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'सामान्य दिल वाला अच्छा संगीतकार हूँ' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक मुलाक़ात में इस सप्ताह हमारे मेहमान हैं ग़ज़ल का पर्याय बन चुके जगजीत सिंह. जब भारत में गज़ल की बात चलती है और गज़ल गायिकी की बात चलती है तो आपका नाम ख़ुद ही ज़ेहन में आ जाता है. कैसे और कब शुरू हुआ ये सफ़र. ये तो बहुत लंबी-चौड़ी दास्तान है. कोई चालीस-पैंतालीस साल पहले जब मैं कॉलेज में था तो उसी समय से मेरा रूझान गज़ल की ओर था. उस समय फ़िल्मों के नब्बे फ़ीसदी गाने भी गज़ल पर आधारित होते थे तो मेरे अंदर उसी समय से गज़ल का एक मीटर चलने लगा था. संगीत सीखना शुरू किया और कॉलेज में गाने के लिए गज़ल को अपनाया. उसे ख़ुद कंपोज करके स्टेज पर गाना शुरू किया. इस तरह गज़ल की ओर झुकता चल गया. और इतनी सारी भाषाओं में भी महारत हासिल की आपने. हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला. किसी भाषा में गाना कोई मुश्किल बात नहीं है. वो तो तोते की तरह रटकर गाने जैसा है. अभी मैंने बांग्ला में गाया है. मेरी बीवी बंगाली है तो उच्चारण के बारे में मैंने उनसे पूछ लिया तो सब आसान हो गया. अभी गुजराती में भी एक एलबम बनाया है. मेरा सेक्रेटरी गुजराती है तो उसको सामने बिठा लिया कि भई देखते रहो कि उच्चारण सही होना चाहिए. मतलब आप न सिर्फ़ अच्छे गायक हैं बल्कि आप स्मार्ट भी हैं कि आपने चारों तरफ़ अलग-अलग भाषाओं वाले लोगों को रखा है. असल में मैं बहुत अच्छा छात्र हूँ. मैं उस्ताद नहीं हूँ. क्या इससे यह भी साबित होता है कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती है. बिल्कुल नहीं होती. सिर्फ़ सुर होता है और इसमें रूहानी ताक़त होती है. ये बताएँ कि आपका बचपन कहाँ गुजरा, कॉलेज कौन से शहर में गए. मेरी पैदाइश राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुई. मेरे पिताजी सरकारी कर्मचारी थे. वो राजस्थान के पीडब्ल्यूडी विभाग (लोक निर्माण विभाग) में काम करते थे. उनका स्थानांतरण कभी बीकानेर तो कभी श्रीगंगानगर होता रहता था. मेरी स्कूली शिक्षा श्रीगंगानगर में हुई. स्कूली दिनों में ही उस्ताद ज़माल खाँ साहब से मैंने संगीत सीखना शुरू कर दिया.
क्या बात है. माँ-बाप ने आपको प्रोत्साहित किया. हाँ, मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं संगीत सीखूँ. पहले एक सूरदास मास्टर थे छगन लाल शर्मा, उन्होंने मुझे एक साल वहाँ भेजा. हारमोनियम सीखा, थोड़े-बहुत राग सीखे. उसके बाद उस्ताद ज़माल खाँ साहब के पास भेजा. वहाँ ध्रुपद धमार, ठुमरी, ख़्याल बहुत कुछ सीखा. अभी भी सीख ही रहे हैं. सीखना तो कभी बंद होता नहीं. फिर इस तरह मैं संगीत में आ गया. और पढ़ाई मैंने एफ़एससी वहाँ से करने के बाद डीएवी कॉलेज, जालंधर में स्नातक की पढ़ाई की. फिर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में एमए किया. मैं वहाँ हॉस्टल में रहता था तो मेरा तानपुरा साथ में होता था और मेरी कोशिश यही होती थी कि मेरा रूम पार्टनर ऐसा हो जो तबला जानता हो. वाह क्या बात है. