नज़रिया: ट्रंप का साथ क्यों नहीं निभा रहे नरेंद्र मोदी?

डोनल्ड ट्रंप

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    • Author, चंद्रभूषण
    • पदनाम, उपमहानिदेशक, सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप 'पेरिस समझौते' को भी व्यापार समझौते की तरह ही देख रहे हैं. पेरिस समझौते के तहत 195 देशों ने संकल्प लिया था कि वो विश्व का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा बढ़ने नहीं देंगे. यह लक्ष्य अब दूर होता नज़र आ रहा है.

आज भारत का तापमान औद्योगिकीकरण के दौर के पहले की तुलना में 1.2 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा है. इसकी वजह से देश में कहीं सूखा बढ़ता जा रहा रहा है तो कहीं बाढ़ से लोग परेशान हैं.

मॉनसून पर बुरा प्रभाव

गर्मियों में लहर की वजह से भी सैकड़ों लोग मर रहे हैं. जबकि तापमान सिर्फ़ एक डिग्री बढ़ा है और इतना बदलाव देखने को मिल रहा है. जब दो डिग्री तक यह बढ़ जाएगा तो सोचना भी मुश्किल है कि तब क्या होगा.

पर्यावरण प्रेमियों का प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, अमरीका के पेरिस समझौते से बाहर जाने के फ़ैसले के बाद न्यूयॉर्क में पर्यावरण प्रेमियों ने प्रदर्शन किया

भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से मॉनसून पर निर्भर है. कृषि पर निर्भर रहने वाले लोगों में 60 प्रतिशत ऐसे हैं जो पूरी तरह से मॉनसून के भरोसे रहते हैं. जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव मॉनसून पर पड़ेगा. अगर अमरीका अपने 'ग्रीन हाउस गैस' का उत्सर्जन कम नहीं करेगा तो भारत पर इसका बहुत ही बुरा असर पड़ेगा.

अगर इतिहास को देखें तो पूरे विश्व में जो 'ग्रीन हाउस गैस' का उत्सर्जन हुआ है उसमें अकेले अमरीका का योगदान 21 प्रतिशत है. तो बात साफ़ है. जिसने पर्यावरण को जितना प्रदूषित किया है उसको उतने ही उपाय भी करने पड़ेंगे और पर्यावरण के संरक्षण के लिए उतनी रक़म भी देनी पड़ेगी. अगर वाक़ई पर्यावरण को बचाना है तो अमरीका को भी 21 प्रतिशत ज़िम्मेदारी लेनी पड़ेगी.

व्यापार समझौता नहीं पेरिस समझौता

जहाँ तक बात कोयले की है, जिसे लेकर अमरीका भारत पर आरोप लगा रहा है. तो सच्चाई ये है कि आज भी अमरीका भारत से ज़्यादा कोयले का इस्तेमाल और खपत करता है. वो भारत और रूस की तुलना में गैस का उत्पादन और इस्तेमाल भी ज़्यादा करता है. आज भी अमरीका विश्व का सबसे ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाला देश है.

जलवायु प्रदूषण

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ज़ाहिर सी बात है कि अमरीका में आज भी हर व्यक्ति 15,000 किलोवाट बिजली खर्च करता है. जबकि भारत में आज भी 30 करोड़ लोगों के पास बिजली नहीं है.

भारत में ये औसत 1000 किलोवाट प्रति व्यक्ति है. चीन और भारत से जो तुलना अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं, ये उनकी नासमझी है. इसलिए क्योंकि भारत आज भी ग़रीब और विकासशील देश है.

बुनियादी मुद्दा ये है कि डोनल्ड ट्रंप 'पेरिस समझौते' को व्यापार समझौता समझ रहे हैं. वो एक उद्योगपति रहे हैं इसलिए हर समझौते को उसी पैमाने पर तौल कर देखते हैं. उन्हें 'पेरिस समझौता' समझ में नहीं आ रहा है.

बंद कर दिया पैसा देना

समझौते से नहीं हटने के लिए होने वाला प्रदर्शन

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वैसे भी डोनल्ड ट्रंप की घोषणा से पहले ही अमरीका ने पैसे देने बंद कर दिए थे. जहाँ तक बात उनके बयान की है तो भारत और चीन को पैसों की ज़रूरत नहीं है. ये ज़रूरत तो 120 ग़रीब देशों की है.

अब भारत को चाहिए कि वो अमरीका से कहे कि जितना 'कार्बन' उत्सर्जन उसे कम करना है बस उतना ही कर दे तो पूरे विश्व का भला हो जाएगा.

भारत को अमरीका से यह भी कहना चाहिए कि न हमको आपकी आर्थिक मदद की ज़रूरत है और ना ही तकनीक. आप तो बस कार्बन उत्सर्जन कम कर दीजिए.

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