यूपी और 'आप' के बीच दूरी, क्या है मजबूरी

आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल

इमेज स्रोत, AFP

    • Author, शरद गुप्ता
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार

आम आदमी पार्टी को पंजाब चुनावों में गंभीर दावेदार माना जा रहा है. गोवा के लिए उसने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है. पार्टी नेता और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल नियमित अंतराल पर गुजरात का दौरा करते रहे हैं लेकिन दिल्ली से सटा उत्तर प्रदेश 'आप' के रेडार से दूर लगता है.

मुख्यमंत्री बनने से पहले तक अरविंद केजरीवाल ग़ाज़ियाबाद में ही पत्नी के सरकारी क्वॉर्टर में रहते थे. सियासी हलकों में यह सवाल उभरता रहता है कि यूपी और 'आप' के बीच ये दूरियां क्यों है? और इसके पीछे क्या मजबूरियां हैं?

दो बड़े कारण

आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल

इमेज स्रोत, ARVIND KEJRIWAL FACEBOOK

इसके दो कारण हो सकते हैं. पहला तो ये कि 'आप' उन्हीं जगहों पर गई है, जहां कांग्रेस और बीजेपी का सीधा मुकाबला है. कांग्रेस चूंकि देश भर में कमजोर हो रही है और 'आप' को ये लगता है कि वह इसकी ख़ाली की गई जगह को भर सकती है.

हर जगह वह कांग्रेस के बजाय खुद बीजेपी के साथ सीधे मुक़ाबले में आना चाहती है. दूसरी बात बजट से भी जुड़ी हुई है. आम आदमी पार्टी के पास बजट की भी कमी है.

वह गोवा, पंजाब या हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्यों में तो लड़ सकती है लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां 403 सीटें हैं और हर सीट पर चुनाव लड़ने के लिए बड़े बजट की ज़रूरत होती है.

विपक्ष का स्पेस

आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल

इमेज स्रोत, AFP

चूंकि दूसरी पार्टियां ज्यादा खर्च करेंगी और 'आप' उस मुक़ाबले खर्च न कर पाए तो दिखाई भी नहीं देगी. ये दो बड़े कारण हैं जिनकी वजह से आम आदमी पार्टी सिर्फ उन्हीं राज्यों में जा रही हैं जहां पर बीजेपी और कांग्रेस सीधी लड़ाई में हैं.

उत्तर प्रदेश में बहुकोणीय मुकाबला है. एक कारण यह भी है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जातीय पार्टियों का असर है. इन राज्यों में चुनाव लड़ने में ख़र्च ज्यादा है. गोवा और पंजाब जैसे राज्यों में सीटें कम हैं.

यहाँ कांग्रेस और बीजेपी का आमने-सामने का मुक़ाबला है. इन जगहों पर आम आदमी पार्टी चुनावी मैदान में उतरकर कांग्रेस की जगह लेना चाहती है. नतीजे में चाहे बीजेपी की जीत हो तो उसे प्रमुख विपक्षी पार्टी की जगह मिलेगी. यही उसकी रणनीति है.

वीडियो कैप्शन, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 'नोटबंदी' के मामले पर बीबीसी हिंदी से बात की.

अगला टारगेट

लेकिन इन सबके बीच ये सवाल रह ही जाता है कि जो राजनीतिक मैनिफ़ेस्टो पंजाब और गोवा में चल सकता है, वह उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं. ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की बहुत बुरी हार हुई थी.

हालांकि दिल्ली के चुनाव के बाद केजरीवाल ने इसे गलती माना था. इस हार के बाद पार्टी को ये एहसास हुआ कि लोकसभा चुनावों में 100 संभावित सीटों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता तो बेहतर नतीजे मिलते.

चुनौतियां

आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल

इमेज स्रोत, Arvind Kejriwal Facebook

इसलिए आम आदमी पार्टी चाहती है वह एक-एक करके राज्यों में अपना विस्तार करे और संसाधनों का समझदारी से इस्तेमाल करे. उनका मानना है कि पंजाब के बाद आम आदमी पार्टी की पूरी टीम हिमाचल में शिफ्ट हो जाएगी.

हिमाचल पड़ोसी राज्य है, उतना ही छोटा है और उसकी चुनौतियां भी कमोबेश वैसी ही हैं. जहां तक राजनीतिक शुचिता और ईमानदारी को लेकर किए जाने वाले दावों की बात है, उसे लेकर बहुत विवाद है.

पंजाब या गोवा

आम आदमी पार्टी, अरविंद केजरीवाल

इमेज स्रोत, Arvind Kejriwal Facebook

हरेक आदमी और राजनीतिक पार्टी ख़ुद को अच्छा ही बताते हैं. लेकिन दिल्ली में उनके कामकाज को लेकर बड़े प्रश्नचिह्न लग रहे हैं. चूंकि दिल्ली में वे लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन हैं, उनका कहना है कि वे अपने तरीके से सरकार नहीं चला सकते.

अगर वे पंजाब या गोवा किसी एक जगह पर चुनाव जीतते हैं और स्वतंत्र रूप से सरकार चला पाते हैं तो वे पूरे देश को दिखा पाएंगे कि हमने कुछ किया है. उत्तर प्रदेश में जगह बनाने के लिए उन्हें अपना काम करके दिखाना होगा और दिल्ली में वे कुछ कर नहीं पा रहे हैं.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)