असम में गोबर क्यों ढूंढ रही रमन सरकार

जंगली भैंसा, छत्तीसगढ़

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    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

छत्तीसगढ़ सरकार इन दिनों भैंस के गोबर के लिए परेशान है. इसके लिए राज्य के वन विभाग का अमला पशु वैज्ञानिकों के साथ असम के जंगलों की ख़ाक छान रहा है. लेकिन ये कोई ऐसी-वैसी भैंस नहीं है.

असल में छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वनभैंसा है और राज्य में वनभैंसा लुप्त होने के कगार पर है. राज्य के उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व में केवल 11 वनभैंसे बचे हैं.

यहां तक कि इस राजकीय पशु की क्लोनिंग भी हुई, फिर भी इन वनभैंसों की वंशवृद्धि नहीं हो रही है.

राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी आरके सिंह के अनुसार, "असम के वनभैंसे की नस्ल को शुद्ध माना जाता है. हमारी योजना वहां से कुछ वन भैंसों को छत्तीसगढ़ शिफ्ट करने की है. जिन इलाकों के वन भैंसों के डीएनए छत्तीसगढ़ के वन भैंसों के डीएनए के समान या मिलते-जुलते होंगे, उन्हीं इलाकों के वन भैंसों को छत्तीसगढ़ लाया जाएगा."

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आरके सिंह का कहना है कि फ़िलहाल डीएनए जांच के लिए असम के वन भैंसों के गोबर एकत्र किए जा रहे हैं. इसके लिए वन विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी और वन्यजीव विशेषज्ञ असम में डेरा डाले हुए हैं.

हालांकि असम के जंगलों से इन वन भैंसों का गोबर एकत्र करने का काम भी छत्तीसगढ़ सरकार के लिए आसान नहीं था.

रमन सिंह

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वनभैंसा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 का जानवर है. इसी श्रेणी में बाघ या हाथी जैसे जानवरों को रखा गया है.

छत्तीसगढ़ सरकार ने जब असम के वन विभाग से वन भैसों का गोबर एकत्र करने की अनुमति मांगी तो असम सरकार ने छत्तीसगढ़ को मना कर दिया.

असम सरकार का तर्क था कि वनभैंसा अनुसूची-1 की प्रजाति का वन्यजीव है. इसलिए इसके किसी भी हिस्से या गोबर या मूत्र जैसे उत्सर्जित पदार्थ जमा करने के लिए वन्यजीव के महानिदेशक की अनुमति लेनी होगी.

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यानी इस पूरी प्रक्रिया में फिर से फ़ाइलें इधर-उधर होतीं और महीने गुजरते जाते. बाद में अधिनियमों का हवाला दिए जाने के बाद असम सरकार ने छत्तीसगढ़ को वन भैंसों का गोबर एकत्र करने की अनुमति दे दी.

छत्तीसगढ़ में पिछले एक दशक से भी अधिक समय से वन भैंसों की वंश वृद्धि की कोशिश में तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने वाले वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के डॉक्टर राजेंद्र मिश्रा का कहना है कि छत्तीसगढ़ में वन भैसों की वंश वृद्धि का काम आसान नहीं है.

डॉक्टर मिश्रा के अनुसार करनाल के नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिट्यूट के सहयोग से वन भैंसे की पहली क्लोनिंग 2014 में की गई और दीपाशा नामक एक मादा वनभैंसा का जन्म भी हुआ.

हाल ही में उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व के कुछ वन भैसों में सेटेलाइट कॉलर आईडी भी लगाए हैं. अब डीएनए मैपिंग के लिए गोबर के नमूने का संकलन इसी काम का विस्तार है.

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मिश्रा कहते हैं, "हमने इससे पहले भी देश के विभिन्न हिस्सों से वन भैसों के डीएनएन के 69 नमूने एकत्र किए हैं. हमारी कोशिश केवल इतनी भर है कि वनभैंसों की वंश वृद्धि हो. राज्य सरकार पूरी तरह से विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन और शोध के बाद ही असम से वनभैसों को लाए जाने के पक्ष में है."

राज्य के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान और पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य में भी वनभैंसे हैं, लेकिन आज तक उनका अध्ययन नहीं हो पाया है.

इसी तरह उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व में कुछ साल पहले तक 82 वन भैंसे थे जो आज सिमट कर 11 रह गए हैं. क्लोनिंग से पैदा हुई दीपाशा वंश वृद्धि में सहायक होगी, इसे लेकर भी संशय है.

ऐसे में असम के वनभैंसों के गोबर और उसकी जांच के निष्कर्ष पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं.

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