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नज़रिया: 'डिग्री कॉलेज के छात्रनेता की तरह बोलने लगे हैं मोदी'
- Author, अनिल यादव
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भाजपा के लिए 'करो या मरो' वाले यूपी के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नए कोण से रोशनी पड़ रही है. राजनेता के बजाय उनका व्यक्ति सामने आ गया है जिसकी खीज, झल्लाहट और आक्रामकता छिपाए नहीं छिप रही है.
नतीजा यह हुआ है कि उनके निशाने लगातार चूक रहे हैं, वे भूकंप जैसी आपदा को भी विरोधियों पर हमले के लिए अचानक हाथ लग गए हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं जिसका लिहाज संवैधानिक पदों पर बैठने वाले हर हाल में करते आए हैं. वे इससे भी आगे बढ़कर विपक्ष को धमकाने लगे हैं.
बॉडी लैंग्वेज
नोटबंदी की अवधि समाप्त होने पर गए साल के आखिरी दिन देश के नाम संबोधन में दिखने लगा था कि प्रधानमंत्री के भाषण से रवानी लुप्त हो गई है और उनकी बॉडी लैंग्वेज बदल चुकी है.
इसका कारण यह था कि सरकार की कुव्यवस्था से जनता को दो महीने तक हुई परेशानियों को कुर्बानी और अर्थव्यवस्था की तबाही को तरक्की बताते हुए वे अपने भीतर संघर्ष कर रहे थे. वे एक अधकचरे फैसले के परिणामस्वरूप हुए भयानक अनुभवों की चमक का बयान कर रहे थे.
दूसरे बड़े नेता
मोदी को देशव्यापी स्वीकृति और पिछले लोकसभा चुनाव में झन्नाटेदार जीत दिलाने में उनके भाषणों का बड़ा योगदान था. तब वे दस साल की सत्ता से उपजे कांग्रेसियों के अहंकार, वंशवाद और भ्रष्टाचार पर भावनात्मक चोट करते हुए जनता को अपने साथ भारत को महाशक्ति बनाने के दिवास्वप्न में बहा ले जाते थे.
पृष्ठभूमि में उनके "गुजरात का शेर" होने का कीर्तन चलता रहता था. लेकिन नोटबंदी के बाद आए यूपी के चुनाव में उनकी भाषणों से पोलिटिकल कंटेंट गायब है. वे अपने विरोधियों पर हमला करने की उतावली में डिग्री कॉलेज के छात्र नेताओं की तरह भाषण देने लगे हैं जिसका अनुसरण भाजपा के दूसरे बड़े नेता भी कर रहे हैं.
सपा-बसपा-कांग्रेस
लोकसभा चुनाव में मोदी ने यूपी के विरोधियों को "सबका" (सपा-बसपा-कांग्रेस) के ज़रिए चिन्हित किया था, इस बार स्कैम (सपा-कांग्रेस-अखिलेश-मायावती) ले आए हैं. इस चूक को अपने दिग्गज पिता से खुले संघर्ष में पार्टी छीन लेने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज अखिलेश यादव ने लपक लिया है.
अखिलेश कह रहे हैं इसमें भूल से मायावती को शामिल कर लिया गया है जिनके साथ भाजपा तीन बार सरकार बना चुकी है. भाजपा मायावती से अपने रिश्ते का जिक्र करने से अब झेंपती है. वह स्कैम को "सेव कंट्री फ्राम अमित-मोदी" के रूप में ढाल कर जवाब दे रहे हैं.
भाजपा की आंधी
उनके गठबंधनी जोड़ीदार राहुल गांधी इसे सर्विस, करेज, एबिलिटी और मॉडेस्टी के रूप में ढाला. साथ में "मेक इन इंडिया" के बहुचर्चित जुमले का जवाब दिया कि खुद मोदी चाइनीज मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं.
इसके बाद मोदी ने पांच साल सरकार चला चुके अखिलेश यादव तस्वीरकशी ऐसे लड़के के रूप में की जो भाजपा की आंधी देखकर डर के मारे कांग्रेस के खंभे से लिपट गया है. अखिलेश ने जवाब दिया, समाजवादियों को आंधी में साइकिल चलाना आता है और भाजपा की कोई हवा नहीं है.
अखिलेश-राहुल
इसी समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अखिलेश-राहुल की जोड़ी को बिगड़ैल शहजादों के रूप में चित्रित करते हुए बता रहे हैं कि एक से उसकी मां और दूसरे से बाप परेशान है.
उनके बीते जमाने के परिवारिक मूल्यों के चौकीदार की नैतिक मुद्रा युवाओं को रास नहीं आई और विरोधियों को मोदी की पत्नी जसोदा बेन के साथ संबंधों की याद दिलाने का अवसर मिल गया. मोदी की भटकी हुई आक्रामकता को दूसरे भाजपा नेताओं ने भी पार्टी लाइन की तरह पकड़ लिया है.
भारी चूक
राहुल गांधी ने सपा से गठबंधन को गंगा जमुना का मिलन बताया तो भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने दोनों की तुलना गंगा-जमुना में गिरने वाले गंदे नालों से की. उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली में आए हालिया भूकंप को राहुल गांधी का मजाक बनाने के लिए इस्तेमाल करते हुए मोदी ने एक भारी चूक की.
वे भूल गए कि करोड़ों लोग उस रात जान माल के नुकसान के आतंक में जी रहे थे, उनके साथ सहानुभूति जताने के बजाय, उन्होंने कहा कि नोटबंदी के समय राहुल ने अपने मुंह खोलने पर जिस भूकंप के आने के बात की थी वह अब आया है. जब कोई स्कैम में सेवा और साहस देखने लगता है तो धरती मां नाराज होकर भूकंप लाती है.
मोदी की खिंचाई
सोशल मीडिया पर इस संवेदनहीनता के लिए मोदी की काफी खिंचाई हो रही है. इसी बीच मोदी द्वारा संसद में बताई गई पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के रेनकोट पहन कर नहाने की कला पर चुनाव में जुटे आरएसएस के एक पुराने प्रचारक ने हैरानी जताई है.
उन्होंने कहा, "मोदी जी को हो क्या गया है कि वे अपने भाषणों में अब विदेशी मुहावरों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं जिनके असंगत होने के कारण विरोधियों को मौका मिलता है. अगर वे इसे मनमोहन सिंह का "कंबल ओढ़कर घी पीना" कहते तो शायद इतनी फजीहत न होती."
पूरी जन्मपत्री
राहुल गांधी ने तत्काल उन्हीं के मुहावरे को विस्तार देते हुए सवाल उठाया कि वे दूसरों के बाथरूम में झांकते हैं वरना कैसे पता चलता कि कौन कैसे नहा रहा है.
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने धमकाया, जबान संभाल कर रखो, वरना मेरे पास आपकी पूरी जन्मपत्री पड़ी हुई है. मैं विवेक और मर्यादा छोड़ना नहीं चाहता हूं लेकिन आप अनाप शनाप बातें करेंगे तो आपके कुकर्म आपको छोड़ेंगे नहीं.
लगता है संवाद की यह शैली मोदी ने सोच समझ कर नहीं चुनी है, शब्द उत्तेजना में उनके मुंह से फिसल जा रहे हैं वरना वे इसे किसी निर्णायक मुकाम तक पहुंचने तक जारी रखते. सबसे ऊपर तो यह कि अपने विवेक और मर्यादा का उपयोग राहुल गांधी को सिर्फ जवाब देने से रोकने में नहीं करते.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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