि वो आगे पैसा दे सकें. पिछले आठ-महीने के दौरान आप देखेंगे कि बैंक पैसा नहीं दे रहे हैं. नोटबंदी के बाद सात-आठ महीने का दौर ऐसा रहा है जब बैंक कर्ज़ नहीं दे रहे. ये एक बड़ी समस्या है.''

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छोटे उद्योग, बैंक को मदद चाहिए
उन्होंने बताया कि संगठित क्षेत्र के जिन आठ सेक्टरों के आंकड़े सरकार रखती है, उनमें 2011-12 तक 10 लाख अतिरिक्त नौकरियां थीं, वो गिरकर 1.5 लाख पर आ गई हैं. असंगठित क्षेत्र की तो बात ही छोड़ दीजिए जिन्हें काफ़ी चोट पहुंची है. सरकार को निजी उद्योगों में दोबारा जान फूंकनी होगी. ये एक चक्र है. बैंक अगर पैसा नहीं देगा, कारोबारों को भरोसा नहीं होगा, तो कैसे होगा. सरकार को बिज़नेस का कॉन्फ़िडेंस बढ़ाना होगा, ख़ास तौर से छोटे उद्योगों का.
इस साल जनवरी से मार्च के बीच छोटे उद्योगों की सेल्स में 58% की गिरावट आई है. अगर सेल्स में इतनी गिरावट आई है तो रोज़गार का क्या हाल होगा. मौजूदा सरकार की दिक्कत ये है कि वो भारतीय अर्थव्यवस्था के डायनिमिक्स को समझने में गच्चा खा रही है. नोटबंदी से बड़े कारोबारियों के काले धन पर निशाना साधा गया था, लेकिन हुआ उल्टा.

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गला पकड़कर डिजिटल नहीं बनेंगे?
वेणु ने कहा, ''छोटे कारोबारियों का काम कैश में होता था, उन्हें चोट पहुंची और इंडस्ट्रियल ग्रोथ में इनकी हिस्सेदारी क़रीब 40 फ़ीसदी है. इसका समाधान नहीं निकल सका है. किसानों का हाल देख लीजिए. रबी की फ़सल अच्छी रही, दालों का उत्पादन भी बढ़ा. लेकिन जब किसान मंडी गया, तो 50 फ़ीसदी कम दाम मिल रहा था. इसकी वजह ये है कि कैश ज़्यादा चलता था.''
''संघ परिवार के आर्थिक सलाहकार ने नोटबंदी को सही ठहराया था. लेकिन ये भी कहा था कि हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक कारोबार काम करते हैं, उन्हें गला पकड़कर डिजिटल नहीं बनाया जा सकता. बाज़ार की प्रक्रियाओं को धीमे-धीमे बदलकर ऐसा किया जा सकता है.''
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