आम बजट: सरकार के सामने चुनौतियां और क्या हैं रास्ते

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- Author, एम के वेणु
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार बुधवार यानी 1 फ़रवरी को आम बजट पेश करने जा रही है. ऐसा पहली बार है जब आम बजट 1 फ़रवरी को पेश किया जा रहा है. रेल बजट को भी आम बजट का ही हिस्सा बना दिया गया है. पहले रेल बजट और आम बजट फ़रवरी महीने के आख़िरी हफ्ते में पेश किए जाते थे. लेकिन सरकार ने ये बदलाव इस सोच के साथ किया है कि नए वित्त वर्ष की शुरुआत से पहले बजट को पारित करने संबंधी की सभी प्रक्रियाएं पूरी हो जाएं.
वित्त मंत्री अरुण जेटली और इस सरकार दोनों के लिए ही ये बजट चुनौती भरा है. नोटबंदी को लेकर सरकार ने जो हिसाब-किताब लगाया था, उसमें गड़बड़ हो गई है.
भले ही वे सार्वजनिक तौर पर ये कहें कि इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है, लेकिन विश्व मुद्रा कोष और कई दूसरी संस्थाओं ने कहा है कि जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का विकास दर कम से कम एक फीसदी तो जरूर गिरेगा.
देश के छोटे उद्योगों और कृषि क्षेत्र पर भी बड़ी मार पड़ी है. मेरे हिसाब से डेढ़ से दो करोड़ दिहाड़ी मजदूर देश में बेरोजगार हुए हैं. नोटबंदी से पहले भी देश में विकास दर गिर रहा था और बेरोजगारी बढ़ी थी.
मोदी ने की मुआवजे की बात
नोटबंदी ने इसके ऊपर और चोट की है. सरकार ने अपने आर्थिक सर्वेक्षण में भी नोटबंदी के खतरे की बात मानी है और कहा है कि इसका असर अगले साल तक रहेगा.
सरकार को एक तरफ तो अर्थव्यवस्था संभालनी है और दूसरी तरफ नोटबंदी से परेशान हुए लोगों को राहत भी देनी है. ऐसा लगता है जैसे सरकार दो पाटों के बीच फंस गई है.
सरकार ने खुद माना है कि नोटबंदी से लोग परेशान हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुआवजे की बात भी कही है. हालांकि ये तय नहीं है कि राहत किस तरह की होगी.

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यूपी चुनाव
आर्थिक सर्वेक्षण में यूनिवर्सल बेसिक इनकम या सभी गरीबों को दी जाने वाली एक बुनियादी आमदनी की बात की गई है. खासकर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, खेती में लगे लोगों, कंस्ट्रक्शन वर्कर्स को उम्मीद तो है कि सरकार उनके लिए कुछ करेगी.
बिजनेस सेक्टर से जुड़े लोग भी थोड़े नाराज हैं कि जो वायदे किए गए थे, वे पूरे नहीं किए गए. ये सरकार दोनों ही तरह से फंसती हुई दिख रही है.
दो-तीन महीने में सरकार के तीन साल पूरे हो जाएंगे. सरकार के लिए यकीनन ये मुश्किल स्थिति है. बजट के बाद उत्तर प्रदेश चुनाव में बीजेपी यदि हारती है तो मुश्किल होगी.

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नोटबंदी और विधानसभा चुनाव
लोग नोटबंदी को समर्थन देने की बात कह तो रहे हैं, लेकिन जिन्हें तकलीफ हुई है वे किस तरह से साथ देंगे. ये देखने वाली बात होगी.
चुनाव हारने की सूरत में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ पार्टी के अंदर से ही आवाज उठ सकती है. इन हालात में ये उम्मीद तो की जा रही है कि सरकार बजट में गरीबों के लिए कुछ करेगी, लेकिन अभी तक सरकार ने कुछ खास किया भी नहीं है.
इस बीच दो सवाल सबके सामने हैं. पहला तो ये कि चुनाव आयोग ने इलेक्शन वाले राज्यों के लिए किसी तरह की घोषणा न करने को लेकर सरकार को नसीहत दी है.

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किसानों के लिए
दूसरा ये कि 31 दिसंबर, 2016 को प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कई घोषणाएं की थीं. क्या इसके बाद बजट भाषण में वित्त मंत्री के कहने के लिए कुछ बचा है.
31 दिसंबर को प्रधानमंत्री की घोषणाओं में मौजूदा कार्यक्रमों के दायरे का विस्तार किया गया था. ये घोषणाएं बजट सब्सिडी, किसानों और घर के लिए सस्ते कर्ज से जुड़ी थीं.
मेरा मानना है कि सरकार बजट में किसानों के लिए जरूर कुछ न कुछ एलान करेगी. ये बात भी सही है कि वे उत्तर प्रदेश का नाम तो नहीं लेंगे, लेकिन चाहे योजनाएं किसानों के लिए हो या गरीबों के लिए, इनकी बड़ी तादाद यूपी में रहती है, इसलिए इनका फायदा यूपी को तो होगा ही.

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पब्लिक मूड
जाहिर है कि पार्टी को इसका फायदा होगा. वे चुनाव आयोग के आदेश के उल्लंघन से बचते हुए भी ऐसा कर सकते हैं.
लेकिन इनके लिए कुछ करने से पहले सरकार बजट घाटे को अपने दिमाग में जरूर रखेगी.
इसमें कोई शक नहीं कि बजट लोकप्रिय पब्लिक मूड को ध्यान में रखकर लाया जाएगा, लेकिन सरकार ने अपने लिए क्या लक्ष्मण रेखा खींची है, इसका पता बजट में ही लग पाएगा.

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वेतनभोगी मध्यवर्ग
अखबारों में और दूसरे समाचार माध्यमों में इनकम टैक्स के स्लैब में राहत देने की भी खबरें आ रही हैं. बजट से वेतनभोगी मध्यवर्ग को भी थोड़ी-बहुत राहत की उम्मीद है.
नोटबंदी के वक्त उन्होंने भी काफी तकलीफें झेलीं थीं. लेकिन ये भी नहीं भूलना चाहिए कि देश में तीन फीसदी आबादी ही इनकम टैक्स भरती है.
लेकिन नोटबंदी की असली मार झेलने वाले लोग इनकम टैक्स के दायरे से बाहर हैं. ये दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग हैं, असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोग हैं, किसान हैं, मजदूर हैं.
(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)
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