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बच्चनजी ने कविता को आमजन तक पहुँचाया | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हरिवंशराय बच्चनजी की जन्मशताब्दी के मौक़े पर उनकी एक पंक्ति याद आती है. "अब न रहे वो पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला." 1930-31 के दौर में बच्चनजी हिंदी दुनिया के क्षितिज पर अपनी ‘मधुशाला’ के साथ प्रकट हुए थे. बच्चनजी की सबसे बड़ी देन है कि उन्होंने हिंदी कविता को आम जनता तक पहुँचाया और श्रोता और पाठक तैयार करने का काम किया. उर्दू में मुशायरों की परंपरा थी लेकिन हिंदी में कविता गोष्ठियाँ होती थीं. मधुशाला के ज़रिए बच्चन जी ने यह बताया कि आम बोलचाल की भाषा में हिंदी कविता संभव हो सकती है. छायावादी कविता के बरक्स उन्होंने बहुत बड़ा पाठक समुदाय और श्रोता मंडल तैयार किया था. अभूतपूर्व बच्चनजी ने वो काम किया जो उनके पहले हिंदी में किसी ने नहीं किया था. आज के दौर में देखें तो सचमुच वो दौर ख़त्म हो चुका है. इसीलिए मैंने कहा कि ‘अब न रहे वो पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला.’ उन्होंने कहा था कवि साकी बनकर आया है, उन्होंने इसलिए एक नई भाषा, एक नया अंदाज़ शौक पैदा किया. दूसरी बात बच्चन जी के बारे में कहनी है कि उनकी एक पुस्तक मधुकलश है. उसकी उपेक्षा हुई है. आज़ादी की लड़ाई का दौर था, उसमें साहस और हिम्मत दिलाने वाली महत्वपूर्ण कविताएँ हैं. तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण है ज़िंदगी में किनारे बैठ करके तमाशा देखना बड़ा आसान है, लेकिन लहरों के निमंत्रण में कोई आदमी कूद पड़े, तमाशाई बन कर नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में और आंदोलन में कूद पड़ना, हिस्सा लेने की चुनौती उन्होंने युवकों को दी थी. नया उत्साह भगवती चरण वर्मा और अन्य अनेक लोग उस दौर में जवानी को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे. जवाहरलाल नेहरू युवकों के नेता कहे जाते थे. तो इस जवानी को एक मूल्य प्रदान करना और उसका जयगान करना, एक तरह से नए युग, नए दौर और नए उत्साह को कविता और साहित्य की दुनिया में स्थापित करने वाले थे बच्चन जी. तीसरी बात, बच्चन जी की महत्वपूर्ण कविता संग्रहों में ‘निशा निमंत्रण’ और ‘एकांत संगीत’ है. लोग भूल जाते हैं कि वो केवल मधु और प्याला वाले कवि नहीं थे. उनकी कविता की दो पंक्तियाँ लोगों को याद दिलाना चाहता हूँ- अग्नि पथ, अग्नि पथ, अग्नि पथ. उस दौर में क्रांति लिखने वाले भी बहुत से कवि थे, लेकिन बच्चन जी का ये पहलू है जो बराबर ध्यान में रखना चाहिए. आमतौर पर लोग उनको प्रेम और प्रेयसी की तमाम कविताओं के रूप में देखते हैं. लेकिन उनका दुनिया को देखने का नज़रिया बराबर का रहा है. ज्यादा प्रयोग चौथी बात बच्चन जी ने प्रयोगवादियों से ज़्यादा प्रयोग किए हैं, छंदों में किए हैं, कविता के रूपों में किए हैं. जिंदगी भर करते रहे हैं.
