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हरिवंश राय बच्चन: जीवन के कवि | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हरिवंशराय बच्चन से मेरा परिचय 1947 में हुआ था जब मैंने अपनी किताब ‘संघर्ष’ उनको भेंट की थी. उसके बाद उनसे मेरा परिचय निरंतर प्रगाढ़ होता रहा. शुरू में बच्चन जी का प्रभाव मेरे ऊपर रहा, बाद में मैंने अपना रास्ता ख़ुद तलाश किया. बच्चन जी का सबसे बड़ा योगदान हिंदी कविता में यह है कि बच्चन जी से पहले कविता आकाश में घूम रही थी, वह जीवन से संबंधित नहीं थी. बच्चन जी का पहला काम यह किया कि आकाशीय कविता को उतारकर ज़मीन पर खड़ा कर दिया और सामान्य आदमी जैसा सुख-दुख भोग रहा है, उस सुख-दुख की कहानी उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से कही. प्रभाव उस समय उनकी कविता ‘मधुशाला’ सारे देश में चर्चित हो रही थी. धीरे-धीरे उनकी और कृतियाँ पढ़ीं. यद्यपि ‘मधुशाला’ उनकी प्रमुख रचना है, लेकिन ‘हलाल’ उनकी एक और प्रसिद्ध कृति है, जिसका मेरे ऊपर प्रभाव पड़ा. साथ ही निशा निमंत्रण में जो सौ गीत हैं. लेकिन यदि इसके एक-एक गीत को पढ़ें तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता. उसका प्रभाव तब होता है जब एक साथ सारे गीत पढ़े जाएँ तब उसका एक वातावरण तैयार हो जाता है. मैं ‘निशा निमंत्रण’ को सौ खंडों का एक गीत काव्य कहता हूँ. बच्चनजी ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को कविता बनाया है. जब अकेले थे तब ‘एकांत संगीत’ लिखा, जब विवाह हुआ तो ‘मिलन यामिनी’ लिखी फिर सतरंगिनी लिखी और लोकगीत भी लिखे. बच्चनजी की मधुशाला बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हुई तो बहुत जगह इसका विरोध भी हुआ. उन्हें कहना पड़ा, "यदि छुपाना जानता तो जग मुझे साधु समझता...." गायन की परंपरा कवि सम्मेलन में गायन की परंपरा बच्चनजी से ही स्थापित हुई है. वे जब मधुशाला सुर में गाते थे तो लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे. अपने समय में बच्चनजी सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे. लड़के-लड़कियाँ उनके पीछे पागलों की तरह भागते थे, मधुशाला का नाम सुनते ही पंडाल में भीड़ लग जाया करती थी. जब कवि सम्मेलनों में बच्चनजी की माँग होने लगी तो उन्होंने कहा कि आप डॉक्टरों को फ़ीस देते हैं, प्रोफ़ेसर को पढ़ाने की फ़ीस देते हैं, तो बेचारा कवि उससे वंचित क्यों रह जाए. वो अपनी रात बर्बाद करता है, समय बर्बाद करता है, छुट्टी लेता है, इसलिए बच्चनजी ने भी कवि सम्मेलनों में पारिश्रमिक की परंपरा जोड़ी. सबसे पहले वे सौ रुपए और फर्स्ट क्लास का किराया लिया करते थे. धीरे-धीरे ये परंपरा आगे बढ़ती चली गई. आज अनेक कवियों के पेट भरे हुए हैं और हवाई जहाज से सफ़र करते हैं, वे बच्चनजी की आरंभ की हुई परंपरा का फायदा उठा रहे हैं. बच्चनजी के साथ मैंने बहुत काव्य पाठ किए हैं. एक बार हम लोग कवि सम्मेलन में बांदा जा रहे थे. कानपुर से कवियों के लिए बस कर दी गई. जब मैं बस में चढ़ा तो उसमें जगह नहीं थी तो बच्चनजी ने कहा कि मेरी गोद में बैठ जाओ. तब मैंने कहा कि आपकी गोद में तो बैठा ही हूँ, लेकिन आपकी गोद का भी सम्मान रखूँगा, एक दिन इसी तरह लोकप्रिय होऊँगा जिस तरह आप हुए हैं. उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया. निशा निमंत्रण बच्चनजी जीवन पर्यन्त कविता लिखने में मस्त रहे. जीवन में प्रत्येक क्षण को उन्होंने भोगा है.
जब श्यामा भाभी की मृत्यु शैया के पास अकेले बैठ कर उनकी परिचर्या कर रहे थे तब ‘निशा निमंत्रण लिखा’ था. वो बड़ी प्रभावशाली कविता थी. आज लोग उसकी मार्मिकता को नहीं समझ पा रहे हैं. एक गीत है- रात आधी हो गई है कवि का मूल्यांकन उसकी कविता से करना चाहिए, अपना दृष्टिकोण उस पर आरोपित नहीं करना चाहिए. बच्चनजी का मूल्यांकन उनके सामने नहीं हुआ. उन्हें कोई हालावादी कहने लगा, मैं उन्हें हालावादी नहीं जीवनवादी कहता हूँ. वे पहले कवि हैं जिन्होंने कविता को पूरे जीवन के साथ जोड़ा है. जब दिन जल्दी-जल्दी ढलता है, वो अंत में कहते हैं मुझसे मिलने को कौन विकल, | इससे जुड़ी ख़बरें होली 'ख़ास' लोगों की07 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस तस्वीरों में: कवि की अंतिम यात्रा | भारत और पड़ोस बच्चन जी को अंतिम विदाई | भारत और पड़ोस मधुशाला' का चिराग़ बुझा | भारत और पड़ोस कैसे नहीं हैं अमिताभ बच्चन 'किसान'04 जून, 2007 | भारत और पड़ोस 'जब तक शरीर साथ देगा काम करूँगा'09 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस दो परिवारों की दोस्ती और दुश्मनी20 अक्तूबर, 2004 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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