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शुक्रवार, 25 जनवरी, 2008 को 13:05 GMT तक के समाचार
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सरहद से पहले सिनेमा दोनों तरफ़ से खुले

मुग़ले आज़म और ताज महल जैसी फ़िल्मों को पाकिस्तान में बहुत सराहा गया
राजनीति की बुनियाद पर कला-संस्कृति को नियंत्रित करने की सरकारी कोशिशें अक्सर नाकाम ही साबित होती हैं, ख़ास तौर पर तब जबकि दो देशों के बीच का विभाजन सिर्फ़ राजनीतिक हो.

पाकिस्तान के सिनेमाघरों में भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन का मुद्दा 43 साल पुराना है, अब ऐसा लग रहा है कि अगर कोई बड़ी अड़चन नहीं आई तो बॉलीवुड का जादू गोदामों-दुकानों में तब्दील हो रहे लाहौर-कराची के सिनेमा हॉलों में नई जान फूँकेगा.

दोनों देशों के संबंधों में जब-जब सुधार होता है तो सीमाओं को खोलने की भावुक बातें शुरू होती हैं, सरहद खोलने से पहले सिनेमा को आसान वीज़ा देने का फ़ैसला एक अहम क़दम होगा.

भारत का सिनेमा यूरोप और अमरीका के सिनेमाघरों में देखा जा सकता है लेकिन वे लोग नहीं देख सकते जो उसके गाने गुनगुनाते हैं, उसकी भाषा समझते हैं और दिलीप कुमार-राज कपूर को 'अपना पेशावरी हीरो' मानते हैं.

सरहद पार फ़िल्मों को भारत वाले ही उत्साह के साथ और कहीं अधिक उत्सुकता से देखा जाता है लेकिन फ़िल्में पहले दुबई पहुँचती हैं और वहाँ से कैसेट्स, सीडी और डीवीडी की शक्ल में पाकिस्तान जाती हैं.

कुछ वर्षों में पाकिस्तान में लगभग एक हज़ार सिनेमाघर बंद हो चुके हैं क्योंकि वहाँ वे फ़िल्में नहीं चलतीं जिन्हें लोग देखना चाहते हैं, पिछले वर्षों में जब भारत की कुछ फ़िल्मों को दिखाने की विशेष अनुमति मिली तो हाउसफुल का बोर्ड लटकते देर नहीं लगी.

यह सबके लिए फ़ायदे का सौदा है, भारतीय फ़िल्मों के लिए एक बड़ा बाज़ार, पाकिस्तानी दर्शकों-सिनेमाघरों के लिए एक नया विकल्प, मिलने-जुलने और साझा फ़िल्में बनाने के अधिक अवसर.

एकतरफ़ा

मग़र पहले की तरह इस बार ऐसी कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है कि पाकिस्तानी फ़िल्मों को भी भारत में प्रदर्शन की अनुमित मिलनी चाहिए.

आवारापन को पाकिस्तान में प्रदर्शन की अनुमति मिली थी

भारतीय फ़िल्मों के लिए बाज़ार खोलने का दबाव पाकिस्तानी सिनेमाघरों के मालिकों ने बनाया है जिसके तहत एक पहल हुई है कि पाकिस्तानी संसदीय समिति ने इसकी सिफ़ारिश की है लेकिन भारत में पाकिस्तानी फ़िल्मों के प्रदर्शन की कोई सुगबुगाहट नहीं है.

यह ज़रूर है कि भारत में पाकिस्तानी फ़िल्मों की माँग और बाज़ार नहीं है लेकिन यह मामला सिर्फ़ बाज़ार का नहीं है, सांस्कृतिक संबंधों को सामान्य बनाने की यह प्रक्रिया अगर एकतरफ़ा रही तो अधूरी होगी.

सरहद एक तरफ़ से नहीं दोनों तरफ़ से खुलनी चाहिए, पाकिस्तानी फ़िल्मों की क्वालिटी को लेकर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं लेकिन ख़राब फ़िल्में कहाँ नहीं बनतीं?

पाकिस्तान की ही तरह, भारतीय सिनेमाघरों में भी पाकिस्तानी फ़िल्मों के प्रदर्शन की अनुमति होनी चाहिए और घटिया फ़िल्मों को नकारने का काम दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए.

कई पाकिस्तानी दर्शकों को उम्मीद है कि भारतीय फ़िल्मों के प्रदर्शन से उनके फ़िल्म निर्माताओं में प्रतिस्पर्धा की भावना आएगी और उनका स्तर भी सुधरेगा.

मेरे एक पाकिस्तानी दोस्त ने कहा, "हम भारत को क्रिकेट, हॉकी से लेकर परमाणु बम के मामले में टक्कर दे सकते हैं तो सिनेमा के मामले में क्यों नहीं?"

लेकिन थोड़ा रुककर उन्होंने ये भी कहा, "बस सिनेमा और लोकतंत्र के मामले में हमें भारत से सीखने की ज़रूरत है."

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