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क्या भूलें क्या याद करें... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और पाकिस्तान की आज़ादी की साठवीं वर्षगांठ पर कई आयोजन हुए. भविष्य की योजनाएँ बनीं तो अतीत के पन्ने भी खंगाले गए. और बात अतीत की हो तो विभाजन की त्रासदी को कैसे भुलाया जा सकता है. बीबीसी हिंदी रेडियो और ऑनलाइन ने भी इस विषय को उठाया और कई कार्यक्रम किए. साल दर साल इस घटना का ज़िक्र, उससे जुड़ी यादें, वे भयावह मंज़र. जिस पीढ़ी ने तब जन्म भी नहीं लिया था वे भी इस घटना से अच्छी तरह वाक़िफ़ हो गई है. बार-बार यह सवाल भी सिर उठाता है कि क्या पुरानी बातों को याद करना और गड़े मुर्दे उखाड़ना उचित है. फ़िल्मों पर सवाल विभाजन पर जब कोई फ़िल्म बनी है तो आलोचकों ने यह बात दोहराई है. चाहे वह गर्म हवा हो, पिंजर हो या फिर तमस हो. इस बात पर सवाल उठे कि अब उन दिनों की याद दिला कर क्या हासिल होने जा रहा है. सिवाय इसके कि पुराने ज़ख़्म फिर हरे हों. ठीक है, दुख भरे दिनों को भुला देना ही अच्छा लेकिन इस बात को कैसे नकारा जा सकता है कि इतिहास का वह काला अध्याय हमें विरासत में मिला है जिसे हम चाहें न चाहें अपने अतीत से उखाड़ कर फेंक नहीं सकते. भारत के इतिहास के पन्ने जब-जब खुलेंगे, ब्रितानी शासन के अंत और एक नए भारत के उदय की बात छिड़ेगी तो विभाजन की बलि चढ़े उन अनगिनत स्त्री, पुरुषों और मासूम बच्चों के ख़ून के छींटे छिपाए नहीं छिप पाएँगे. घाव पर मलहम लगा कर उसे ठीक किया जा सकता है लेकिन उसके गहरे निशानों को छिपाना आसान नहीं है. नई पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों की ग़लतियों से सबक़ सीखना होगा. वे ग़लतियाँ फिर न दोहराई जाएँ इसलिए उनकी भयावह तस्वीर कभी-कभी दिखाने में मुझे नहीं लगता कोई हर्ज है. (आप इस लेख से सहमत या असहमत हों तो अपने विचार hindi.letters@bbc.co.uk पर भेजें.) |
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