पहली बार 'हारने के लिए' ही मुख्यमंत्री बने थे नीतीश!

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
नीतीश कुमार ने शुक्रवार को राष्ट्रपति पद के लिए मीरा कुमार की उम्मीदवारी पर यह कहते हुए सवाल खड़ा किया कि उन्हें 'हारने के लिए' उम्मीदवार बनाया गया है.
नीतीश ने ये बातें राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की इफ़्तार पार्टी से लौटने के बाद मीडिया से कही थीं.
लेकिन ऐसे कई मौके आए हैं जब खुद नीतीश और उनकी पार्टी ने हार तय होने के बावजूद अपनी उम्मीदवारी जताई है, चुनाव लड़ा है, उम्मीदवारों का समर्थन किया है.
दिलचस्प यह भी है कि नीतीश आज जिस राष्ट्रपति चुनाव में एक उम्मीदवार को 'हारने वाले' बताकर समर्थन करने को तैयार नहीं दिखाई देते, ऐसे ही एक दूसरे मौके पर वे 'हारने वाले' उम्मीदवार का समर्थन कर चुके हैं.
वाकया 2007 के राष्ट्रपति चुनाव का है. तब यूपीए की उम्मीदवार प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के मुकाबले निर्दलीय भैरो सिंह शेखावत चुनाव मैदान में थे. शेखावत को एनडीए का समर्थन था.

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तब कहा था- हर मुकाबले में एक मैसेज होता है
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद याद करते हैं, "शेखावत की हार तय थी, लेकिन तब नीतीश एनडीए के साथ थे तो उन्होंने शेखावत का साथ दिया. ऐसे में आज उसूली तौर पर नीतीश अपना स्टैंड बदल रहे हैं न कि कोई दूसरा."
हार लगभग तय होने के बाद भी पद संभालने का एक दूसरा उदाहरण खुद नीतीश से जुड़ा है. 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.
वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार याद करते हैं, "तब राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना था कि नीतीश के पास बहुमत नहीं था. इसके बावजूद तब राज्यपाल का निमंत्रण मिलने पर उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. तब शायद वे यह सोच कर बहुमत जुटाने उतरे थे कि हर मुकाबले का एक मैसेज होता है."
तब नतीजा ये हुआ कि पद संभालने के सातवें ही दिन नीतीश ने विश्वास मत का सामना किए बगैर विधानसभा में इस्तीफ़े की घोषणा कर दी थी.

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दिल्ली नगर निगम में क्यों उतरे थे?
वहीं नीतीश कुमार की पार्टी जदयू की बात करें तो बतौर पार्टी बहुत कमजोर होने के बावजूद वह कई राज्यों के चुनाव में उतर चुकी है.
सुरुर अहमद बताते हैं, "2012 के उत्तर प्रदेश चुनाव में जदयू ने बड़े पैमाने पर चुनाव लड़ा था, यह जानते हुए भी कि वह कोई सीट नहीं जीतने वाली. नतीजा ये कि पार्टी ने जमानतें जब्त करवाईं. पार्टी को अपनी ताकत पता थी लेकिन इसके बावजूद वह हालिया दिल्ली नगर निगम चुनाव में उतरी. ऐसे उदाहरण बहुत हैं."
माना यह भी जाता है कि 2004 के आम चुनाव में नीतीश ने बाढ़ संसदीय क्षेत्र से हार सुनिश्चित मानकर ही तब बाढ़ के साथ-साथ नालंदा से भी चुनाव लड़ा था.
तब बाढ़ से वे चुनाव हारे भी. वहीं नीतीश के चुनावी करियर की शुरुआत 1977 और 1980 में विधानसभा चुनाव हार से ही हुई थी.
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