आख़िरी दम तक उनकी लिखी कविताएं देखें तो ‘सोन मछरी’ में उन्होंने बीकानेरी लोकगीतों की धुन ले करके कुछ नए ढंग की कविता लिखी. उन्होंने अनेक तरह के छंदों में, मुक्त छंदों में कविताएं लिखीं. वो एक लकीर पीटने वाले कवियों में नहीं थे. ख़ास बात ये है कि बच्चन जी बोलचाल की भाषा में कविता लिखते थे इसलिए बहुत अच्छे गद्य लेखक थे. उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘क्या भुलूं क्या याद करूं’ तीन जिल्दों में लिखी है. उस तरह का गद्य हिंदी में बहुत दुर्लभ मिलेगा. कविता की भाषा और गद्य की भाषा में अंतर नहीं है. एक दौर में अंग्रेज़ी के रोमांटिक कवियों वुर्डसवर्थ ने जो कहा था, वो उन्होंने कर के दिखाया. इसलिए मैं उन्हें बहुत अच्छा गद्य लेखक मानता हूँ. साफ़दिली बच्चन जी के संदर्भ में ‘निशा निमंत्रण’ की एक भूमिका याद आती है. बच्चन जी को पूजनेवाले भी बहुत से दिखाई पड़ेंगे, पर वे इसके ख़िलाफ़ थे. उन्होंने भूमिका में एक छोटी सी कहानी दी है- सृष्टि के आरंभ में जब मनुष्य ने आसमान की ओर हाथ उठाकर कहा कि सब कुछ है हमारे पास कोई देवता नहीं है जिसकी पूजा कर सकें. आसमान ने कहा कि ठीक है, हम भेजते हैं एक देवता को. उन्होंने भेजा और लोगों ने एक मंदिर बनाया और एक मूर्ति की तरह स्थापित किया. फूल माला चढ़ाते रहे, रातभर ये सिलसिला चलता रहा. दरवाज़ा अंत में बंद कर दिया गया. सुबह जब लोगों ने देखा तो वह मरा हुआ पड़ा था. बहुत दुखी हुए कि हमने इतनी पूजा की. हम नहीं जानते थे कि हमारी फूल मालाओं से हमारा देवता मर जाएगा. बहुत दुखी होकर फिर लोगों ने आसमान की ओर हाथ उठाकर कहा कि हमें अफ़सोस है कि हमारी ग़लतियों से हमारा देवता मर गया, हमको दूसरा देवता दो. खामोशी रही आसमान में. थोड़ी देर के बाद आसमान में गड़गड़ाहट हुई और पत्थरों की वर्षा हुई और आसमान से आकाशवाणी हुई कि मनुष्य तुम इसी लायक हो. तुम जिंदा देवता को नहीं पूज सकते हो तुम पत्थरों को पूजने के लिए हो. तभी से इंसान पत्थरों की पूजा कर रहा है... ये छोटी सी कहानी 'निशा निमंत्रण' के शुरू में दी गई है. और ये बच्चन जी के उस स्वभाव का प्रतीक है. एक कविता में पहले उन्होंने कहा था कि ‘यदि छिपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता’ यह साफ़दिली, खुल कर के कहना, कोई गोपनीयता न हो, ये खुलापन ही था जिसके कारण बच्चनजी लोकप्रिय तो बहुत हुए लेकिन जितना सम्मान और पूजा कुछ हिंदी कवियों की जाती है, उससे वे वंचित रहे. मैं समझता हूँ, इस मौक़े पर बच्चन जी को याद करना, उनके कवि कर्म को नए सिरे से पहचानना और उन्हें याद करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. | इससे जुड़ी ख़बरें बच्चन जी को अंतिम विदाई | भारत और पड़ोस होली 'ख़ास' लोगों की07 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस तस्वीरों में: कवि की अंतिम यात्रा | भारत और पड़ोस मधुशाला' का चिराग़ बुझा | भारत और पड़ोस कैसे नहीं हैं अमिताभ बच्चन 'किसान'04 जून, 2007 | भारत और पड़ोस 'जब तक शरीर साथ देगा काम करूँगा'09 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस दो परिवारों की दोस्ती और दुश्मनी20 अक्तूबर, 2004 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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