पहले से तैयार हो रही थी मोदी की इसराइल यात्रा की ज़मीन

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भारत और इसराइल के संबंध पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री काल में फले, लेकिन किसी भारतीय प्रधानमंत्री को वहां का आधिकारिक दौरा करने में 25 साल का लंबा वक़्त लगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 और 5 जुलाई को इसराइल में होंगे और वहां प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू से मुलाक़ात भी करेंगे. भारतीय प्रधानमंत्री निजी तौर पर इसराइल की सैन्य और तकनीकी विशेषज्ञता की तारीफ करते रहे हैं.
भारत-इसराइल रिश्तों के जानकार प्रोफेसर आफ़ताब कमाल पाशा इसे भारत का एक महत्वपूर्ण कदम मानते हैं, क्योंकि सितंबर 1950 में पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ओर से इसराइल को मान्यता दिए जाने और जनवरी 1992 में नरसिम्हा राव की ओर से राजनयिक संबंध स्थापित किए जाने के बाद, ऐसा मौका पहली बार आ रहा है.
क्षेत्रीय गतिविधियों के लिहाज से अहम दौरा

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प्रोफेसर पाशा कहते हैं, ''बीते बीस-पच्चीस साल से इसराइल की तरफ़ से प्रधानमंत्री और उनके अहम नेता भारत आते रहे हैं, लेकिन हमारे यहां से सिर्फ गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री गए हैं. प्रधानमंत्री भले ही अपने कार्यकाल के तीन साल बाद इसराइल जा रहे हैं, लेकिन अपने कनिष्ठ मंत्रियों को वहां भेजकर उन्होंने इसकी पृष्ठभूमि बनाई है. इसके लिए पहले से ज़मीन तैयार की गई थी.''
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इससे पहले ईरान, तुर्की, क़तर, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों का दौरा किया है, लिहाजा 'क्षेत्रीय गतिविधियों' के लिहाज से भी यह यात्रा अहम होगी.
इस रिश्ते का एक बड़ा सूत्र यह भी है कि इसराइल भारत का अहम डिफेंस सप्लायर है. प्रोफेसर पाशा बताते हैं कि भारत के लिए रूस के बाद इसराइल दूसरा अहम डिफेंस सप्लायर बनकर उभरा है. भारत अपनी सेनाओं के लिए वहां से अहम हथियार, इलेक्ट्रॉनिक गेयर और तकनीक आयात करता है.
'भारत में तकनीक के आयात पर नज़र'

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प्रधानमंत्री मोदी इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि तकनीक का ट्रांसफर हो और धीरे धीरे मिसाइलें, एयरफोर्स के पुर्जे और ऐसी चीज़ें भारत में भी बनाई जाएं.
अब तक तो इसराइल यह बहाना बनाकर टाल रहा था कि अमरीका इसकी इजाज़त नहीं दे रहा है. लेकिन कई ऐसी चीज़ें हैं जो इसराइल की तकनीक से ही बनती हैं. मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री उस दिशा में ज़ोर देंगे और मेक इन इंडिया के लिहाज़ से यह अहम कदम होगा.
चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई
आतंकवाद के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय लड़ाई के लिहाज़ से भी ये एक अहम यात्रा है.
प्रधानमंत्री इससे पहले भी जिन देशों में गए हैं, वहां उन्होंने आतंकवाद के ख़िलाफ लड़ने के लिए आवाज़ उठाई है. लेकिन इसराइल के दौरे से इसे एक नई दिशा मिलती है, क्योंकि यह देश आतंकवाद विरोधी लड़ाई में काफी आक्रामक माना जाता है.
इस मोर्चे पर दोनों देशों के बीच यरुशलम, तेल अवीव और दिल्ली में बैठकें होती रही हैं. दोनों देशों के बीच कई साल से ख़ुफिया जानकारियां भी साझा होती रही हैं.
फ़लस्तीनी क्षेत्र के मोर्चे पर नरमी?

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हालांकि भारत के फ़लस्तीनी क्षेत्र से अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन इसराइल से बढ़ती नज़दीकियों का असर उस पर पड़ा है.
पहले भारत फ़लस्तीनी क्षेत्र के मामले को ज़ोर-शोर से समर्थन करता आ रहा था, लेकिन इसराइल से संबंध मजबूत होने के बाद थोड़ी नरमी हुई है.
फ़लस्तीनी क्षेत्र के नेता महमूद अब्बास भारत आए हुए थे. उनको भरोसे में लेकर ही भारत इसराइल के साध संबंध मज़बूत कर रहा है. लेकिन अरब जनता यह मानकर चलती है कि भारत का झुकाव इसराइल के हक में हो रहा है.
ऐसा ही चीन, रूस, तुर्की, सऊदी अरब और यूएई जैसे दूसरे देशों के साथ भी हो रहा है. ये देश भी अब इसराइल के हक़ में ताल्लुक़ात बढ़ाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं.
(जेएनयू में प्रोफेसर आफ़ताब कमाल पाशा की बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र से बातचीत पर आधारित)
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