उत्तर प्रदेश से क्यों दूर हैं आप?

आम आदमी पार्टी

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    • Author, विपिन पब्बी
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक

आम आदमी पार्टी (आप) ने साल 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में एक तरह से एक तरफा जीत दर्ज कर पूरे देश को अचंभित कर दिया था.

आम आदमी पार्टी अब पहली बार दिल्ली से बाहर दूसरे राज्यों में अपने लिए एक अहम भूमिका तलाशने में लगी हुई है.

पार्टी को उम्मीद है कि वो पंजाब और गोवा में बेहतर प्रदर्शन करेगी.

पार्टी को लगता है कि इन राज्यों के प्रदर्शन की बदौलत वो राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में मजबूत दखल देने की स्थिति में होगी और वो नरेंद्र मोदी की सरकार को 2019 के आम चुनाव में कड़ी टक्कर देगी.

अरविंद केजरीवाल और आप कार्यकर्ता

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इस साल पांच विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं लेकिन आम आदमी पार्टी ने इनमें से सिर्फ़ पंजाब और गोवा से चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया है.

ये दोनों ही राज्य पार्टी की सफलता के लिहाज से माकूल माने जा रहे हैं. वहीं आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के चुनाव से अपने आप को दूर रखा है.

उत्तर प्रदेश में अस्सी लोकसभा सीटें हैं जो केंद्र में बनने वाली किसी भी सरकार के लिहाज से अहम मानी जा सकती है.

बीजेपी ने 2014 के आम चुनाव में यहां अस्सी में से 71 सीटें पाई थीं.

इससे साफ पता चलता है कि आम आदमी पार्टी के पास संसाधनों की कमी है और हो सकता ही उत्तर प्रदेश में उनके पास उम्मीदवारों की भी कमी हो.

और बिना पूरी तैयारी के इतने बड़े विधानसभा चुनाव में नहीं कूदा जा सकता है.

केजरीवाल समर्थक

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अगर पार्टी को अगले आम चुनाव में अपनी दावेदारी की संभावनाओं को ज़िंदा रखना है तो फिर उत्तर प्रदेश में वो किसी भी तरह का जोखिम नहीं ले सकती है.

पार्टी ने बिहार जैसे दूसरे अहम राज्य से भी दूरी बना रखी है और ना ही पिछले साल हुए किसी भी विधानसभा चुनाव में उसने हिस्सेदारी की है.

लेकिन पंजाब और गोवा से चुनाव लड़ने का फ़ैसला बहुत सोच-समझ कर एक रणनीति के तहत लिया गया लगता है.

इन दोनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी के लिए अच्छी संभावनाएँ हैं क्योंकि वे यहां सिर्फ़ दो पार्टियों के होने की वजह से पैदा हुई राजनीतिक शून्यता को वो भर सकती है.

अरविंद केजरीवाल और आप कार्यकर्ता

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पंजाब से आम आदमी पार्टी को लोकसभा चुनाव में 'मोदी लहर' के बावजूद चार सीटें मिली थीं. इसलिए वहां से चुनाव लड़ने का एक बड़ा कारण यह भी है.

यहां तक कि अमृतसर लोकसभा क्षेत्र से जहां से कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह और बीजेपी से अरुण जेटली मुकाबले में थे, वहां से भी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को अस्सी हज़ार वोट आए थे.

आम आदमी पार्टी को पंजाब में कुल 24.4 फ़ीसदी वोट मिले थे. पार्टी के उम्मीदवार 33 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रहे थे और नौ विधानसभा क्षेत्रों में दूसरे नंबर पर रहे थे. पंजाब में कुल 117 विधानसभा क्षेत्र हैं.

इसलिए आम आदमी पार्टी के पास यहां उत्साहित होने की पर्याप्त वजह थी. पार्टी ने एक साल पहले ही यहां चुनाव अभियान शुरू कर दिया था.

