केरल में मुस्लिम 'कट्टरता', अरब का असर?

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कालीकट
कुछ महीनों से केरल के मुसलमान चर्चा में हैं. ख़ास तौर से जुलाई में क़रीब 20 मुस्लिम युवाओं के अचानक से ग़ायब हो जाने के बाद से.
पुलिस को शक है कि वो सीरिया में तथाकथित इस्लामिक स्टेट से जा मिले हैं. ख़बरें ये भी हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान में हैं. सही जानकारी किसी के पास नहीं है.
केरल से आए दिन मीडिया में मुस्लिम युवाओं को कट्टर बनाने, कट्टरता को बढ़ावा देने, कट्टरता पर आधारित स्कूल खोलने और युवाओं की गिरफ्तारियों की ख़बरें सुर्ख़ियों का हिस्सा बनती रहती हैं.

यहाँ इस्लाम से जुड़ी बातों पर प्रवचन देनेवाले लोगों की बहुत पूछ है.
उनके बड़े-बड़े पोस्टर और कटआउट सड़कों और चौराहों पर उसी तरह से लगे हुए होते हैं जैसे फिल्मी सितारों के लगे होते हैं.
हर कुछ दिनों में धार्मिक सम्मेलन आयोजित कराए जाते हैं जिनमें ऐसे लोग भाषण देते हैं.

जिस तरह से ज़ाकिर नाइक ने टीवी पर भाषण देकर नाम कमाया और करोड़ों भक्त बनाए, ठीक उसी तरह से केरल में एम एम अकबर ने अपनी पहचान बनाई.
उन्हें केरल का ज़ाकिर नाइक कहा जाता है. ज़ाकिर नाइक की तरह उनके भी कई स्कूल हैं जहाँ सलफ़ी इस्लाम के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है.
यहाँ मिस्र के इस्लामी स्कूलों से प्रभावित हो कर बच्चों के कई स्कूल स्थापित किए गए हैं. ये एक अरबी मीडियम स्कूल है.
स्कूल अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि ये हम ज़रूर बताएं कि उनके स्कूल में आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है.

केरल की कुल साढ़े तीन करोड़ आबादी का 25 प्रतिशत से अधिक मुसलमान हैं. एक छोटा सा गुट कट्टर सुन्नी इस्लाम को मानता है जिसे सलफ़ी मुस्लिम कहते हैं.
ग़ायब होने वाले युवा भी सलफ़ी समुदाय का हिस्सा थे.
लेकिन अधिकतर आबादी सुन्नी मुसलमानों की है जिन्हें यहाँ केवल 'सुन्नी' कहा जाता है, हालाँकि सुन्नी सलफ़ी भी होते हैं.
सुन्नी कहे जाने वाले ये मुसलमान भी काफी पारंपरिक और धार्मिक हैं. अपने त्योहार धूम-धाम से मनाते हैं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि केरल में इस्लामी कट्टरता मुस्लिम समुदाय में वैचारिक मतभेद का नतीजा है. सलफ़ी शुद्ध इस्लाम चाहते हैं.
वो 'सुन्नी' कहे जाने वाले मुसलमानों के इस्लाम को सही नहीं मानते क्योंकि सुन्नी दरगाह जाकर पूजा-पाठ करते हैं या फिर तस्वीरें खिंचाते हैं, वीडियो उतारते हैं.
इस वैचारिक फ़र्क़ को उत्तर भारत के प्रसंग में रखें तो केरल के सलफ़ी मुस्लिम उत्तर भारत के देवबंदियों के क़रीब हैं और केरल के सुन्नी उत्तर भारत के बरेलवी कहे जा सकते हैं.

केरल में कट्टरवादी सलफ़ी इस्लाम को फैलाने में अरब और खाड़ी देशों से लौटे केरल के लोगों का हाथ बताया जाता है.
राज्य के कुछ मुस्लिम अपनी धार्मिक विचारधारा में कट्टर हो कर लौटते हैं. उनकी दाढ़ी पहले से लंबी होती है, मूंछ ग़ायब और कपड़े इस्लामी हो जाते हैं.
इतिहासकार एम जी एस नारायणन कहते हैं कि अरब और खाड़ी देशों से लौटे लोग भी केरल की मुस्लिम आबादी में धार्मिक कट्टरता फैला रहे हैं.
स्थानीय पुलिस के अनुसार कुछ लोगों के गुरु इंटरनेट पर होते हैं जिन से वो केरल वापस लौट कर भी संपर्क में रहते हैं.
ये इंटरनेट गुरु जिहाद से लेकर चरमपंथी कारनामों की सलाह भी देते हैं.
एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि ग़ायब होने वाले युवाओं के कुछ गुरु यमन में हैं जो कट्टर सलफ़ी इस्लाम के विस्तार में जुटे हैं.

