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गुरुवार, 15 नवंबर, 2007 को 17:48 GMT तक के समाचार
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गुम है भविष्य का पासवर्ड

बिना अँगरेज़ी और कंप्यूर के इन बच्चों का क्या भविष्य है?
भारत के शहरी मध्यवर्ग की प्रगति के दो पहिए रहे हैं अँगरेज़ी और कंप्यूटर. इन दोनों से ग्रामीण भारत वंचित रहा है या रखा गया है.

गाँवों की हालत बेहतर बनाने का कोई इरादा कहीं नहीं दिखता लेकिन सचमुच गाँवों की हालत बेहतर करनी है तो दो काम ज़रूरी हैं--प्राथमिक स्तर से ही अँगरेज़ी और माध्यमिक स्तर पर कंप्यूटर की पढ़ाई शुरू करना.

ग्रामीण आबादी को रोज़गार की दो बुनियादी शर्तें पूरी करने रोके रखा गया है. उनके पास शहरों में जाकर मज़दूरी करने के अलावा कोई वास्तविक विकल्प नहीं हैं.

अँगरेज़ी के मामले में जो हुआ, सो हुआ लेकिन कंप्यूटर की ताक़त जानने के बाद भी सरकारें कोई गंभीरता नहीं दिखा रही हैं.

इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है सौ डॉलर यानी लगभग चार हज़ार रुपए वाला लैपटॉप जिसे ख़रीदने और उपलब्ध कराने में भारत ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

हाल ही में दक्षिण अमरीकी देश उरुग्वे ने ऐसे एक लाख लैपटॉप ख़रीदने का ऑर्डर दिया है, विकासशील उरुग्वे के स्कूलों में 12 साल से अधिक उम्र के सभी छात्र-छात्राओं लैपटॉप उपलब्ध होगा.

ठीक है कि उरुग्वे कम आबादी वाला देश है भारत में माध्यमिक स्तर पर पढ़ रहे हर बच्चे को लैपटॉप उपलब्ध कराना आसान नहीं है, लेकिन कहीं तो कोशिश होती, एक राज्य न सही, एक ज़िले में ही.

बदहाली या अवसर

प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल बदहाल हैं, वहाँ बिजली नहीं, ब्लैकबोर्ड नहीं हैं, ऐसे में लैपटॉप की बात कौन करे, यह एक आम दलील है.

उरुग्वे को अपनी इस पहल के अच्छे परिणाम ज़रूर दिखेंगे

स्कूलों में बिजली नहीं है तो कोई बात नहीं सौ डॉलर वाला लैपटॉप सौर ऊर्जा से चलता है, सूरज न उगे तो चाभी भरकर भी चलता है, ख़ास मज़बूत प्लास्टिक का बना है, गिरने पर आसानी से नहीं टूटता और बारिश हो तो वाटरप्रूफ़ है.

लगभग सारे बहानों का उपाय पहले ही कर दिया गया है लेकिन इरादा न हो तो क्या किया जा सकता है?

असल में साधन उपलब्ध न हों तो टेक्नॉलॉजी की सीढ़ियाँ लाँघना ज्यादा आसान हो जाता है, अगर स्कूलों में डेस्कटॉप कंप्यूटर होते तो उन्हें छोड़कर इन लैपटॉप कंप्यूटरों को ख़रीदने का फ़ैसला मुश्किल होता लेकिन जब कुछ नहीं है तो सीधे इन कंप्यूटरों से शुरूआत की जा सकती है.

मोबाइल फ़ोन इसी 'टेक्नॉलॉजी लीप' का उदाहरण हैं, जिनके पास बेसिक फ़ोन नहीं थे उन्हें सीधे मोबाइल मिल गए.

स्कूली बच्चों को चार हज़ार रुपए वाला लैपटॉप उपलब्ध कराना अगर दुनिया की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, सबसे तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था, बीसियों अरबपतियों वाली अर्थव्यवस्था के बस की बात नहीं है तो यह सबका दुर्भाग्य है.

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