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'स्टारडम सहगल के सिर पर सवार नहीं हुआ'

टॉम अल्टर
टॉम अल्टर ने नाटक में किस्सागोई के अंदाज में सहगल की कहानी सुनाई है
कुंदनलाल सहगल ने एक बड़े संगीत आयोजन में इसलिए गाने से मना कर दिया था क्योंकि उस दिन उन्हें अपने ड्राइवर की बेटी की शादी में गाने के लिए जाना था.

एक बार किसी की मदद के लिए उन्होंने बाज़ार में घूम-घूमकर गाना गाया और चंदा इकठ्ठा किया था.

आख़िर यह कैसे संभव हुआ कि मुरादाबाद रेलवे स्टेशन पर काम करने वाला टाइमकीपर हिंदी सिनेमा का पहला सुपरस्टार बन गया और ग़ज़ल गायकी के बादशाह के रूप में जाना जाने लगा?

सहगल के जीवन के कुछ ऐसे ही अनछुए पहलुओं को उजागर करता है टॉम ऑल्टर का नाटक 'केएल सहगल' जिसका मंचन हाल में देहरादून में हुआ है.

क़िस्सागोई

टॉम ऑल्टर इस नाटक में क़िस्सागोई के अंदाज़ में सहगल की कहानी सुनाते हैं. सहगल की भूमिका निभाई है उदय चंद्रा ने.

 सहगल सुपरस्टार थे लेकिन उनके सिर पर स्टारडम का जादू कभी नहीं चढ़ा, वो उतने ही विनम्र और मानवीय बने रहे
सईद आलम, लेखक

टॉम ऑल्टर कहते हैं, "आमतौर पर लोग सहगल को मज़ाक से याद करते हैं कि कैसे वो नाक से गाना गाया करते थे. मैं भी उनके बारे में कुछ इसी तरह से जानता था लेकिन इस नाटक के ज़रिए मैं सहगल साहब के बहुत क़रीब पहुँच गया और तब ये जाना कि वो इंसान इस मज़ाक से बहुत ऊपर था."

टॉम कहते हैं, "सबसे ज़्यादा मैं इस बात से प्रभावित हुआ कि उनका जो फ़न है चाहे वो गाने का हो या अभिनय का वो अलग ही है. आप फ़िल्में देखिए तो वो एक अलग दृश्य में हैं और बाक़ी लोग अलग नज़र आते हैं. गायकी देखिए तो जिस भाव में गाते थे उसी में डूब जाते थे. उनका अंदाज ही अलग था."

सहगल जम्मू के राजा के तहसीलदार के बेटे थे और तहसीलदार का बेटा गायक बने ये किसी को मंज़ूर न था.

ख़्वाहिश

नाटक में वो एक जगह कहते हैं, "बस एक ही ख़्वाहिश है कि मैं एक बहुत बड़े संगीत सम्मेलन में गाऊं और लोग वाह-वाह कर उठें. सामने मेरी मां बैठी हो और तब मैं कहूँ कि मेरे सम्मान की असली हक़दार मेरी मां हैं."

सहगल
नाटक में 1924 से 1941 के कालखंड को विशेष तौर पर दर्शाया गया

नाटक में 1924 से 1941 के कालखंड को विशेष तौर पर दर्शाया गया है.

सहगल ने कानपुर में चमड़े के कारोबार से अपने जीवन की शुरूआत की, जहाँ उन्हें 'चमड़ा बाबू' के नाम से ही जाना जाने लगा लेकिन वहां भी ग़ज़ल की महफिलें जमने लगीं.

जब रैंमिंग्टन कंपनी में सेल्समैन का काम किया तो वहां टाइपराइटर की खट-खट पर ही गुनगुनाने लग जाते. जो सुनता वही दीवाना हो जाता.

उस जमाने के मशहूर संगीतकार उस्ताद फ़ैयाज़ खां साहब ने सहगल को सुनकर कहा था, 'तुम्हें देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है.' उधर अनिल बिस्वास ने सहगल को ग़ज़ल गायकी का बादशाह कहा.

सहगल ने संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी. कुछ समय उन्होंने कानपुर की एक नामी तवायफ़ के यहाँ संगीत सीखा. जिन कोठों पर लोग हुस्न की तलाश में जाते वहाँ सहगल ग़ज़ल गायकी की बारीकियां सीखते.

सहगल ने 36 फ़िल्मों में अभिनय किया और 200 से ज़्यादा गाने गाए. वह महज़ 43 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए,लेकिन इस छोटे से दौर में उन्होंने शोहरत की बुलंदियां हासिल कर ली थीं.

चुनौती

इस नाटक के लेखक हैं डॉक्टर सईद आलम. वह कहते हैं, "सहगल सुपरस्टार थे लेकिन उनके सिर पर स्टारडम का जादू कभी नहीं चढ़ा, वो उतने ही विनम्र और मानवीय बने रहे. आज के दौर के ग्लैमर को देखकर लगता है कि वो कितने दुर्लभ इंसान थे."

 मेरा अगला प्रोजेक्ट गांधी हैं. मैं गांधीजी के जीवन के अंतिम 5-6 महीनों पर नाटक करना चाहता हूँ
टॉम अल्टर

सहगल पर नाटक लिखना सईद आलम के लिए चुनौती रही.

वह कहते हैं, "राजनीतिज्ञों और खिलाड़ियों के बारे में इतनी किताबें मिल जाती हैं लेकिन इस महान अभिनेता और गायक के बारे में कोई सामग्री नहीं मिलती. ले-देकर एक ही किताब है."

देहरादून के विरासत महोत्सव में इसकी प्रस्तुति हुई. ये मंचन इसलिए भी ख़ास था कि टॉम ऑल्टर पहली बार अपने शहर में ये नाटक पेश कर रहे थे.

चरित्र अभिनेता के रूप में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके और रंगमंच पर अलग तरह की भूमिकाओं के लिए जाने जाने वाले टॉम ऑल्टर कहते हैं, "मेरा अगला प्रोजेक्ट गांधी हैं. मैं गांधीजी के जीवन के अंतिम 5-6 महीनों पर नाटक करना चाहता हूँ."

उनका कहना है, "मैं गांधी नहीं बनना चाहता लेकिन कितनी मुश्किलों से आज़ादी मिली और गांधी उसे देखने केवल छह महीने के लिए ही जिंदा रहे. उस दौर की कशमकश को मंच पर लाना चाहता हूँ."

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