सलफ़ी इस्लाम के असर का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ग़ायब होने वाले युवाओं में से एक अपनी माँ के ख़िलाफ़ विद्रोह के बाद कट्टर गुट में शामिल हुआ.
इस नौजवान की माँ दरगाह या धर्म गुरुओं के पास सलाह करने जाती थी जो सलफ़ी इस्लाम के खिलाफ है और जिसके कारण उसका बेटा उससे काफी नाराज़ रहता था.
अरब देशों की संस्कृति का यहाँ की मुस्लिम आबादी पर सकारात्मक असर भी पड़ा है.
उत्तरी केरल के कुछ बड़े बाज़ार को देख कर लगता है कि ये अरब देशों के बाज़ार भी हो सकते हैं.
कालीकट का सबसे बड़ा बाज़ार और इसकी दुकानें अक्सर खरीदारों से भरी रहती हैं. इसकी जामा मस्जिद में नमाज़ियों की संख्या अच्छी-खासी होती है.
मस्जिद के ऊंची मीनार हो या दुकानों के अरब शैली में लिखे नाम या फिर सड़क पर चलती बुर्कानशीं औरतें, माहौल किसी अरब देश जैसा लगता है.
उत्तरी केरल के हर घर का कोई एक शख्स खाड़ी और अरब देशों में नौकरी ज़रूर करता है और पैसे घर भेजता है.
यहाँ की अर्थव्यवस्था को इतिहासकार और अरब-केरल मामलों के विशेषज्ञ नारायणन 'पेट्रो डॉलर अर्थव्यवस्था' मानते हैं.
हज़ारों की संख्या में यहाँ से गए लोग वापस भी लौट चुके हैं. वो अपने साथ अरब संस्कृति का थोड़ा असर भी लेकर लौटते हैं.
उनका खाना-पीना और रहन-सहन कुछ हद तक अरबों जैसा हो जाता है. इस कारण केरल में नए रेस्तरां खुल रहे हैं जहाँ अरबी खाने परोसे जाते हैं.

कालीकट शहर से बाहर ऐसे कई रेस्तरां खुले हैं जहाँ अरबी खाने बहुत लोकप्रिय हैं.
इन में से एक 'मजलिस' है जो एक साल पहले खुला था और जहाँ केवल अरब और केरल की स्थानीय परंपरा के व्यंजन परोसे जाते हैं.
इस रेस्तरां में अपने पूरे परिवार के साथ दोपहर का खाना खाने आए नाजील रब्बानी अरबी खानों के बेहद शौकीन हैं.
वे कहते हैं, "मुझे अरबी फ़ूड बहुत पसंद है. इस्लाम के पैग़म्बर मोहम्मद अरब थे. मैं जब भी अरब देश जाता हूँ वहाँ का लिबास पहनने लगता हूँ."
रेस्तरां के मैनेजर कहते हैं कि अरब डिश 'मंदी' यहाँ काफी लोकप्रिय है.
उनका कहना है कि अरब देशों से लौटे केरल के लोग अरबी खाना पसंद करते हैं बल्कि वो अरब रेस्तरां भी खोल रहे हैं.
इतिहासकार नारायणन कहते हैं कि अरब और केरल का रिश्ता सदियों पुराना है.
उन्होंने बताया, "अरब व्यापारी सातवीं और आठवीं सदी से कालीकट आने लगे थे. यहां उन्होंने स्थानीय लड़कियों से शादियां भी कीं."

कालीकट में तीन प्राचीन मस्जिदें हैं. ये ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी में बनाई गई थीं. उस समय अरब व्यापारी इन मस्जिदों में ही नमाज़ पढ़ा करते थे.
शहर में पुराने ज़माने के तर्ज़ पर एक मुख्य क़ाज़ी हैं जिनके पूर्वज अरब से आए थे. वो आज भी अपने दफ्तर में लिखने का सारा काम अरबी में करते हैं.
उत्तरी केरल में अरब देशों से काफी लोग आते हैं. वे या तो यहाँ इत्र खरीदते हैं या फिर आयुर्वेदिक इलाज के लिए आते हैं.
उत्तरी केरल को अगर मिनी अरब कहा जाए तो ग़लत न होगा.
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