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उत्तराखंड: बाग़ियों से कितनी मुसीबत में बीजेपी-कांग्रेस?
- Author, शिव जोशी
- पदनाम, देहरादून से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
उत्तराखंड में इस बार का विधानसभा चुनाव बाग़ियों का चुनाव बन गया है. दोनों प्रमुख दलों कांग्रेस और बीजेपी में जहां देखो वहीं बग़ावत.
कांग्रेस ने 24 बाग़ियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है तो वहीं बीजेपी ने 51 बाग़ी नेताओं को पार्टी से निकाल दिया है.
इस मामले में बीजेपी की हालत ज़्यादा पतली नज़र आती है. कांग्रेस के बाग़ी नौ विधायक बीजेपी के निशान पर चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के बाग़ियों के चलते बीजेपी में बग़ावत हो गई है.
अपने-अपने क्षेत्रों में इन बाग़ी नेताओं की अच्छी पैठ है और इसलिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों को भितरघात की चिंता भी सता रही है.
एक तरह से बीजेपी में एक चौथाई उम्मीदवार पूर्व कांग्रेसी हैं. ज़ाहिर है टिकट की आस लगाए पार्टी नेता पहले मायूस हुए फिर बाग़ी और सबसे आख़िर में निर्दलीय उम्मीदवार बन गए.
और अब कई सीटों पर पार्टियों के आधिकारिक प्रत्याशियों की सांसें फुला रहे हैं.
दलबदल और बग़ावत से अंदरख़ाने परेशान मुख्यमंत्री हरीश रावत दम भरते हुए कहते हैं, "अब उत्तराखंडियत और खंड-खंड वाली भाजपा के बीच मुक़ाबला है."
तोड़-फोड़ और पाला बदलने का आलम ये रहा कि चुनावों के एलान के ठीक बाद एक रोज़ सुबह कांग्रेस के प्रमुख दलित नेता यशपाल आर्य ने बीजेपी का दामन थामा और शाम तक अपने और अपने बेटे के लिए टिकट ले आए.
टिकट न मिलने से हताश कई नेता इस दौरान चीख़े चिल्लाए, ख़ूब फूट-फूट कर रोए, गंगा की क़समें खाईं और जमकर शाप बरसाए.
ऋषिकेश से कांग्रेस टिकट की आस लगाए पूर्व राज्यमंत्री विजयलक्ष्मी गुसाईं ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फ़ैसला करते हुए मुख्यमंत्री हरीश रावत को ख़ूब खरी-खोटी सुनाई.
उन्होंने रोते और चीख़ते हुए कहा, "मुख्यमंत्री को एक ही संदेश देना चाहती हूं कि ये उत्तराखंड महिलाओं की अस्मिता का उत्तराखंड है. यहां जो तिवारी जी ने किया था तो उनका भी सत्यानाश हुआ. जो महिलाओं के साथ ऐसा करेगा उसका सत्यानाश होगा, सत्यानाश होगा, सत्यानाश होगा. क्योंकि हमारे जज़्बे से खेला गया है. मुख्यमंत्री ने हमारे साथ धोखा किया. गंगा की क़सम खा रही हूं कि मैं निर्दलीय चुनाव जीतकर दिखा दूंगी."
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय कहते हैं, "हम सब साथियों का सम्मान करते हैं, लेकिन टिकट 70 ही हैं हज़ार टिकट नहीं दे सकते हैं. इस चीज़ को भी समझाना चाहिए सभी साथियों को."
45 साल से बीजेपी से जुड़े नेता सूरत राम नौटियाल का उत्तरकाशी की पुरोला सीट से टिकट कटा तो उनका दर्द आंसुओं में फूट पड़ा.
उन्होंने रोते-रोते प्रेस कांफ्रेंस की और कहा, "अगर मैं भी अमीर होता, गोपाल सिंह जैसा होता, एक करोड़ रुपए दे देता और टिकट ले आता तो....."
नौटियाल फिर बिलखने लगते हैं.
बीजेपी सरकार में पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता और दलबदल के लिए चर्चित रहे मातबर सिंह कंडारी रुद्रप्रयाग सीट से बेटे के लिए टिकट चाह रहे थे.
बीजेपी ने अनदेखी की तो वे फ़ौरन पाला बदलकर कांग्रेस के पास चले गए.
वहां टिकट तो नहीं मिला, लेकिन भड़ास निकालने का मौक़ा ज़रूर मिल गया.
कंडारी ने शायरी में अपनी व्यथा सुनाई, "किस-किस की नज़र देखूं, मैं सबकी नज़र में रहता हूं....क़िस्मत ही ऐसी मिली है हमेशा निशाने पर रहता हूं."
कंडारी आख़िर यहां से वहां क्यों करते रहते हैं, तो इसका जवाब भी इस बुज़ुर्ग नेता ने बड़े नाटकीय अंदाज़ में गढ़वाली मिश्रित हिंदी में दिया, "कोई व्यक्ति किसी घर में रहता है और उस घर की चारों दीवारें 'खचपचा' रही हों तो जान बचाने के लिए व्यक्ति कहीं तो शरण लेगा."
देहरादून की रायपुर सीट से पिछले चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार रहीं, मशहूर किन्नर नेता रजनी रावत को कांग्रेस से टिकट नहीं मिला तो उन्होंने निर्दलीय पर्चा दाख़िल कर दिया.
रावत कहती हैं, "मैं न कांग्रेस को कुछ समझूं न बीजेपी को कुछ समझूं. पहले भी मैं इन्हें कुछ न समझूं. उन्हें आदत पड़ गई है. राखी बंधवा लेते हैं, भाई बन जाते हैं और काम निकल जाता है तो फेंक देते हैं. सिर्फ़ उनका स्वार्थ है."
रजनी रावत देहरादून की दो सीटों से मैदान में हैं.
मुख्यमंत्री हरीश रावत भी दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं. दो ही नेता ऐसे हैं.
इस पर रजनी रावत अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहती हैं, "मैं कोई सीएम से कम नहीं हूं. रजनी रावत हूं मैं भी."
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