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तीन तलाक़ पर क्या सोचते हैं युवा मुसलमान?
- Author, मिर्ज़ा एबी बेग
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
भारत के मुसलमानों में तलाक़ की प्रक्रिया पर चर्चा बहुत जटिल और विवादास्पद है.
देश की न्यायपालिका अक्सर इसमें संशोधन का संकेत देती रही है जबकि एक साथ तीन तलाक़ की मौजूदा प्रणाली से ख़ुद मुसलमानों का एक तबका बहुत हद तक संतुष्ट नहीं.
बेंगलुरू में इस मुद्दे पर बीबीसी उर्दू की एक पैनल चर्चा में युवाओं के साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षा विभाग से संबंधित लोगों ने भाग लिया और अपने विचार व्यक्त किए.
इस्लाम में तलाक़ के अलग-अलग तरीके प्रचलित हैं लेकिन भारत में आम तौर पर मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक साथ तीन तलाक़ को ही तलाक़ स्वीकार कर लिया जाता है.
हाल ही में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक़ का समर्थन करते हुए कहा है कि यह महिलाओं के ख़िलाफ़ अत्याचार नहीं है.
चर्चा में शामिल मौलाना बदीउज़्मा नदवी कासमी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के स्टैंड का समर्थन करते हुए कहा, "अत्याचार दरअसल महिलाओं पर नहीं हो रहा है बल्कि इसे अत्याचार समझा जा रहा है. आप सर्वेक्षण करें तो आपको पता चलेगा कि आवाज़ केवल ऐसे लोग उठाते हैं जो या तो इस्लाम से दूर हैं या फिर इस्लाम विरोधी हैं."
चर्चा में शामिल महिलाओं के बीच तीन तलाक़ का विरोध तो कम ही नज़र आया लेकिन उनका कहना था कि एक से दूसरे तलाक़ कहे जाने के बीच मुनासिब समय होना चाहिए.
एक छात्रा रशिखा मरियम ने एक साथ तीन तलाक़ का विरोध करते हुए कहा, "यह नहीं होना चाहिए. एक ही सांस में बोल देना, ग़ुस्से में बोल देना सही नहीं है, जो फ़ैसले गुस्से में किए जाते हैं वे कभी अच्छे नहीं होते."
सामाजिक कार्यकर्ता सुल्ताना बेग़म का कहना है कि तलाक़ की सूरत में महिलाओं को समय दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, "भावनाओं में बहकर कोई फ़ैसला नहीं किया जाना चाहिए. इसके लिए तीन महीने या तीन चार दिनों की अवधि नहीं बल्कि दोनों को उचित समय दिया जाना चाहिए ताकि वे विचार और निर्णय करें."
कुछ प्रतिभागियों का मानना था कि तलाक की समस्या हर समाज में मौजूद है लेकिन ये मुसलमानों से जुड़ा मसला है, तो इसे ज़्यादा तूल दिया जाता है.
बेंगलुरू की डॉक्टर शाइस्ता यूसुफ़ का कहना था, "मुसलमानों का मामला उछाला जाता है. इतना उछाला जाता है कि जैसे हर घर में तलाक़ दिया जा रहा हो."
उन्होंने कहा कि लोग असल बात भूल जाते हैं. वे कहती हैं, "हमारे पास जो व्यवस्था है, हमारे पास जो नियम हैं उन पर किसने बात की है. एक छोटे मसले को विश्व स्तर पर लाया जाता है और उसे बड़ा बना दिया जाता है."
एक छात्र बाबा जॉन का कहना है कि "मुसलमानों में तलाक़ की दर बहुत कम है और अदालत में तो और भी कम मामले पहुंचते हैं फिर भी मीडिया में हंगामा है कि मुसलमानों में महिलाओं को सुरक्षा नहीं है, हालांकि इस्लाम ही पहला धर्म है जो महिलाओं को समान अधिकार देता है."
उनका यह भी मानना है कि इस संबंध में सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.
चर्चा के प्रतिभागियों ने एक साथ तीन तलाक़ के मुद्दे पर किसी बाहरी हस्तक्षेप का विरोध किया. हालांकि प्रचलित व्यवस्था में बदलाव की ज़रूरत पर कुछ लोगों ने ज़ोर दिया.
कुछ लोगों ने इस मसले पर शिक्षा की कमी को भी बड़ी वजह बताया.
प्रोफेसर सबीहा ज़ुबैर ने कहा, "डॉक्टर बनाने के लिए मेडिकल की शिक्षा दी जाती है, इंजीनियर बनाने के लिए उसकी शिक्षा दी जाती है लेकिन शादी जैसी महत्वपूर्ण बात के लिए बच्चों को तैयार ही नहीं किया जाता. उन्हें उनकी जिम्मेदारियों नहीं बताई जाती हैं."
हालांकि उनका यह भी मानना है कि तलाक़ की प्रक्रिया को कठिन बनाया जाना चाहिए ताकि महिलाओं के साथ साथ परिवार को भी बचाया जा सके.
कुछ लोगों का मानना था कि तलाक़ की सूरत में महिलाओं को ज़्यादा मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.
बेंगलुरु में मेडिकल में प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने वाली एक छात्रा अफ़शीन ने कहा, "तलाक़ में एक तरह का स्वार्थ नज़र आता है, पुरुष तो मुक्त हो जाते हैं और वो दूसरा विवाह कर लेते हैं. लेकिन सभी दिक्कतें महिलाओं को पेश आती हैं."
(भारत के युवा मुसलमानों की चिंताओं पर बीबीसी उर्दू की विशेष सिरीज़ की पहली कड़ी)
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