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सोमवार, 19 नवंबर, 2007 को 11:46 GMT तक के समाचार
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ऐसे थे मेरे बाबू जीः अमिताभ बच्चन

हरिवंश राय बच्चन
डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन का निधन 18 जनवरी, 2003 को हुआ
मूर्धन्य कवि और साहित्यकार डॉक्टर हरिवंशराय बच्चन की जन्म शताब्दी पर एक विशेष पन्ना तैयार करते समय बीबीसी हिंदी ऑनलाइन को लगा कि यह उनके बेटे अमिताभ बच्चन की श्रद्धांजलि के बिना अधूरा रहेगा.

हमने मुंबई जाकर उनसे बातचीत की और उनके बाबूजी से जुड़े कुछ अंतरंग संस्मरण जाने. प्रस्तुत है उसी बातचीत के कुछ अंश....

जब आप अपने पिताजी को याद करते हैं तो उनके व्यक्तित्व की ऐसी कौन सी विशेषता है जो सबसे पहले आपके ज़हन में आती है. एक व्यक्ति होने के नाते ऐसी क्या ख़ूबी थी जो सबसे पहले आप याद करते हैं?

बहुत ही साधारण व्यक्ति, लेकिन सोच बहुत ऊँची…और मानसिक शक्ति उनमें बहुत थी. अनुशासन था उनके जीवन में. छोटी से छोटी चीज़ हो या बड़ी से बड़ी...हमेशा उन्होनें हमें यही सिखाया कि यदि मन का हो तो अच्छा, ना हो तो ज़्यादा अच्छा. और इसी का पालन करते हुए हमने अपना जीवन व्यतीत किया. और यही बातें जो हैं उनकी हमारे साथ सारी ज़िंदगी रही हैं.

हम लोग तो बहुत छोटे थे लेकिन कभी-कभी हमारा भी सौभाग्य होता था कि उनके साथ जाकर बैठें उनकी बातें सुनें. परिमल एक संस्था थी जो कि इलाहाबाद में उस वक़्त शुरू हुई थी.

घर पर कैसा माहौल रहता था, बचपन की बातें याद कीजिए, साहित्यकारों का जमावड़ा रहता होगा, लोग लोग घेरे रहते होंगे. तो किस तरह के परिवेश मे आप पले- बढ़े?

हमारा बहुत साधारण घर था. इलाहाबाद के निवासी थे हम लोग. और बाबूजी अधिकतर अपने कमरे में, अपने ऑफ़िस में या ‘राइटिंग टेबल’ पर ही बैठे रहते थे. दिन-रात पढ़ना या लिखना उनका कार्य रहता था. यदा-कदा लोग मिलने आते थे. साहित्यकार मिलने आते थे, कविगण आते थे. गोष्ठियाँ होती थी. मुलाक़ातें होती थी.

कविता की, साहित्य की बातें होती थीं. हम लोग तो बहुत छोटे थे लेकिन कभी-कभी हमारा भी सौभाग्य होता था कि उनके साथ जाकर बैठें उनकी बातें सुनें. परिमल एक संस्था थी जो कि इलाहाबाद में उस वक़्त शुरू हुई थी.

धर्मवीर भारती उस समय मेरे ख़्याल से विद्यार्थी थे वो….और कुछ विद्यार्थियों ने मिलकर बाबूजी के साथ एक संस्था बनाई थी जो कि मध्य रात्रि के बाद जा कर के मिलती थी. साहित्य की, कविता की बातें हुआ करती थी. उसको भी मैंने देखा है. इस तरह से साधारण लेकिन साहित्यपूर्ण वातावरण बना रहता था घर के अंदर.

जब कभी बाबूजी कोई नई चीज़ लिखते, तो सबसे पहले वो माताजी को सुनाया करते थे. हम भी उसमें फिर शामिल होते थे. फिर उसको हमें समझाते थे, कि किस पर उन्होनें लिखा, विषय क्या है? उसका महत्व क्या है? तो इस तरह का माहौल था हमारे घर में.

