नज़रिया: ओह, विपक्ष ने कैसे दुत्कारा आम आदमी पार्टी को!

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- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
ऐसे तो सेकुलर जमात ने कभी उस बीजेपी को भी नहीं दुत्कारा जिसके नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर करने के बावजूद अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहा दिया था.
कुछ समय तक ज़रूर जॉर्ज फ़र्नांडिस, नीतीश कुमार और शरद यादव असमंजस में रहे पर फिर धर्मनिरपेक्षता का चोला पहने भगवा गठबंधन में शामिल हो गए और बीजेपी का अलगाव ख़त्म हो गया.
मगर पिछले हफ़्ते राष्ट्रपति पद का संयुक्त उम्मीदवार तय करने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में हुई विपक्षी पार्टियों की बैठक में जिस तरह सोनिया गांधी की कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को दुरदुराया, वैसा उदाहरण पहले कहाँ मिलता है?

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आम आदमी पार्टी से दूरी
शरद यादव को शिकायत है कि आम आदमी पार्टी सीनियर नेताओं की इज़्ज़त नहीं करती. कांग्रेस कहती है कि देश भर में 'आप' की कोई हैसियत नहीं है.
सोनिया गांधी को शिकायत इसलिए होगी क्योंकि उनके दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर वार करने वालों में अरविंद केजरीवाल सबसे आगे थे.
शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी आप को विपक्ष की गोलबंदी में शामिल नहीं करना चाहती.
मार्क्सवादी पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ज़रूर अरविंद केजरीवाल को विचार विमर्श में शामिल करना चाहती थीं पर उनकी चली नहीं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अरविंद केजरीवाल फूटी आंख नहीं सुहाते और अब विपक्ष भी उन्हें राजनीति का बहिरागत मान रहा है.
सोनिया गांधी उस शरद पवार के साथ तो एक मंच पर बैठ सकती हैं जिन्होंने उनके विदेशी मूल के सवाल पर कांग्रेस पार्टी तोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस बना ली, लेकिन उन्हें केजरीवाल को साथ लेने पर एतराज़ है.

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कैसे बनी 'आप' आंखों की किरकिरी?
कांग्रेस के कुछ नेता केजरीवाल को आरएसएस का आदमी और आम आदमी पार्टी को बीजेपी की बी-टीम मान रहे हैं पर उन्हें शिवसेना से आए उग्र हिंदुत्व के समर्थक रहे, बाल ठाकरे के चरण स्पर्श करने वाले संजय निरुपम को मुंबई की कमान सौंपने पर कोई एतराज़ नहीं है.
आख़िर क्या वजह है कि जब से आम आदमी पार्टी दिल्ली राज्य में सत्ता में आई है तभी से वो सबके आंख की किरकिरी बनी हुई है?
इसे समझने के लिए पहले एनजीओ की राजनीति को समझना होगा क्योंकि राजनीति में आने से पहले अरविंद केजरीवाल एनजीओ 'आंदोलन' से जुड़े थे और एनजीओ के तौर तरीक़ों को वो ही भारतीय राजनीति में लाए हैं.
एनजीओ का काम करने वाले जानते हैं कि उनके लिए हर कार्रवाई एक 'प्रोजेक्ट' होता है — भूख से लेकर पर्यावरण संरक्षण, युवा लड़के लड़कियों में कंडोम को प्रचलित करने से लेकर दलित और महिला सशक्तिकरण, आदिवासी नृत्य और कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने से लेकर भूमिहीन किसानों का आंदोलन तक.

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एनजीओ मॉडल की राजनीति
प्रोजेक्ट हासिल के लिए पहले प्रोपोज़ल बनाया जाता है, फिर उसे डोनर या दानदाता संगठनों को भेजा जाता है और ऐसे पेश करना होता है कि अगर ये प्रोजेक्ट नहीं हुआ तो धरती फट जाएगी, आसमान आग उगलने लगेगा, महामारी फैल जाएगी और गणतंत्र ध्वस्त हो जाएगा.
प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग मिल गई तो एनजीओ से जुड़े सभी कार्यकर्ता जी जान से उसे पूरा करने में जुट जाते हैं.
इस काम के लिए आदर्शवादी नौजवान लड़के-लड़कियों की ज़रूरत होती है.
विश्वविद्यालय, आर्ट्स कॉलेज, आर्किटेक्चर स्कूल और कला-संस्कृति से जुड़े संस्थान ऐसे नौजवानों की अबाध सप्लाई सुनिश्चित करते हैं.
इन नौजवानों को प्रोजेक्ट की ज़रूरत और अहमियत बताई जाती है. ये नौजवान फ़ौज एक बड़े सामाजिक बदलाव की उम्मीद में कुर्ता पहने और झोला टांगे दिन रात काम में जुट जाती है.
उनके हाथों में ढपली और गिटार होते हैं और होंठों पर इंक़लाब के गीत. उनकी आँखों में नए समाज का सपना होता है और उनके जज़्बों में व्यवस्था विरोध की ठसक. पर जैसे ही एक प्रोजेक्ट ख़त्म होता है, दूसरे की तैयारी शुरू हो जाती है.

