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हरिवंश राय बच्चन: कुछ यादें, कुछ बातें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
डॉक्टर हरिवंशराय बच्चन की छवि जब-जब मेरे मानस पटल पर उभरती है तो उनका गौरवर्ण चेहरा, काले फ्रेम वाला मोटा चश्मा और उसके भीतर से सामने वाले को पढ़ती हुई गहरी आँखें, घुंघराले बाल, मुस्कुराहट और खिलखिलाहट को दबाए हुए अधर, नाक के पास मोटा सा काला मस्सा, मंझोला कद, सूटेड-बूटेड व्यक्तित्व, तरतीबवार किताबों से सुसज्जित उनका अध्ययन कक्ष, यह सब मेरे सामने पुनर्जीवित हो जाता है. बच्चनजी को मैं कब से जानता हूँ, यह तो मुझे भी ठीक से याद नहीं है, लेकिन इतना तय है कि तब मैं सात-आठ बरस का तो रहा होऊँगा. मैं अपने पिता पं. गोपाल प्रसाद व्यास के साथ अलीगढ़ नुमायश के एक कवि-सम्मेलन में गया था. पहली सीख मेरे पिता ने मेरा नाम बताते हुए कहा था कि ये मेरा दूसरे नंबर का बेटा है. इसकी कविता और साहित्य में रुचि है. बच्चनजी काले रंग का चेस्टर पहने हुए थे. उन्होंने अपनी जेब में से चार-पाँच काजू और चार-पाँच किशमिश निकाले और मुझे देते हुए कहा, "कविता सुनने आए हो तो उसे समझने की भी कोशिश करना." मैंने उनके चरण छूते हुए कहा-ठीक है. बात आई-गई हो गई. यह थी बच्चनजी से मेरी पहली संक्षिप्त मुलाकात. इसके बाद कई बार व्यासजी के पास उनके फ़ोन आते थे. मैं फ़ोन उठाता था, उनको प्रणाम करता और पिताजी को टेलीफ़ोन दे देता. एक बार वो लाल किले के कवि-सम्मेलन में मुझे मिले. अमिताभ उनके साथ थे. उन्होंने अमिताभ से मेरा परिचय कराया और कहा कि दोनों बैठकर शांतिपूर्वक कविताएँ सुनो. ऑटोग्राफ कवि सम्मेलन समाप्त हुआ तो मैं उनके ऑटोग्राफ लेने गया. ऑटोग्राफ देने के बाद मुझसे बोले-संभालकर रखना. तुलसीदास की एक अर्धाली (चौपाई की पहली पंक्ति) लिख रहा हूँ. और नीचे लिखा बच्चन जो अंग्रेज़ी में Good के समान लगता था. बच्चनजी के हस्ताक्षर सचमुच ही अंग्रेज़ी के गुड जैसे होते थे.
हमारे विद्यालय में तुलसी जयंती का आयोजन था. मेरे प्राचार्य की इच्छा थी कि किसी तरह बच्चनजी को विद्यालय में बुलाया जाए. मैंने उनसे मिलने का समय मांगा. उन्होंने दे भी दिया. मैं बस से धक्के खाते हुए अपने कुछ साथियों को लेकर उनके घर पहुँचा तो 15 मिनट की देरी हो चुकी थी. वह बाहर आए और बोले, "गोविंद तुम देर से आए हो. समय के अर्थ और महत्व को समझो, फिर कभी फ़ोन करके आना." मैं समझ गया कि वो समय के बहुत पाबंद हैं. उसके महत्व को उन्होंने मुझे इशारे से समझा भी दिया. फिर जब भी मैं उनसे मिला समय से ही मिला. इस बीच श्रीमती तेजी बच्चन भी मुझे नाम और रिश्ते से जान गईं थीं. अब मैं थोड़ा बड़ा हो गया था. कविता भी लिखने लगा था और मंच का संचालन भी करने लगा था. लोग मुझे अच्छी तरह जान-पहचान भी गए थे. कुछ लोगों को ऐसा विश्वास भी हो गया था कि यदि बच्चनजी को बुलाना है तो गोविंद व्यास को बीच में डालना ही पड़ेगा. इकलौती शर्त बच्चनजी कभी मेरी बात को मना नहीं करते थे. बस उनकी एक ही शर्त होती थी कि वह पहले दर्जे में सफ़र करेंगे और जो मुंह से बोल दिया उससे कम पारिश्रमिक नहीं लेंगे. अन्य कवि सम्मेलनी कवियों की तरह समझौता नाम का शब्द उनके शब्दकोश में