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उनके कंठ से मानवता गाती है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसे दक्षिण एशिया के महान लोकप्रिय गायक कुंदन लाल सहगल की नितांत अद्वितीय, 'न भूतो न भविष्यति' गायकी का चमत्कार माना जाए या उनके करोड़ों श्रोताओं का वफ़ादार रुचि वैविध्य कि उनके इस जन्म शताब्दी वर्ष में, जब उन्हें गुज़रे हुए 55 वर्ष से ज़्यादा हो चुके हैं, उन्हें इस शिद्दत से याद किया और सुना जा रहा है जैसे उनका बिछड़ना अभी कल की ही बात हो. उनकी पीढ़ी में पंकज मलिक, केसी डे, जगमोहन, पहाड़ी सान्याल, तिमिर बरन जैसे कई अन्य बड़े गायक हुए लेकिन सहगल के मुक़ाबले वे कम याद किए और गाए जाते हैं. बल्कि अपने जीवन काल में भी वे सहगल जैसी दक्षिण एशियाई स्वीकृति न पा सके. कोलकाता से प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी दैनिक 'द टेलीग्राफ़' में पिछले दिनों एक लेख छपा था जिसमें शोक-सा प्रकट किया गया था कि सहगल को अब बहुत कम लोग जानते हैं जबकि जम्मू में जन्मे इस टाइपराइटरों के सैल्समैन को सबसे पहले बंगाल में ही गायक और (उसी के कारण) अभिनेता के रुप में मौक़ा मिला था. लेकिन ऐसा है कहाँ? भारत और पाकिस्तान में सहगल पर लेख प्रकाशित हो रहे हैं, उनकी याद में संगीत समारोह हो रहे हैं, बीसीयों सहगल समितियाँ हैं, पुस्तकें छप रही हैं, फ़िल्में बन चुकी हैं, नाटक खेले जा रहे हैं. प्रेरणा उनके शहर जालंधर में उन पर संग्रहालय है और सबसे बड़ी बात तो यह है कि उनके गीत अब भी श्रीलंका रेडियो सहित दक्षिण एशियाई रेडियो स्टेशनों से सुनाए जा रहे हैं. वे आधुनिक सीडी-कैसेटों की दुकानों पर बिक रहे हैं और एक ऐसी युवा पीढ़ी उन्हें गुनगुनाए जा रही है जिसके माता पिता भी शायद सहगल की मृत्यु के बाद पैदा हुए होंगे. यह अपने यहाँ ही संभव है. सहगल के गीतों का ज़िंदा रहना इस बात की मिसाल है कि सच्ची कला को किसी गॉड फ़ादर या जनसंपर्क की ज़रुरत नहीं होती. लेकिन सहगल की वह कला है क्या? शायद उनकी माँ गाती थीं, शायद बालक कुंदनलाल ने अल्पज्ञात सूफ़ी पीर सलमान युसूफ़ को सुनकर प्रेरणा ली थी. उनकी एक भतीजी ने कानपुर की किसी अज्ञात तवायफ़ का नाम लिया है जिन्हें सहगल अपनी उस्ताद मानते थे. लेकिन सच यह है कि सहगल की गायकी स्वत:स्फुर्त थी और उनका स्वर प्रकृतिदत्त था. महान प्रतिभा वे पंकज मलिक, केसी डे या अपने के बाद के मोहम्मद रफ़ी की तरह पूरे और ऊँचे गले के गायक नहीं थे लेकिन वे खरज और मध्यम सुर तथा मूल रुप से ठुमरी और छोटे ख़याल की गायन शैली में लाजवाब थे.
उनके पहले रिकॉर्ड किए गए गीत 'झुलना-झुलाओ' में 'अंबवा की डारी पे' शब्दों में 'पे' को उन्होंने जिस तरह खरज में माधुर्य दिया है और इसी गीत में कोयल की कूक को जो लगभग वैसा ही स्वर दिया है वह इस बात की चेतावनी थी कि दक्षिण एशियाई लोकप्रिय गायकी में एक महान प्रतिभा आ चुकी है. कुछ गीतों में सहगल शब्दों का अति-उच्चारण करते हैं, पंक्ति के अंतिम शब्दों को कुछ दूर तक आलाप में ले जाते हैं. गलेबाज़ी के कमाल दिखाते हैं. अति माधुर्य लाने के लिए नासिका दोष से भी परहेज़ नहीं करते और इन सब वजहों से कभी-कभी उनकी पैरोडी भी की गई है. लेकिन 'इक बंगला बने न्यारा', 'सो जा राजकुमारी', 'राधेरानी दे डारो न', 'मैं क्या जानूँ क्या', 'बाबूल मोरा', 'करुँ क्या', 'ग़म दिए मुस्तकिल', 'दो नैना मतवारे तिहारे' जैसे गीत सिर्फ़ वे ही गा सकते थे. जिस तरह से बाद के संगीतकारों में लता मंगेशकर के लिए धुनें तैयार करने की होड़ लगी उसी तरह 1932-46 के बीच संगीतकार सहगल के गले के ज़रिए लोकप्रियता तलाशते थे. सहगल अपने जीवन काल में ही किंवदंती बन गए थे. उनके पक्षधर उन्हें लेकर आपके साथ हाथापाई कर सकते हैं. पहले सुपर स्टार वे बहुत सुंदर नहीं थे, बल्कि 40 की उम्र में ही गंजे हो गए थे, थोड़ी बहुत शराब भी पी लेते थे. अभिनेता कितने बड़े थे इस पर विवाद हो सकता है लेकिन वे बड़े गायक थे और इसी कारण अभिनेता बन पाए. 'चंडीदास', 'देवदास', 'प्रेसीडेंट', 'स्ट्रीट सिंगर', 'भक्त सूरदास', 'तानसेन', 'शाहजहाँ' सहित शायद तीन दर्जन फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया, जिनमें से ज़्यादातर के प्रिंट अब नहीं मिलते. लेकिन बांग्ला ( जिसमें रवींद्र संगीत गाकर उन्होंने गुरुदेव की प्रशंसा प्राप्त की थी), हिंदी, उर्दू, तमिल, पंजाबी, पश्त आदि भाषाओं में गाए उनके तीन से कुछ अधिक फ़िल्मी-ग़ैर फ़िल्मी गीतों ने उन्हें विश्व भर में वहाँ अविस्मरणीय बनाए हुए हैं, जहाँ दक्षिण एशियाई मूल के लोग बसते हैं. लेकिन सहगल, जो अपने युग के सुपर स्टार थे, अपनी लोकप्रियता से बददिमाग़ नहीं हुए थे. उन्होंने अपने परिवार, मित्रों और जनसाधारण से हमेशा प्यार किया. सबसे पहले वे एक मानव थे और यही मानवीयता उनके गीतों में प्रेम, विरह, वात्सल्य, चिंतन, शरारत, हास-परिहास बनकर दक्षिण एशियाई लोकप्रिय संस्कृति की अमर थाती बन गई है. |
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