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'मुसलमानों का नाम आतंकवाद से जोड़ना उचित नही'
- Author, मिर्जा ए. बी. बेग
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, दिल्ली
मक्का मस्जिद, मालेगांव, अक्षरधाम, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद कहीं भी कोई धमाका हो, भारत के मुसलमानों में घबराहट फैल जाती है. फोन की घंटियां बजनी शुरू हो जाती हैं, मां अपने बच्चों को घर से बाहर न निकलने की हिदायत देती हैं. ऐसा इसलिए है कि हर धमाके के बाद आम तौर पर मीडिया में मुसलमानों का नाम आता है.
मक्का मस्जिद हमले में कई मुस्लिम युवाओं पर 'आतंकवाद' से जुड़े आरोप लगे थे लेकिन बाद में कई युवाओं को निर्दोष पाया गया था. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने सिफ़ारिश भी की थी सभी निर्दोष युवाओं को आंध्रप्रदेश सरकार मुआवज़ा दे.
बीबीसी मुस्लिम नौजवानों और उनसे जुड़़े मुद्दों पर विशेष सीरिज़ कर रहा है. ये रिपोर्टें उसी सीरीज़ का हिस्सा हैं.
हालांकि देश के मुस्लिम नौजवानों का कहना है कि इस्लाम में चरमपंथ की कोई जगह नहीं है और वे इस तरह की घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं.
रुख़सार अंजुम हैदराबाद के एक यूनिवर्सिटी की छात्रा हैं. उनका कहना है, "हम आतंकवाद का किसी भी सूरत में समर्थन नहीं करते हैं. यहां आतंकवाद में मुसलमानों का नाम लिया जाता है लेकिन मुसलमानों का आतंकवाद से दूर-दूर का कोई संबंध नहीं है."
हैदराबाद के ही पुराने इलाके के एक नौजवान अब्दुल अज़ीम ख़ान ने बताया, "जब भी कोई चरमपंथी घटना होती है उसमें मुसलमानों का नाम सामने आता है, पहले उनका नाम आईएसआई से जोड़ा जाता था, फिर इंडियन मुजाहिदीन से जोड़ा गया, फिर सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) के नाम से और अब आईएस (इस्लामिक स्टेट) के नाम से जोड़ा जाता है. अभी हाल ही में हैदराबाद से सात बच्चों को उठा लिया गया और उनका संबंध इस्लामिक स्टेट से बताया जा रहा है. यह मुसलमानों की छवि खराब करने की कोशिश है."
एक और छात्र दानिश ख़ान का मानना था, "मुसलमानों का नाम आतंकवाद से जोड़ा जाना गलत है. आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता और उसे किसी धर्म से जोड़ना सही नहीं है."
उन्होंने आगे कहा, "कई मामलों में दूसरे धर्म के लोगों का भी नाम आया है जैसे साध्वी प्रज्ञा, असीमानंद, कर्नल पुरोहित और उन्हें जेल भी हुई. इसलिए आतंकवाद से सिर्फ मुसलमानों का नाम जोड़ा जाना सही नहीं है."
2007 में हैदराबाद शहर के केंद्र में चार मीनार के पास मक्का मस्जिद में हुए बम धमाके के बाद हिरासत में लिए जाने वाले डॉक्टर इब्राहीम जुनैद ने बताया कि उनके साथ सौ लड़कों को कैसे उठाया गया और उनके साथ क्या सलूक किया गया.
उनका कहना है कि मुसलमानों का आतंकवाद से संबंध नहीं है लेकिन उन्होंने पुलिस का आतंक जरूर देखा है.
उन्होंने बताया कि हिरासत में लिए जाने के बाद वहां पहले से एक कहानी तैयार होती है जिसे आपको कबूल करने के लिए कहा जाता है.
अब्दुल क़ादिर सिद्दीकी हैदराबाद की एक यूनिवर्सिटी के एक पीएचडी स्कॉलर हैं. वे कहते हैं, "इस्लाम में आतंकवाद नहीं है और जो इसके नाम पर आतंकवाद कर रहे हैं, वे मुसलमान नहीं हैं."
उन्होंने यह भी कहा कि 'इस्लामिक स्टेट जो कुछ कर रही है, उससे इस्लाम की छवि खराब हो रही है और फिर इस्लाम के चेहरे को संवारने में सौ-दो सौ साल लग जाएंगे."
इसी यूनिवर्सिटी की एक छात्रा सबा अंजुम स्वीकार करती हैं कि भारत में या दुनिया के अन्य देशों में आतंकवाद है लेकिन उसे किसी विशेष समुदाय से जोड़ना गलत है.
वे कहती हैं, "यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ अवसरवादी तत्वों और राजनेताओं का प्रचार है. दूसरे समुदायों में मुसलमानों की गलत तस्वीर पेश की जा रही है."
सबा का कहना था कि किसी एयरपोर्ट पर अगर कोई मुसलमान दाढ़ी वाला है तो दोबारा चेकिंग की जाती है... युवा पीढ़ी के सामने ये बहुत बड़ा खतरा है और आने वाले दिनों में हमें कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है."
कुछ दूसरे नौजवानों का मानना था कि सरकार किसी की भी हो मुसलमानों के हालात में बदलाव नहीं आया है और उन्हें इसी तरह शक की निगाहों से देखा जाता है.
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