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सहगल की आवाज़ का जादू ही अलग है: दिनेश शर्मा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सहगल के गीत गाने वाले दिनेश शर्मा को भारत के बड़े हिस्से में जाना जाता है. वे जब सहगल के गाए हुए गीत-ग़ज़ल गाते हैं तो श्रोता झूम उठते हैं. बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि सहगल से उनका रिश्ता तो बहुत पुराना है. उन दिनों का जब चाबी भरकर चलाने वाले ग्रामोफ़ोन होते थे. वे बताते हैं, "मेरे पिताजी सहगल के गीत सुनते थे और मेरी ड्यूटी होती थी रिकॉर्ड बदलने की. तब कुछ समझ में तो आता नहीं था लेकिन एक रिश्ता बन गया था." जब वे स्कूल में थे तभी सहगल के गीत गाना शुरु कर दिया था लेकिन सार्वजनिक रुप से तब गाना शुरु किया जब कॉलेज में पहुँचे. 1972 के आसपास ही उन्होंने कॉलेज में चार अप्रैल को सहगल जन्मतिथि मनाने का सिलसिला शुरु किया जो आज तक जारी है. आवाज़ का जादू उन्होंने 'सहगल संगीत सरिता' नाम की एक संस्था बना रखी है जो नियमित संगीत समारोह आयोजित करती है, और लोगों के आमंत्रण पर जगह-जगह जाकर संगीत का कार्यक्रम करती है.
सहगल के नाम से चल रही दूसरी संस्थाओं से इस संस्था में ख़ास बात यह है कि यह सारे कार्यक्रम अपने ख़र्च पर ही आयोजित करती है और आर्थिक सहयोग को विनम्रतापूर्वक लौटा दिया जाता है. वे बताते हैं कि जब भी सहगल का नाम आता है तो पूरा माहौल संगीतमय हो जाता है. वे कहते हैं कि गाने वाले तो पहले भी बहुत थे और अब भी बहुत हैं लेकिन सहगल की आवाज़ का जादू ही अलग था. दिनेश शर्मा का कहना है, "उनकी आवाज़ में ऐसी कशिश थी कि अच्छे-अच्छे शास्त्रीय संगीत वाले भी ताज्जुब करते थे." वे कहते हैं, सहगल की गायकी में बनावटीपन बिलकुल नहीं था. यह लगता था कि बात करते-करते ही गाना शुरु कर दिया. दिनेश शर्मा का कहना है, "उनकी गायकी की छाप बाद तक बनी रही, कुछ ही लोग थे जो उसके असर से बच पाए." वे कहते हैं कि भारतीय संगीत तो नदी की धारा की तरह है जो हर वक्त बहती रहती है. सहगल की मृत्यु के 55-56 साल बाद भी उनके संगीत की धारा भी सतत प्रवाहमान है. |
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