'किसान से प्रीमियम 1800 और मुआवज़ा 100 रुपये'

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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत मध्य प्रदेश में कुछ रुपये हर्ज़ाना मिलने पर किसान शिकायत कर रहे हैं
किसानों का कहना है कि फ़सल बीमा के रूप में चार रुपये या सत्रह रुपये तक का मुआवज़ा मिलने से वो ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.
मध्य प्रदेश प्रदेश के सिहोर ज़िले के तिलरिया गांव में 52 किसानों को कुल 3,061 रुपये 50 पैसे मुआवज़ा मिला है.
किसान इसे अपने साथ किया गया एक किस्म का मज़ाक बता रहे हैं.
बाकी ज़िलों में भी किसानों की ऐसी शिकायत है.
सिहोर ज़िले में पिछले तीन महीने में 12 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. ये वही ज़िला है जहां पिछले साल 18 फ़रवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक जनसभा कर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत की घोषणा की थी.

बीमा से फ़ायदा नहीं
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भी ताल्लुक़ इसी इलाक़े से है. समझा जा सकता है कि बाकी ज़िलों का क्या हाल होगा.
वरिष्ठ पत्रकार एमके वेणु इसे सरकारी मशीनरी की अक्षमता बताते हैं.
वो कहते हैं, "किसान बुरी तरह त्रस्त है. उसे अपनी फसलों के दाम नहीं मिल रहा है. भारी घाटा हो रहा है और वो आत्महत्या करने पर मज़बूर है. ऐसे में इस तरह की घटना का सामने आना बेहद दुखद है."
उनके अनुसार किसानों से फसल बीमा के नाम पर पूरे देश में 16,000 करोड़ रुपये प्रीमियम वसूला गया जबकि दावों के तहत केवल 8,000 करोड़ रुपये बीमा कंपनियों ने किसानों को दिए.
वेणु कहते हैं, "पहले से ही संकट में चल रहे किसानों को फसल बीमा से कोई फ़ायदा नहीं हुआ. बल्कि किसी को इसमें फ़ायदा हुआ तो वो हैं प्राइवेट बीमा कंपनियां."
वो इसका ज़िम्मेदार सरकारी नीतियों को लागू करने में कमी को ठहराते हुए कहते हैं, "इस सरकार ने जो भी नीतियां घोषित कीं उनको ज़मीन पर लागू करने का तरीक़ा इतना ख़राब रहा कि लोगों को राहत मिलने की बजाय परेशानी बढ़ गई."

बीमा कंपनियों को मुनाफ़ा
वो कहते हैं, "कुछ रुपये और कुछ पैसे मुआवज़े के रूप में किसानों को दिया जाना, इस नीति के ख़राब क्रियान्वयन का सबूत है."
उदाहरण के तौर पर वो कहते हैं कि मध्यप्रदेश में जिन किसानों से 1,800 रुपये प्रीमियम वसूला गया, उन्हें 100 रुपये मुआवज़ा मिला.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने किसानों की कर्ज़ माफ़ी की जो घोषणा की थी, उसमें भी कुछ पैसों तक की क़र्ज माफ़ी के सर्टिफ़िकेट बांटे गए थे.
वेणु कहते हैं, "कर्ज़ माफ़ी और फसल बीमा के जो सर्टिफ़िकेट बांटे जा रहे हैं, उसमें प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर भी लगाई गई है. सरकार की ये नाकामी ही है कि वो प्रधानमंत्री की फ़ोटो लगाकार अपना प्रचार करना चाहती है और वो भी ठीक से नहीं कर पा रही है."
वो कहते हैं कि ये किसानों के साथ एक किस्म का क्रूर मज़ाक है.
उनके अनुसार, "साल 2016-17 में निजी बीमा कंपनियों के व्यवसाय में 32 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज़ की गई है. इसमें से आधी वृद्धि बीमा फसल योजना के प्रीमियम की वजह से हुई थी."

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सरकारी मशीनरी ठीक नहीं
लेकिन सरकार क्या कर रही है और क्या उसे इसमें कुछ अजीब नहीं लग रहा है?
इस पर वेणु कहते हैं, "वर्तमान सरकार की दिक्कत ये है कि इसने बड़े बड़े वायदे तो कर दिए और ये भी कह दिया कि वो रातों रात समस्या का समाधान कर देगी, इसलिए इसने नीतियों को आनन फानन में लागू किया, जबकि इसे लागू करने वाली मशीनरी बहुत ही ख़राब हालत में है."
वो कहते हैं कि किसानों की आमदनी को दोगुना करने की योजना, फसल बीमा योजना या किसान कर्ज़ माफ़ी योजना हो, सरकार को समझ ही नहीं आ रहा कि क्या हो रहा है. इस सरकार के साढ़े तीन साल तो तथ्यों को हासिल करने में ही निकल गए.
मुद्रा बैंक का वो उदाहरण देते हैं, "सरकार ने दावा किया कि मुद्रा बैंक के तहत क़रीब आठ करोड़ लोगों को लोन दिया गया, लेकिन इसमें भी बताया जा रहा है कि बैंकों के खातों में जो मौजूदा लोन है उसे मुद्रा बैंक के खाते में ट्रांसफ़र करके दिखाया दिया गया है."

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किसानों का भला नहीं
वो कहते हैं, "बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने तो प्रेस कांफ़्रेंस कर ये भी कह दिया कि आप सरकारी आंकड़ों पर मत जाइए. ये इसलिए कि जितने भी आंकड़े आ रहे हैं वो अर्थव्यवस्था की बहुत ख़राब हालत दिखा रहे हैं. उनका कहना है कि ज़मीनी हकीक़त अलग है और सब कुछ अच्छा चल रहा है. यानी जो पार्टी कह रही है वही सत्य है."
लेकिन इन नीतियों से किसानों का कोई भला नहीं हो पा रहा है. पिछले एक दशक में खेती किसानी का संकट बढ़ा है और इसीलिए किसान आंदोलन लगातार बढ़ता जा रहा है.
वेणु कहते हैं कि उन्होंने पिछले एक दशक में हरेक राज्य में इतने सारे और इतने जोरों से किसान आंदोलन उभरते हुए नहीं देखे गए हैं.
(वरिष्ठ पत्रकार एमके वेणु से बीबीसी संवाददाता संदीप राय की बातचीत पर आधारित. भोपाल से शुरैह नियाज़ी ने भी इनपुट उपलब्ध कराए हैं)
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