प्रभु जी, 'ज़ीरो एक्सिडेंट पॉलिसी' कब लागू होगी!

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- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल नया, कहानी पुरानी. सरकार देश को बुलेट ट्रेन के ख़्वाब दिखा रही है, दूसरी तरफ़ रेल हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे.
पहले मुज़फ़्फ़रनगर के क़रीब खतौली में ट्रेन पटरी से उतर गई और चार दिन के भीतर बुधवार रात औरेया में एक और हादसा हो गया.
बीते साल 20 नवंबर को कानपुर में इंदौर-राजेंद्रनगर एक्सप्रेस हादसे का शिकार हुई. इसमें 150 लोग मारे गए.
इसके कुछ ही दिनों के बाद 28 दिसंबर को अजमेर-सियालदह एक्सप्रेस पटरी से उतरी, 44 लोग ज़ख़्मी हुए.
रेलगाड़ी और हादसे की जगह बदलती रही, लेकिन हादसे वही रहे. रेल सुरक्षा के नाम पर हज़ारों रुपए खर्च करने और नई टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के दावों-वादों के बावजूद हादसों की रोकथाम नहीं हो सकी है.

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इस बार रेल बजट अलग से पेश नहीं किया जाएगा, इसलिए रेल सुरक्षा के लिए खर्च होने वाली भारी-भरकम रक़म पर शायद हमारा ज़्यादा ध्यान न जाए.
पिछले साल रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रेल बजट पेश करते हुए साफ़ कर दिया था कि इन हादसों को रोकने का सफ़र लंबा है और पूरी तरह सुरक्षित रेल यात्रा का स्टेशन अभी दूर है.
अपने बजट भाषण में ख़ुद प्रभु ने माना था कि कोई भी हादसा या क़ीमती जान का नुक़सान हमें काफ़ी दुख और निराश करता है, लेकिन 'ज़ीरो एक्सिडेंट पॉलिसी' का उद्देश्य पूरा करने में काफ़ी समय लग सकता है.
प्रभु ने कहा था, ''सुरक्षा का हमारा रिकॉर्ड बेहतर रहा और पिछले साल की तुलना में हादसे 20 फ़ीसदी कम हुए. मेरा मानना है कि भारतीय रेल को हादसे से पूरी तरह मुक्त सिर्फ़ टेक्नोलॉजी की मदद से किया जा सकता है.''

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रेल मंत्री ने बताया था कि सुरक्षा को लेकर जापान के रेलवे टेक्निकल रिसर्च इंस्टीट्यूट और कोरिया के रेल रिसर्च इंस्टीट्यूट से मदद ली जा रही है, जो ज़ीरो एक्सिडेंट पॉलिसी का रोडमैप तैयार करने में हाथ बंटाएंगे.
प्रभु ने कहा था कि इस बीच डॉ काकोदकर की अगुवाई वाली समिति की सिफ़ारिशों पर ग़ौर किया गया है और उन्हें लागू किया जा रहा है. दरअसल, भारतीय रेल दो मोर्चों पर जूझ रही है. क्रॉसिंग पर होने वाले हादसे और रेलगाड़ियों के पटरी से उतरने पर होने वाली दुर्घटनाएं.
क्रॉसिंग को लेकर पिछले साल कुछ कामयाबी ज़रूर मिली, लेकिन रेल हादसे पूरी तरह बंद नहीं हुए.
रेल मंत्री के मुताबिक़, साल 2015-16 में ऐसे 1,000 क्रॉसिंग बंद कर दिए गए, जहां रेल कर्मचारी तैनात नहीं रहते थे. इसके अलावा वैसे 350 क्रॉसिंग भी बंद कर दिए गए, जहां रेल कर्मचारी होते थे.
इसके अलावा पिछले कारोबारी साल में 820 रोड ओवर ब्रिज और रोड अंडर ब्रिज बनाए गए और 1350 ऐसे पुलों पर काम चल रहा है.

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अब बात डॉ काकोदकर कमेटी की सिफ़ारिशों की. अगर इन्हें पूरी तरह लागू किया जाता तो पांच साल में तक़रीबन एक लाख करोड़ रुपए का ख़र्च बैठेगा. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि सेफ़्टी रेगुलेशन के लिए रेलवे में स्वतंत्र मैकेनिज़्म की ज़रूरत है.
कमेटी की सिफ़ारिश थी कि यूरोपीय ट्रेन कंट्रोल सिस्टम की तर्ज़ पर भारत में भी एडवांस्ड सिग्नल सिस्टम अपनाया जाए. 19,000 किलोमीटर के ट्रंक रूट पर इस सिस्टम को चालू करने के लिए क़रीब 20,000 करोड़ रुपए चाहिए.
कमेटी का मानना था कि सभी क्रॉसिंग बंद की जानी चाहिए, लेकिन इसके लिए 50,000 करोड़ की ज़रूरत होगी. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में आईसीएफ़ डिज़ाइन कोच के बजाय ज़्यादा सुरक्षित एलएचबी डिजाइन कोच इस्तेमाल करने की बात कही थी.

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इसके अलावा सुरक्षा संबंधी मूलभूत ढांचे को दुरुस्त करने का मशविरा भी दिया गया था.
हैरानी की बात है कि 16 साल बीतने को आए, लेकिन अब तक पांच साल मियाद वाला 1 लाख करोड़ रुपए का राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष अब तक पटरी पर नहीं आया है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, वित्त मंत्रालय साल 2016-17 के दौरान रेलवे को 50,000 करोड़ की मदद देगा. यह अब तक की सबसे बड़ी रकम है. इसमें से 15 हज़ार करोड़ संरक्षा कोष के लिए होंगे, जबकि 5,000 करोड़ रेलवे अपनी जेब से देगा.
इस कोष की रकम अपनी समय सीमा पार कर चुकी संपत्तियों को दुरुस्त करने के लिए खर्च की जाएगी, जिनमें पटरी, सिग्नल सिस्टम और पुल शामिल हैं.
लेकिन लगातार होते हादसे बता रहे हैं कि डॉ काकोदकर समिति की रिपोर्ट, बार-बार इन पर क़दम उठाने का रेलवे का वादा और रेल मंत्री की ज़ीरो एक्सिडेंट पॉलिसी फ़िलहाल काफ़ी लेट हैं. सुरक्षा से जुड़े सारे वादे-दावे पटरी पर बिखरे पड़े हैं.