नहीं था. इस बीच उनके साथ यात्रा करते-करते मुझे भी पहले दर्जे में यात्रा करने का चस्का लग गया. यहाँ मैं कहना चाहूँगा कि अनेक बार उन्होंने मेरा फर्स्ट क्लास का टिकट भी खरीदा और कहा, "असुविधा और असम्मान के साथ कोई कवि सम्मेलन नहीं करना चाहिए." मैं कॉलेज में प्रोफेसर बन गया तो सबसे पहला बधाई का फ़ोन बच्चनजी का मेरे पास आया और कहा कि क्लास में बिना पढ़े कभी मत जाना. जो पढ़ाने जा रहे हो उसे खुद भी समझना चाहिए. इस नियम का मैंने काफ़ी अरसे तक पालन किया. सन् 1973 में हम गुलमोहर पार्क आ गए थे. हमारे आने के कुछ दिन बाद ही बच्चनजी का भी मकान बनना आरंभ हो गया था. वो बीच-बीच में मकान की प्रगति को देखने आते थे. आने से पहले मुझे फ़ोन करते थे. मैं समय से पहले वहाँ पहुँच जाता था. वो ठेकेदार और आर्किटेक्ट को बीच-बीच में समझाते थे. उनकी सर्वाधिक रुचि अपने मकान के मंदिर और अध्ययन कक्ष के प्रति होती थी. जाते समय वह तुलसीदास की एक चौपाई मुझे अवश्य सुनाते थे. तुलसी के प्रति उनके मन में गहन आस्था थी. सोपान मकान के नामकरण पर उनके मन में अक्सर मंथन होता रहता था. और बहुत जद्दोजहद के बाद उन्होंने अंतिम निर्णय लिया कि इस मकान का नाम ‘सोपान’ होगा. मकान बन गया. बच्चनजी गुलमोहर पार्क आ गए. तब तक अमिताभ फ़िल्मी दुनिया में अपना स्थान बना चुके थे. बच्चनजी के लिए एक बॉडीगार्ड रख दिया गया था. वह सुबह-सुबह टहलने जाते थे और मैं भी. इस बीच बच्चनजी के घुटनों में तकलीफ़ रहने लगी. बॉडीगार्ड तेज़ चलता था और मैं बच्चनजी के साथ धीरे-धीरे टहलता था. लगभग 50-60 गज चलने के बाद वह थकान अनुभव करते और एक पुलिया पर बैठ जाते थे. वो तुलसीदास की महत्ता, सामयिकता और उनके साहित्य की प्रासंगिकता को पाँच-सात मिनट नियमित रूप से समझाते थे. मजाल है कि कभी उनकी व्याख्या में दोहराव आया हो. तुलसी के बाद यदि उनके मन में सबसे अधिक आसक्ति थी तो अपने पुत्र अमिताभ के प्रति. वो हमेशा अमिताभ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की खूबियों को रेखांकित करते थे. अमिताभ जैसे पुत्र को पाकर वह हमेशा गौरव का अनुभव करते थे. दोहराव के नाम पर केवल अमिताभ की तारीफ़ ही होती थी. वो अमिताभ की अनुपस्थिति में अमिताभ को मेरे सामने कभी-कभी अमितजी भी कहकर पुकारते थे. इस बात को वह बेनागा कहा करते थे कि देखो अमितजी मेरा कितना ध्यान रखते हैं. मुझे कई बार झुंझलाहट भी होती थी. क्योंकि वह घर के अन्य सदस्यों का बिल्कुल जिक्र नहीं करते थे. बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि उन्होंने अपनी ‘सतरंगिनी’ पुस्तक यह लिखते हुए-जिसने अमिताभ जैसा पुत्र मेरी गोदी में दिया उस तेजी को सस्नेह- कहकर समर्पित की थी. | इससे जुड़ी ख़बरें तस्वीरों में: कवि की अंतिम यात्रा | भारत और पड़ोस बच्चन जी को अंतिम विदाई | भारत और पड़ोस होली 'ख़ास' लोगों की07 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस मधुशाला' का चिराग़ बुझा | भारत और पड़ोस टाटा, बिड़ला और अमिताभ | भारत और पड़ोस अमिताभ मंडेला के सहयोगी? | भारत और पड़ोस रायशुमारी खिलवाड़-अमिताभ | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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