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अमिताभः अभिनय, आक्रोश या अराजकता | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शेक्सपियर के नाटक किंग लियर का बूढ़ा सम्राट अपनी दो चाटुकार पुत्रियों को सत्ता सौंप देता है और अपनी सच बोलने वाली बेटी को बहिष्कृत कर देता है. सत्ता परिवर्तन होते ही उसे अपनी चाटुकार बेटियों के निर्मम स्वार्थ का ज्ञान होता है और अंत में सच बोलने वाली बहिष्कृत बेटी ही उसको दिलासा देती है. इस महान त्रासद नाटक से प्रेरित होकर उत्पल दत्त ने दशकों पूर्व ‘आखरी शाहजहाँ’ नामक बंगाली नाटक की रचना की. ज्ञातव्य है कि अपने निर्मम बेटे औरगंजेब द्वारा बंदी बनाए जाने पर बूढ़े शाहजहाँ की सेवा ताउम्र उसकी बेटी जहाँआरा ने की. वृद्ध सम्राटों और उनकी सेवा करने वाली दो बेटियों की ये कहानियां पिता-पुत्री-रिश्ते की अन्यतम रचनाएँ हैं. चुनौती सुना है कि रितुपर्णा घोष की फ़िल्म ‘द लास्ट लियर’ उत्पल दत्त के नाटक से प्रेरित अंग्रेज़ी भाषा में बनी फ़िल्म है. जिसमें अमिताभ बूढ़े आक्रोश से भरे पिता हैं. रितुपर्णा घोष की फ़िल्म में नायक रंगमंच का हिमायती है और फ़िल्म के भीतर फ़िल्म का निर्देशक सिनेमा की शक्ति पूजा करता है. जिस तरह रंगमंच के विकास के साथ नौटंकी, जात्रा और तमाशे का महत्व तथा लोकप्रियता घटी, उसी तरह सिनेमा के विकास के साथ रंगमंच की लोकप्रियता भी घटी है. अतः बूढ़ा आक्रोश से भरा नायक गुज़रे एक्सीलेंस के पराभव के कारण दुखी है और नए विकसित माध्यम के ख़िलाफ़ हारी हुई लड़ाई लड़ते हुए अंत में कहता है कि अभिनय हृदय के भीतर अभिव्यक्त करने की तीव्र लालसा से ही जन्म लेता है. अतः यह भूमिका अमिताभ के लिए अपने प्रारंभ के दिनों में सफल रही आक्रोश की छवि को पुनः सार्थक करने का प्रयास हो सकती है. प्रायश्चित हाल ही में राम गोपाल वर्मा द्वारा रचे हादसे और उसमें क्रोध के भोंडे कैरीकेचर के लिए शर्मसार अमिताभ बच्चन के लिए ‘लास्ट लियर’ फ़िल्म नहीं प्रायश्चित है. ज्ञातव्य है कि शेरवुड नैनीताल में युवा अमिताभ ने शेक्सपियर का नाटक करके ज्योफ्रे कैंडल पुरस्कार जीता था. उम्र के इस दौर में मनुष्य याद के गलियारों में बार-बार जाना पसंद करता है और मौत इन गलियारों से नहीं लौटने की तरह हो सकती है गोया कि यादें आपको मृत्यु के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है. कुछ लोकप्रिय बातें इस तरह मज़बूती से स्थापित हो जाती हैं कि उन्हें सत्य मान लिया जाता है. जैसे कहा जाता था कि कपूर परिवार की औरतें अभिनय नहीं करतीं जबकि गीताबाली, जैनीफ़र केंडल, बबीता, नीतू सिंह, संजना कपूर अभिनेत्रियाँ रही हैं. इसी तरह अमिताभ बच्चन को आक्रोश छवि का प्रतिनिधि सितारा माना जाना, जबकि उन्होंने विविध भूमिकाएँ प्रवीणता के साथ अभिनीत की हैं. आक्रोश यह भी एक लोकप्रिय बात है कि ‘ज़ंजीर’, ‘दीवार’ और ‘त्रिशूल’ में उसके आक्रोश में दर्शक ने व्यवस्था के प्रति अपनी भावनाओं को पर्दे पर प्रस्तुत पाया.
