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बुधवार, 09 जून, 2004 को 10:38 GMT तक के समाचार
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हाय! किस बुत की मुहब्बत में गिरफ़्तार हुए

कुंदन लाल सहगल
सहगल की पुण्यतिथि पर 1965 से महफ़िलों का आयोजन हो रहा है
एससी चतुर्वेदी कोई कलाकार नहीं हैं. वे सिर्फ़ सहगल के दीवानों में से एक हैं. बहुत से और दीवानों की तरह वे भी सहगल को याद करते हैं.

उन्हीं की ज़ुबानी जानिए किस तरह...

बातों बातों में एक सज्जन मुझसे पूछ बैठे कि मैं जब भी केएल सहगल का ज़िक्र करता हूँ तो उन्हें सहगल साहब क्यों कहता हूँ, जबकि लोग तो गायकों को उनके पहले नाम से ही पुकारते हैं, जैसे मुकेश, रफ़ी, मन्ना डे आदि.

मैं जवाब में सिर्फ़ इतना ही कह पाया कि घर के बुज़ुर्ग को कोई नाम लेकर नहीं पुकारता.

मैं नहीं जानता कि वे साहब संतुष्ट हुए या नहीं लेकिन यह सच है कि सहगल साहब मेरे परिवार के सदस्य हैं. वे कब मेरे परिवार में शामिल हुए यह मुझे भी नहीं पता.

बचपन में लक्ष्मण मूर्च्छा, मीरा के भजन और नारायण राव व्यास के पक्के गानों के बीच जो रिकॉर्ड सबसे ज़्यादा बजता था, वह था, 'तरपत बीते दिन रैन'. वो आवाज़ तभी से दिल में उतर गई थी हालांकि इस दर्द को समझने की उम्र बहुत बाद में हुई.

वक़्त के साथ बहुत सी नई पुरानी आवाज़ों के साथ दोस्ताना हुआ लेकिन सहगल साहब की आवाज़ कानों में गूँजती रही और ज़िंदगी का हिस्सा बन बैठी.

उस ज़माने में जब स्कूली जलसे होते थे तो उनमें फिल्मी गानों पर पाबंदी होती थी. बच्चे गाते तो केवल राग रागनियाँ या भजन. ऐसे में मुझे याद है कि एक स्कूल की छात्रा ने 'ग़म दिए मुस्तकिल...' गाकर ख़ूब वाह-वाही लूटी थी. यानी जहाँ दूसरों का प्रवेश वर्जित था वहाँ सहगल साहब की आमद पर कोई रोक नहीं थी.

सहगल के गीत समझने के लिए ही मैंने उर्दू सीखी और कॉलेज में पढ़ते हुए सुबह आठ बजे रेडियो सिलोन पर सहगल के गीत की आख़िरी लाइन सुनना और कॉलेज के लिए निकल पड़ना रोज़ का काम था.

नौकरी मिली और फिर शादी हो गई. संयोग से ही पत्नी हममिज़ाज मिलीं सो सहगल साहब की ज़िंदगी में उपस्थिति बरकरार रही.

महफ़िल की शुरुआत

1965 में ग्वालियर पहुँचा तो लगा जैसे घर पहुँच गया. हर ओर हवाओं में संगीत की लहर थी.

कुंदन लाल सहगल
घर पर ही एक महफ़िल सजा करती थी

कहीं शास्त्रीय संगीत, तो कहीं ग़ज़ल, भजन तो कहीं फ़िल्मी संगीत. बस वहीं से शुरु हुआ संगीत की महफ़िलों का सिलसिला.

फ़िल्म पत्रिका माधुरी के मुखपृष्ठ पर छपी तस्वीर को फ्रेम करवाकर 18 जनवरी, सहगल साहब की पुण्यतिथि पर घर पर ही एक महफ़िल सजने लगी.

ग्वालियर से रतलाम और फिर बिलासपुर में भी उसी तस्वीर के सामने गायक कलाकारों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किए.

शर्त यही थी कोई भी सहगल साहब की कोई चीज़ न गाए. डर था कि नकल कभी कानों को रास नहीं आएगी.

इस परंपरा को तोड़ा दिल्ली निवासी सहगल प्रेमी दिनेश शर्मा ने, जब रायपुर (अब छत्तीसगढ़ की राजधानी) में आकर उन्होंने सहगल साहब के गीत गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. नई पीढ़ी ने सहगल साहब को सुना तो उन्हें लगा कि अरे, सहगल साहब तो आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने कि वे पिताजी के ज़माने में थे.

सालों बाद चंद्रू आत्माजी ने फिर इतिहास दोहराया. हमारी सबसे क़ामयाब महफ़िल रही वो. सहगल की आवाज़ से रोमांचित गायक और श्रोताओं के बीच दूरी कब ख़त्म हो गई पता नहीं चला. सभी गा रहे थे, 'बंगला बने न्यारा' और 'बालम आए बसो मोरे मन में'.

1965 में शुरु हुआ महफ़िलों का सिलसिला 2002 तक अनवरत चलता रहा. इस बीच राजकुमारी, राजकुमार रिज़वी, मुबारक बेग़म, चंद्रू आत्मा, दिनेश शर्मा, चंदन दास, सुधा मल्होत्रा और मोहम्मद याक़ूब जैसी हस्तियों ने इस महफ़िल में शिरकत की.

बरसों तक तो महफ़िलों का खर्च मेरा परिवार ही उठाता रहा. फिर 'महफ़िल' को बाक़ायदा एक संस्था का रुप दिया, लेकिन उसका अनुभव कड़वा ही रहा.

उदासी और सूनापन

28 सालों बाद रायपुर से गुड़गाँव आना पड़ा.

18 जनवरी 2003 को पहली बार कोई महफ़िल नहीं सजी और मैं सहगल साहब के गानों के कैसेट सुनता रहा, आँखों में एक सूनापन लिए हुए.

लेकिन फिर मुझे मिले दिनेश शर्मा जी और इस तरह सहगल साहब की सोहबत मिल गई. सहगल साहब का गाना 'कहो ना आस निरास भई...' दोहराने को जी करता था.

सहगल साहब का आशीर्वाद ही था कि चार अप्रैल 2004 को दिनेश शर्मा जी की संस्था 'सहगल संगीत सरिता' के सहयोग से जम्मू कश्मीर सरकार ने सहगल साहब के घर पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया, और मुझे उस कार्यक्रम के संचालन का भार सौंपा गया.

वह मेरे लिए अविस्मरणीय था.

ठीक एक बुज़ुर्ग की तरह सहगल साहब मेरे सुख दुख के साथी रहे हैं और आज भी हैं.

मेरे दोस्त हँसते हैं और कहते हैं, 'हाय किस बुत की मुहब्बत में गिरफ़्तार हुए' और मैं जवाब देता हूँ, 'ये गिरफ़्तारी और उसकी सज़ा, उमरक़ैद बालज़्ज़त, सर आँखों पर'.

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