अरविंद केजरीवाल और आप कार्यकर्ता

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पार्टी ने एक साल पहले यहां वार्ड स्तर पर कमिटीयों का गठन किया था. इसके उलट राज्य में किसी भी दल ने फिर चाहे वो शिरोमणी अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन हो या फिर कांग्रेस ने अपनी तैयारी इतने पहले शुरू की थी.

जब तक बाकी दलों अपनी तैयारी शुरू करते तब तक आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता पंजाब के दूर-दराज के गांवों तक पहुंच गए थे और लाखों लोगों से मिल चुके थे.

पार्टी में संकट के बादल तब छा गए थे जब आम आदमी पार्टी के चार में से दो सांसदों ने बगावत कर दी थी और पार्टी के वरिष्ठ नेता या तो छोड़ गए थे या फिर उन्हें निकाल दिया गया था.

इसके बाद उम्मीदवारों को लेकर विवाद शुरू हो गया और आख़िरकार पार्टी के राज्य संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर को उनके पद से हटा दिया था.

हालांकि पार्टी देहाती इलाकों से लेकर कस्बाई इलाकों तक में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाब रही है.

अरविंद केजरीवाल के साथ सुच्चा सिंह छोटेपुर

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राज्य में पार्टी की ओर से कोई मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं है.

केजरीवाल ख़ुद ही चुनाव प्रचार का नेतृत्व कर रहे हैं. इसे पार्टी की एक कमजोर कड़ी के तौर पर भी देखा जा रहा है.

पार्टी को उम्मीद है कि तीन तरफा मुकाबले में उसे फ़ायदा मिलने वाला है.

पिछले साल हुए एक चुनाव सर्वे में कहा गया था कि 117 सीटों में से 100 सीटों पर आम आदमी पार्टी को जीत हासिल होगी.

लेकिन अभी कुछ महीने पहले हुए सर्वे में यह आकड़ा नीचे की ओर जाता हुआ बताया गया है और कहा गया है कि आम आदमी पार्टी को 91 सीटें हासिल होंगी.

हालांकि दो अलग-अलग ओपिनियन पोल में अलग-अलग नतीजे सामने आए हैं.

एक ओपिनियन पोल में बताया गया है कि पार्टी दूसरे स्थान पर रहेगी और दूसरे में कहा गया है कि पार्टी सबसे आख़िरी पायदान पर रहेगी.

केजरीवाल समर्थक

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पंजाब के अलावा आम आदमी पार्टी ने अपनी किस्मत गोवा में अजमाने का फ़ैसला लिया है.

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस छोटे से राज्य के लोग दो परंपरागत विरोधी पार्टियां कांग्रेस और बीजीपी से थक चुके हैं.

दिलचस्प है कि इस राज्य में भी आम आदमी पार्टी को अच्छा-खासा समर्थन मिल रहा है.

पंजाब के उलट गोवा में पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा कर दी है.

पूर्व सरकारी अधिकारी एल्विस गोम्स को आम आदमी पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री पद का उम्मीद घोषित किया है.

हालांकि गोवा एक काफी छोटा राज्य है और यहां से सिर्फ़ दो सांसद हैं लेकिन यहां होने वाली जीत पार्टी के हौसले को बढ़ाने वाली होगी.

केजरीवाल समर्थक

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और दूसरी तरफ यह सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए एक सदमें की तरह होगा.

आम आदमी पार्टी पंजाब और गोवा में सस्ती बिजली, मुफ्त वाई-फाई, कर्ज माफी, बेरोजगारी भत्ता, मुफ़्त मोबाइल हेल्थ क्लिनिक्स और बड़ी संख्या में नौकरियों के अलावा एक साफ-सुथरी सरकार का वादा कर रही है.

दोनों ही राज्यों में मिलने वाला समर्थन निश्चित तौर पर यह बात साबित करता है कि आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय राजनीति का एक नया चेहरा बनने वाला है.

यह बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए ख़तरे की घंटी है.

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