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में मेरे रूम पार्टनर इक़बाल सिंह हुआ करते थे. आजकल वो सांसद हैं. वो तबला जानते थे. हमारी बहुत मज़ेदार जोड़ी थी. वो राजनीति में चले गए और मैं संगीत में आ गया. 1965 में मैं मुंबई आ गया था इसी क्षेत्र में कैरियर बनाने. कैरियर की शुरुआत आसानी से हो गई या ख़ासा संघर्ष रहा. संघर्ष तो रहा ही लेकिन वो ऐसा नहीं था कि रात को भूखे सो रहे हैं या फुटपाथ पर सो रहे हैं. थोड़ा-बहुत कमा लेते थे. थोड़ा-बहुत मेरा एक दोस्त था लुधियाना में वो दो-तीन सौ रुपए महीने भेज देता था. उस वक़्त ख़र्च ही दो-तीन सौ रुपए महीने का था. उस समय तो दो-तीन सौ रुपए अच्छी कमाई मानी जाती थी. छह महीने तक दो सौ रुपए भेजा उसने. अगलीपारा के एक हॉस्टल में पैंतीस रुपए मेरे बेड का किराया था. उधार खाना खाते थे तो उधार खाने में साठ-पैंसठ रुपए महीने का ख़र्च आता था. जब आप मुंबई आए तो शुरू से गज़ल गायिकी पर ही ध्यान रखा या कुछ और भी गाए. शुरू से ही मैं गज़लों पर आ गया था. वैसे मैं पंजाबी भी गाता हूँ. मैंने पंजाबी भी गाए, लोकगीत भी गाए. ख़ुद कंपोज करके गाया. उसे भी जारी रखा. मुंबई में देश के कोने-कोने से लोग आते हैं अपना कैरियर बनाने. जब आप आए तो क्या आपको महसूस हुआ कि बस यही शहर है जहाँ मुझे आना चाहिए था. मेरा जो काम है उसके लिए मुंबई सही जगह थी. अगर मैं सिर्फ़ शास्त्रीय संगीत ही गाता तो दिल्ली या कोलकाता भी मेरे लिए ठीक रहता. लेकिन मुझे हल्के संगीत गुनगुनाने थे तो मैंने मुंबई को चुना. यहाँ तकनीकी सुविधाएँ हैं, रिकॉर्डिंग स्टुडियो है, संगीतकार मिलते हैं. फ़िल्म उद्योग है तो हल्के संगीत का सही उपयोग होता है इसलिए मुंबई का चयन सही था. आपने ख़ुद का गज़ल एलबम कब निकाला. मेरा पहला एलबम 1965 के अंत में ही आ गया था लेकिन वो पूरा नहीं था, आधा एलबम था. ये कैसे हो गया. एचएमवी ने मुझे मौक़ा दिया था कि आप एक ईपी बनाइए. ईपी में चार गज़लें होती हैं. दो एक गाता है और दो दूसरा गायक गाता है. तो उसमें मैंने दो गज़लें गाईं. ‘अपना गम भूल गए, उनकी जफ़ा भूल गए...हम तो हर बात मुहब्बत के सिवा भूल गए.’ उसमें दूसरी गज़ल थी, ‘साक़िया होश कहाँ था तेरे दीवाने में...’