कहते हैं जो कोई भी ‘क्रिएटिव’ व्यक्ति होता है, रचनाकार होता है वह जब रचना करता है तो सबसे कट जाता है. घर-परिवार से भी कट जाता है. उस समय परिवार के लोग उपेक्षित महसूस करने लगते है. क्या कभी इस तरह का भी अनुभव होता था?

नहीं, कभी ऐसा नहीं… माँ ने हमेशा ये कहा था कि कवि एक क्रिएटिव व्यक्ति होता है जिसकी अपनी एक दुनिया होती है , उसको अपनी एक जगह चाहिए, एक स्थान चाहिए. और अपना एक वातावरण चाहिए जहाँ पर वह लिख-पढ़ सके और हमेशा उन्होनें बाबूजी के लिए एक ऐसा वातावरण बनाया.

 बाबूजी भी जब कोई महत्वपूर्ण चीज़ कर रहे होते थे, या ऐसा उनका संकेत होता था कि वो ‘डिस्टर्ब’ नहीं होना चाहते तो कमरे का दरवाज़ा बंद कर उसके बाहर छोटी सी पेंटिंग लगा दिया करते थे, जिसका मतलब होता था कि कोई उनको 'डिस्टर्ब' ना करे. चाहे कुछ भी हो.

हम लोगों को इस तरह से अनुशासित किया कि किसी भी प्रकार से हम उनको ‘डिस्टर्ब’ ना करें. बाबूजी भी जब कोई महत्वपूर्ण चीज़ कर रहे होते थे, या ऐसा उनका संकेत होता था कि वो ‘डिस्टर्ब’ नहीं होना चाहते तो कमरे का दरवाज़ा बंद कर उसके बाहर छोटी सी पेंटिंग लगा दिया करते थे, जिसका मतलब होता था कि कोई उनको 'डिस्टर्ब' ना करे. चाहे कुछ भी हो.

कोई ख़ास समय होता था लिखने का? अक्सर लोग सुबह-सुबह उठ कर लिखते हैं.

जल्दी उठते थे वो. प्रात: तीन-चार बजे उठते थे. तैयार वग़ैरह हो करके फिर टहलने जाते थे. टहल करके आ करके वो ‘स्टडी’ में बैठ जाते थे.

बच्चन जी ऐसे गिने-चुने लोगों में हैं जिन्होंने जीवन में ही बहुत यश प्राप्त किया, ज़माने में ही उनकी शौहरत थी. आपको कब यह अहसास हुआ कि आप एक असाधारण पिता के पुत्र हैं?

जिस दिन से पैदा हुआ, उस दिन से ही मैं ‘पब्लिक फ़िगर’ बन गया. क्योंकि बाबूजी का इतना नाम था. जहाँ भी मैं जाता था लोग बच्चनजी के पुत्र से संबोधित किया जाता था. मेरा जो विवरण दिया जाता था वह इसी तरह दिया जाता था.

अब भी एक वर्ग होगा जो आपको बच्चनजी के पुत्र के तौर पर ही जानता होगा.

बिल्कुल. और यह मेरा सौभाग्य है कि लोग इसी तरह मुझे जानते हैं. मुझे तो लोग साल-दो साल में भूल जाऐंगे लेकिन बाबूजी को हज़ारों सालों तक याद रखेंगें.

उनकी जो धरोहर आपको विरासत के तौर पर मिली है और आपने बहुत संजों कर संभाल रखी हैं. जो आपकी भाषा , आपके संस्कारों से झलकता है. अगली पीढ़ी तक वह विरासत सुरक्षित रहे, इसके लिए आपने क्या सोचा, क्या किया?

 हम तो यही चाहेंगे कि बाबूजी की जो धरोहर हमें मिला है वह सदियों तक रहे हमारे परिवार के साथ. मैं ऐसी उम्मीद करता हूँ कि हमारी जो संतान है वह इस बात को जानती है और इस और भी ध्यान देंगी.