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एनजीओ मॉडल की खामियां
एनजीओ मॉडल इस मायने में कमाल का मॉडल है कि वो व्यवस्था विरोध और प्रगतिशील राजनीति करने की ग़फ़लत बनाए रखता है पर दरअसल वो लोगों को अराजनैतिकता की ओर ले जाता है.
अराजनीतिक बनाना या अ-राजनीति की ओर ले जाना भी दरअसल एक ख़ास तरह की राजनीति है पर इस समय उस बहस में हम नहीं उलझेंगे.
अरविंद केजरीवाल की राजनीति दरअसल एनजीओ मॉडल की राजनीति है जो मौजूदा राजनीतिक विमर्श और राजनीतिक पार्टियों और विचारधाराओं को घटिया, ग़ैरज़रूरी और जड़ साबित करके अपनी अहमियत स्थापित करना चाहती है.
ये विचारधारा से परे की राजनीति है और बहुत से लोग मानते हैं कि ये विचार-शून्यता की राजनीति है.

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'आप' की राजनीति
इसलिए आप पाएंगे कि आम आदमी पार्टी में जहां एक ओर कुमार विश्वास जैसे हिंदुत्व समर्थक हैं तो वामपंथी विचारों वाली आतिशी मारलीना भी.
आप के नेताओं की बातों से कभी आपको समाजवादी समाज के सपने की झलक मिलेगी तो कभी आशुतोष जैसे 'आप' नेता खुले बाज़ार की हिमायत करते मिलेंगे.
आम आदमी पार्टी की राजनीति का प्रस्थान बिंदु भ्रष्टाचार रहा. भ्रष्टाचार ज़ीरो-रिस्क मुद्दा है. इससे न किसी की भावनाएँ आहत होती हैं और न किसी को भेदभाव की शिकायत रहती है.
इसीलिए जितने जोश ख़रोश से आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बात करती है उतने जोश ख़रोश से वो भारत जैसे जटिल समाज की दूसरी गंभीर समस्याओं मसलन सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थानों और तरक़्क़ी में आरक्षण के मुद्दे पर खुलकर बात करने से कतराती नज़र आती है.
हाल के चुनावी नतीजों से सबक़ सीखकर वो अब देशद्रोह-देशप्रेम और मुसलमानों की लिंचिंग पर भी रणनीतिक चुप्पी साधने लगी है.

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विश्वसनीयता का सवाल
राजनीति के एनजीओ-करण के साथ साथ अरविंद केजरीवाल ने 'घर में घुसकर मारूँगा' टाइप की छापामार राजनीति की शुरुआत की और इस प्रक्रिया में कई दुश्मन खड़े कर लिए.
दिल्ली में तीन बार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को उनके विधानसभा क्षेत्र में जाकर पछाड़ने के बाद उनके और मुकेश अंबानी के ख़िलाफ़ एफ़आइआर दर्ज करवाने का उन्हें शुरुआती फ़ायदा मिला लेकिन उन मामलों में आगे न बढ़ पाने की लाचारी से उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए.
विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने के और कारण भी हैं. जो आदमी ख़ुद को नरेंद्र मोदी की काट साबित करने के लिए बनारस जाकर उनसे भिड़ गया और 'सर्जिकल स्ट्राइक' सहित हर मुद्दे पर प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ता था, पंजाब विधानसभा और दिल्ली नगर निगम में मिली करारी हार के बाद अब मोदी पर राजनीतिक चुप्पी साधने लगा है.
लोगों को इसके पीछे की राजनीति समझ में आती है. वरना क्या कारण है कि अपने बजट का 41 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा और स्वास्थ्य पर (24 प्रतिशत शिक्षा पर और 17 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर) ख़र्च करने वाली जो सरकार गवर्नेंस का मॉडल खड़ा कर सकती थी, उसके हाथों से जन समर्थन फ़िलहाल मुट्ठी की रेत की तरह छीजता नज़र आ रहा है?
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