. ये दो गज़लें थीं. दो दूसरी गज़लें सुरेश राजवंशी की. तो एलबम करने का पहला मौक़ा मुझे 1965 में ही मिल गया था. साठ के दशक में ही चित्रा जी के साथ आपकी मुलाक़ात हुई थी और फिर शादी भी हुई थी. हाँ बिल्कुल. 1967 में उनसे मुलाक़ात हुई. साथ में आपने बहुत बढ़िया एलबम निकाले, बड़ी ज़बर्दस्त जोड़ी बनी. संयोग की बात है. समय अच्छा था, अच्छा काम हो गया. पहली बड़ी कामयाबी कब मिली. बड़ी कामयाबी मुझे दस साल बाद मिली. बीच में छोटे-छोटे ईपी होते रहे. छह-सात ईपी हो गए थे. लेकिन 1976 में कहा गया कि अब आप स्थापित हो गए हैं तो एलपी (लॉंग प्ले) बना सकते हैं. शुरू में एलपी का मौक़ा नहीं देते थे. उस समय एक ही कंपनी थी तो उनका एकाधिकार था. जो वो कहेंगे, वही करना पड़ता था. तो 76 में हमारा पहला एलबम ‘द् अनफॉरगेटेबल्स’ आया. वो हमारी सबसे बड़ी सफलता थी या यूँ कहें कि मील का पत्थर है और आज भी लोकप्रिय है. उसमें आठ या दस गज़लें थीं. उसमें ‘आहिस्ता-आहिस्ता...’ है, उसमें ‘बात निकलेगी तो दूर तलक..’ है. और ‘बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ए ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं.’
इनमें आपको कौन सी गज़ल ज़्यादा पसंद है. मुझे तो सब पसंद है. सबसे ज़्यादा लोकप्रिय कौन सी गज़ल हुई. आहिस्ता-आहिस्ता और बात निकलेगी तो दूर तक.... बहुत लोकप्रिय हुए. स्टेज पर गाने ही पड़ते हैं. आजकल जो नए गज़ल गायक हैं, वो इतने कम क्यों हैं. इतनी तरह की प्रतिभा खोज प्रतियोगिताँए होती है लेकिन नई तरह की आवाज़ की कमी क्यों दिखती है. लगता है कि गज़ल गायक ग़ायब होते जा रहे हैं. गज़ल गायन में मौसिकी सीखनी होगी. ये कोई मज़ाक नहीं है. आपको शास्त्रीय ठुमरी सीखनी होगी. ठुमरी में क्या रंग है, क्या अलग-अलग राग है. दूसरा आपको उर्दू ज़ुबान भी आनी चाहिए. तीसरा धैर्य भी होना चाहिए. रातोंरात स्टार तो नहीं बन सकते. और चौथा कि मीडिया की मदद होनी चाहिए. गज़ल को मीडिया का समर्थन नहीं मिलता. अभी मीडिया का समर्थन तो फ़िल्मी गानों और डांस को मिल रहा है. जितने भी टैलेंट शो होते हैं, वो सभी फ़िल्मी गाने गाते हैं, उसमें अपनी प्रतिभा कहाँ है. वो तो किसी का गाया हुआ गाना गाते हैं. अपना टेलेंट या अपनी उपज कहाँ है. वो सब नकली माल है. किसी भी क्षेत्र में रातोंरात स्टार नहीं बन सकते बल्कि ऐसे लोग ग़ायब हो जाते हैं. जब गज़ल गायक स्टार बनते हैं, चाहे वो मेंहदी हसन साहब हों या ग़ुलाम अली साहब हों या आप हों तो वो लंबे समय के लिए बनते हैं. स्टारडम लंबे समय तक साथ रहता है. आपको ही देखें तो ऊपर वाले की मेहरबानी और आपकी कला का भी कमाल है. क्योंकि वो प्रदर्शन पर आधारित है. मेंहदी हसन साहब, ग़ुलाम अली, फ़रीदा ख़ान, बेगम अख़्तर, तलत महमूद, ये सब अपने प्रदर्शन के दम पर आए हैं ऊपर. ये किसी मीडिया के समर्थन या जोड़-तोड़ से ऊपर नहीं आए हैं. यही बात आप पर भी तो लागू होती है. मैं अपना नाम तो पीछे रखता हूँ न. लेकिन यो जो ज़बर्दस्त स्टारडम आपको मिली. इतनी लोकप्रियता. और फिर ऊपर से आवाज़ इतनी ज़बर्दस्त है कि लोग ऐसे ही मरें. देखने में भी अच्छे हैं तो इस लोकप्रियता को कैसे सँभालते थे और