सोचना क्या है. अगली पीढ़ी होनहार पीढ़ी है. वह जानती है कि वो किसकी संतान है. जो भी उपलब्धियाँ उनको दी गई हैं, हम उम्मीद करते हैं कि वो उनको क़ायम रखेंगें. और आगे भी उसके बढ़ाएंगे. अब ये उनके ऊपर निर्भर है कि वो किस तरह से इसे करते हैं...

हम तो यही चाहेंगे कि बाबूजी की जो धरोहर हमें मिली है वह सदियों तक रहे हमारे परिवार के साथ. मैं ऐसी उम्मीद करता हूँ कि हमारी जो संतान है वह इस बात को जानती है और इस और भी ध्यान देगी.

क्या बाबूजी ने कभी ये इच्छा ज़ाहिर की कि बेटों में से किसी का साहित्य की तरफ़ रूझान हो, साहित्यकार बनें?

नहीं, कभी उन्होने हम पर किसी तरह का दबाव नहीं डाला. ना ही किसी तरह से हमें ये कहा कि तुम्हें यही करना चाहिए, या कुछ और नहीं करना चाहिए. उन्होंने हमें हमेशा छूट दी कि जो तुम्हारा मन करे वो करो लेकिन जो भी करना हो उसे अच्छी तरह करना.

इस तरह जब हमें सांइस लेना हो, या यूनिवर्सिटी जाना हो या नौकरी करने जाना हो, या फ़िल्मों में जाना हो, जब भी हमने उनसे बात की इस विषय पर, उन्होनें कभी हमारे रास्ते में कोई रुकावट नहीं डाली, हमेशा प्रोत्साहित किया. जो भी करने जा रहे हैं मन से करें, ईमानदारी से करें और ज़रूर इसमें आपको सफलता मिलेगी.

ये एक बहुत अच्छी बात रही कि उन्होने आपको एक सुपर स्टार के रूप में देख लिया जीवनकाल में ही, और ज़ाहिर है गर्व महसूस करते थे आप पर. आपकी फ़िल्मों पर बात करते थे? कोई ऐसी फ़िल्म जो उनके दिल को छू गई हो और उन्होनें बहुत खुलकर तारीफ़ की हो...

वो मेरी सभी फ़िल्में देखते थे. और जब उनकी तबीयत ख़राब हो गई जब वो बाहर जाकर नही देख पाते थे, तो वीडियो पर देखा करते थे. जब उनकी अवस्था बहुत ख़राब हो गई तो रोज़ शाम को मेरी एक फ़िल्म वीडियो पर देखा करते थे.

अमिताभ बच्चन
अमिताभ बच्चन से मुंबई में मुलाक़ात भूतनाथ के सेट पर हुई

पुरानी फ़िल्मों के बारे में उनकी रूचि ज़्यादा थी. इधर जो नई फ़िल्में बनी हैं उनमें इतनी ज़्यादा रूचि नहीं थी. कई बार मैं पूछता था कि कैसी लगी हमारी नई फ़िल्में, तो वो कहते थे - समझ में कुछ आया नहीं. मुझे लगता है कि पुरानी फ़िल्में उन्हें ज़्यादा पसंद थीं.

शोले के बारे में कुछ कहा कभी?

हां, शोले अकसर देखा करते थे. शोले, दीवार, त्रिशूल अकसर देखा करते थे.

कुछ पंक्तियाँ उनकी आपको तो कंठस्थ है, बीबीसी हिंदी रेडियो पर भी सुनाना चाहेंगे श्रोताओं को?

मधुशाला की एक-दो रुबाइयाँ सुना देता हूँ-

मदिरालय जाने को घर से, चलता है पीने वाला,
किस पथ से जाऊँ, असमंजस में है वो भोला-भाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब,
पर मैं यह बतलाता हूँ
राह पकड़ तू एक चला चल
पा जाएगा मधुशाला

हरिवंश राय बच्चनबच्चन: जीवन परिचय
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