उपरोक्त तीनों फ़िल्मों में नायक अपने परिवार का बदला ले रहा है और उसका आक्रोश ओमपुरी द्वारा ‘अर्धसत्य’ में अभिव्यक्त आक्रोश के व्यापक समाजिक चिंता से नहीं उपजा है. ‘शहंशाह’ और ‘अंधा क़ानून’ जैसी फ़िल्मों का नायक आक्रोश नहीं अराजकता का वाहक लगता है और ये फ़िल्में अनाम, अनजान तानाशाह के नाम लिखे आमंत्रण पत्रों की तरह हैं कि इस देश में कोई क़ानून या व्यवस्था नहीं है. आप सफ़ेद घोड़े पर बैठकर आइए. इन फ़िल्मों का नायक कहता है कि वह जहाँ खड़ा है, वही अदालत है और उसके द्वारा कहे गए शब्द ही क़ानून हैं. तीन तथाकथित आक्रोश वाली भूमिकाओं के बाद मनमोहन देसाई ने हिंदुस्तानी सिनेमा की परंपरा में सब तरह का मनोरंजन करने वाला पात्र एंथनी गढ़ा जिसने टिकट खिड़की पर ‘ज़जीर’, ‘त्रिशूल’ और ‘दीवार’ की संयुक्त आय से अधिक धन बटोरा तथा अमिताभ बच्चन को एकल व्यक्ति उद्योग में बदल दिया. अब उसकी फ़िल्मों में हास्य अभिनेता और मज़बूत चरित्र अभिनेता की ज़रूरत नहीं रही. उसे एक सशक्त ख़लनायक मात्र की आवश्यकता थी जिसे धुन कर वह दर्शकों की प्रशंसा प्राप्त करता है. सीमाएँ बदन की सीमाओं के कारण वह नायिका की भूमिका नहीं कर सकता था. उसकी इसी छवि की फ़िल्मों की संख्या अधिकतम है और उसकी अपार लोकप्रियता का आधार भी यही फ़िल्में हैं. अमिताभ बच्चन ने 50 पार करने के बाद अपनी आक्रोश छवि को फिर से जीवित करने के लिए महेश मांजरेकर के साथ स्वयं ‘विरुद्ध’ का निर्माण किया. यह महेश भट्ट की ‘सारांश’ से प्रेरित फ़िल्म थी परंतु सारांश का वृद्ध व्यक्ति अपने घर में किराए से रहने वाली अनजान लड़की के साथ हुए अन्याय के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री से टकरा जाता है. अतः उसके आक्रोश का जन्म सामाजिक शोषण और राजनीतिक अनाचार की ज़मीन से होता है. मांजरेकर की ‘विरुद्ध’ में इस आधार के अभाव के कारण ही फ़िल्म असफल रही. ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की विराट सफलता के बाद अपनी दूसरी पारी में अमिताभ बच्चन ने ‘मोहब्बतें’ में निर्मम व्यवस्था के प्रतीक प्राचार्य की भूमिका अभिनीत की अर्थात अब वह दीवार के इस पार खड़ा है. ‘कभी खुशी कभी गम’ में भी सामंतवादी अहंकार का वाहक धनाढ्य व्यक्ति हैं अमिताभ. अर्थात अब वह ‘त्रिशूल’ का संजीव कुमार है. रामगोपाल वर्मा की ‘निशब्द’ में वह ‘कभी-कभी’ का बुढ़ाया हुआ ऋषि कपूर है. इस पारी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाएँ हैं संजय लीला भंसाली की ‘ब्लैक’ और यश चोपड़ा की ‘वीरज़ारा’. दूसरी पारी इस दूसरी पारी में भी चतुर फ़िल्मकारों ने मनमोहन देसाई द्वारा गढ़े मनोरंजन करने वाले पात्र का भरपूर उपयोग किया है. हर फ़िल्म में उसे गीत संगीत के आइटम दिए गए हैं और करण जौहर ने ‘कभी अलविदा ना कहना’ में इसी पात्र को अतिरंजना के साथ प्रस्तुत किया. दरअसल, अमिताभ बच्चन भावना की तीव्रता को प्रस्तुत करने वाले महान कलाकार हैं और इसी तीव्रता को आक्रोश भी माना गया. जिसमें भले ही सामाजिक सोद्देश्यता नहीं हो परंतु तीव्रता तो थी. वह तो अपनी 30 सेकंड की विज्ञापन फ़िल्मों में भी कमाल करता है. ‘चीनी कम’ में कितनी किफ़ायत से उसने सरकाज्म और डिज़ायर को प्रस्तुत किया है. अमिताभ की पहली पारी में उसे कोई बिमलराय, गुरुदत्त या राज कपूर नहीं मिला, फिर भी उसने कमाल का अभिनय किया. आज के दौर में संजय लीला भंसाली, राज कुमार हीरानी, राकेश मेहरा, और फ़रहा ख़ान (मनमोहन देसाई का वर्तमान स्वरूप) ऐसे प्रतिभाशाली फ़िल्मकार हैं जो अमिताभ की प्रतिभा के साथ संपूर्ण न्याय कर सकते हैं. |
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