आज कैसे करते हैं. इसे देखना बहुत मुश्किल है साहब, बड़ा सँभालना पड़ता है अपने आपको. प्रदर्शन को बनाए रखना होता है. हर एलबम मेरे लिए एक नई शुरुआत होती है. पुराना काम जो मैंने किया है, उसे भूलना पड़ता है. नए काम को नए लोग मिलेंगे, नए श्रोता मिलेंगे, ये सोचकर चलना पड़ता है. फ़ॉर्म में रहने के लिए रियाज़ रोज करना होता है. ये सवाल मैं पूछने ही वाला था. क्या आपको अभी भी रियाज़ करना पड़ता है. बिल्कुल. अब तो और ज़्यादा करना पड़ता है. कितना समय देते हैं इस पर. सुबह मैं एक-दो घंटे रियाज़ करता हूँ या जैसा समय मिले. नाश्ते के बाद रियाज़ करते हैं और उसके बाद स्टूडियो चले जाते हैं. फ़िल्मी दुनिया में भी आपकी काफ़ी दख़लअंदाजी रही, काफ़ी कामयाब रहे. क्योंकि फ़िल्म की पहुँच बहुत दूर तक है. शुरू में हम जो करते थे, वो फ़िल्म के माध्यम से ही लोगों तक पहुँचती थी. मैंने शुरू-शुरू में ‘प्रेमगीत’ के लिए ‘मेरा गीत अमर कर दो..’. ‘अर्थ’ फ़िल्म के लिए गाया, उसकी तीन गज़लें बड़ी हिट हुई. ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो..’ और उसके बाद मैंने दो-चार ग़लत फ़िल्में भी पकड़ लीं. संगीत निर्देशक बन गया था. मैंने डाकुओं की फ़िल्म पकड़ ली, उसमें मेरा गाना-वाना नहीं था, मुजरे वगैरह थे तो वो फ़िल्में पिट गई. फ़िल्म उद्योग में ऐसा है कि फ़िल्म हिट हो जाए तो उसका कुत्ता भी हिट हो जाता है और अगर वो फ़्लॉप हो जाए तो सारे पिट जाते हैं भले ही किसी ने कितना भी अच्छा काम किया हो. ये शुरुआत कैसे हुई. सबसे पहले आपको कौन मिला जिसने फ़िल्मों में काम दिया. शत्रुघ्न सिन्हा ने मुझे पहला मौक़ा दिया था ‘प्रेमगीत’ में, ‘मेरा गीत अमर कर दो..’ के लिए. शुत्रघ्न सिन्हा और महेश भट्ट दोनों बराबर थे. इन दिनों कोई ऑफ़र है. नहीं. मैं फ़िल्मों के पीछे नहीं भागता. कोई आ जाए तो गा देता हूँ, फ़िल्मी दुनिया में आपके पसंदीदा गायक कौन हैं. पुरानों में हम तो तलत महमूद, रफ़ी और मन्ना डे की आवाज़ सुनकर बड़े हुए हैं. वे सारे अच्छे गायक थे. आज के गायकों में भी सभी अच्छे हैं लेकिन सबसे अच्छा मुझे लगता है वो केके है. उसका सब कुछ ठीक है. आपके पसंदीदा संगीत निर्देशक. पसंदीदा संगीत निर्देशक आजकल कुछ नहीं है. वो तो सब चोरी का माल है. वैसे कौन पसंद है. कई बार अच्छा काम करते हैं. जैसे शंकर महादेवन कभी-कभी अच्छा काम कर देते हैं. जतिन-ललित भी अच्छा कर लेते हैं. लेकिन इसमें निरंतरता नहीं है, तुक्का लग गया तो ठीक है. मदनमोहन, रोशन का जो समय था तो हर संगीत पर वो काम करते थे. वो सोचते थे कि हर गाना हिट होना चाहिए, संगीतमय होना चाहिए. आजकल तो संगीत का मशीन आ गया है. कंप्यूटर में संगीत आ गया है. आदमी का काम बहुत दिखता नहीं है. एआर रहमान साहब की इतनी बात होती है. आपका क्या कहना है उनके बारे में. रहमान ठीक हैं. मुझे तो कोई ख़ास लगते नहीं. कोई ऐसा समकालीन संगीत निर्देशक है जिनके साथ काम करने का अपना मन करता हो. इस वक़्त कोई नहीं है. ख़य्याम साहब हैं पुरानों में से जिनके साथ हमारा टेस्ट थोड़ा-बहुत मिलता है. लेकिन मेरे लिए जो संगीत निर्देशक काम करेगा उसे गज़ल की समझ होनी चाहिए, ज़ुबान आनी चाहिए. संगीत के अलावा आपकी रुचि किसमें हैं, समय कैसे बिताते हैं. गायक के अलावा मैं जुआरी हूँ, जन्म से जुआरी हूँ. मुझे बोली लगाने का बहुत शौक है. मेरे पास दौड़ में शामिल होने वाले पाँच-छह घोड़े हैं. जुआ मेरे ख़ून में है. दोनों अंग्रेज़ी में जी से शुरू होते हैं सिवा इसके गज़ल गायिकी के साथ जुआ का कुछ जमता नहीं है. जब रेसकोर्स में हम जाते हैं तो गज़ल-वज़ल भूल जाते हैं. वहाँ सब कुछ भूल जाते हैं. वहाँ सिर्फ़ घोड़ों की बात होती है, रेस की बात होती है. एक ब्रेक मिलता है. लेकिन जुआ तो काफ़ी ख़तरनाक शौक है. ये तो आप पर निर्भर करता है कि ख़तरनाक है या नहीं. ये इससे तय होता है कि आप जुआ कैसे खेलते हैं. ज़ोश में आ जाएँ तो ख़तरनाक है, हिसाब से खेलें और होश में खेलें तो ठीक है. आप हमेशा होश में खेलते हैं. होश में ही हैं. कोई बड़ा नुक़सान या बड़ा फ़ायदा तो नहीं हुआ इससे. नहीं..नहीं. नुक़सान उतना ही करते हैं जितना सह सकें. कोई व्यक्ति, कोई घटना या कोई सोच जिसका आपकी ज़िंदगी पर कोई गहरा असर हुआ हो. सबसे ज़्यादा मेरी ज़िंदगी पर मेरे पिताजी अमर सिंह का प्रभाव है. उनका जीवन, मित्रों और रिश्तेदारों को लेकर जो नज़रिया था, वो मुझे आज भी प्रेरित करता है. घर वाले कहते हैं कि मैं दूसरा बाबूजी हूँ. आपको ख़ुद में सबसे अच्छा क्या लगता है. मेरा भोलापन. मेरी जो स्वाभाविक साफ़गोई है वो मुझे बहुत अच्छी लगती है. उसकी वजह से कभी नुक़सान हुआ है. हाँ, बहुत. लेकिन मुझे मालूम पड़ जाता है कि ये नुक़सान हो रहा है फिर भी उसे में उठा लेता हूँ. कोई ऐसी चीज़ जो आपको लगती हो कि ये कमी है और इसे मैं क्यों नहीं बदल पाता. कमी गिनने जाएँगे तो बहुत हैं. वो मैं यहाँ बोलूँगा भी नहीं, नहीं तो मेरा धंधा बंद हो जाएगा. हर इंसान में कमी होती है. कोई ऐसी चीज़ जिससे रोज परेशान होते हों. स्वास्थ्य को लेकर मैं परेशान रहता था लेकिन वो अब ठीक है. मैंने जीवनशैली में थोड़ा बदलाव लाया है. क्या बदलाव लाए हैं. सुबह ज़रूर से टहलता हूँ, योग करता हूँ. खाने पर नियंत्रण कर लिया है. आपने इतने ज़बर्दस्त लाइव शो किए हैं. उसमें कोई यादगार शो. ज़बर्दस्त याद है 1982 में लंदन के रॉयल एल्बर्ट हॉल का. शनिवार और रविवार को वहाँ शो किया था. पहली बार 1979 में लंदन गए थे और तब दो शो किया था और सारी टिकटें बिक गई थीं. आयोजक बताते हैं कि तीन घंटे में मेरे शो की टिकटें बिक गई थीं. वो थोड़ा बढ़ाकर बोल रहे होंगे लेकिन आप तीन दिन भी मानिए तो यह बढ़िया था. प्रदर्शन ज़बर्दस्त रहा था. उस लाइव शो का बाद में मैंने एलबम भी निकाला. आपको कुछ अहसास है कि लोग आपकी कौन सी गज़ल सबसे ज़्यादा सुनना चाहते हैं. वो सबसे ज़्यादा लोकप्रिय तो ‘वो कागज की कश्ती, बारिश का पानी...’ ही है लेकिन आप उससे सही आकलन नहीं कर सकते. जब ‘आहिस्ता-आहिस्ता...’ गाता हूँ तो भी तालियाँ बजती हैं, जब ‘बात निकलेगी तो...’ या ‘मेरा गीत अमर कर दो...’ शुरू करता हूँ तो भी तालियाँ पड़ती हैं. कोई बीस-तीस गज़लें हैं जो बहुत लोकप्रिय हैं. आपकी पसंदीदा जगह जहाँ जाना आपको भाता हो. लंदन. मुझे वहाँ मज़ा आता है. घोड़े की रेस होती है, जुआघर हैं, संगीत है, घूमने-फिरने की सहूलियत है. बहुत बढ़िया जगह है. सिर्फ़ मौसम ही कभी-कभार ख़राब हो जाता है. मनपसंद खाना. खाना तो आजकल नियंत्रित है. ऐसे में चाइनीज़ ही ठीक रहता है. वो कम से कम ताज़ा बनता है. अगर आपको एक दिन की छूट हो कि आप जो चाहें, खा सकते हैं और उसका स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं होगा तो आपका क्या ऑर्डर होगा. दाल और पराठे. अगर आपसे दो वाक्यों में ख़ुद के बारे में बताने कहूँ तो आप क्या कहना चाहेंगे. मैं एक सामान्य दिल वाला मेधावी आदमी हूँ. अच्छा संगीतकार हूँ. भोला-भाला हूँ और आज भी विद्यार्थी की तरह सीखता रहता हूँ. फ़िल्में देखने का शौक है. फ़िल्में तो आजकल मैं घर पर टेलीविज़न पर ही देखता हूँ. थियेटर नहीं जाता. टीवी पर तो ज़्यादातर अंग्रेज़ी फ़िल्में ही आती हैं और कभी-कभी पुरानी हिंदी फ़िल्में भी आती हैं. आपकी सर्वकालीन पसंदीदा फ़िल्म कौन सी है? मुग़ल-ए-आज़म. क्या बात है. आप भी कुछ राजसी हैं इसलिए आपकी तबीयत को ये फ़िल्म जँचती है. इस फ़िल्म में अभिनय अच्छा है, निर्देशन अच्छा है, संगीत अच्छा है, पटकथा अच्छी है, संवाद अच्छा है. इसमें सब कुछ अच्छा है. अगर आपको ये मौक़ा मिले कि किसी फ़िल्म में काम कर सकें तो कौन सी फ़िल्म का वो कौन सा किरदार होगा. देवदास में देवदास का. आप कुछ देवदास जैसे हैं क्या. नहीं लेकिन बन जाएँगे. आने वाले पाँच-दस सालों में आप ख़ुद को कहाँ देखते हैं और क्या करते हुए देखते हैं. आने वाले समय में मैं जहाँ हूँ, पहले तो वहीं रहूँ, यही काफ़ी है. इससे ऊपर चला जाऊँ तो ईश्वर की मेहरबानी. मैं अपना काम मन लगाकर कर रहा हूँ. चार सीडी गुरुवाणी की रीलिज़ कर रहा हूँ. उसमें अलग-अलग कलाकारों से मैंने काम करवाया है. तकरीबन सभी कलाकारों ने गाया है. उस्ताद रशीद ख़ान, अजय चक्रवर्ती, परवीन सुल्ताना, सुरेश वाडेकर, हरिहरन, शंकर महादेवन, ऋचा शर्मा, सोनू निगम और कैलाश खेर ने गाया है. आपने तो सबको इकट्ठा कर दिया. हाँ, इसमें 32 शबद रिकॉर्ड किए हैं. सबसे एक-एक गवाया है. उसके बाद छोटे-छोटे भजन का और गज़ल की भी एलबम आएगा. |
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