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बुधवार, 10 अक्तूबर, 2007 को 13:02 GMT तक के समाचार
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दिलों पर राज करते हैं शहंशाह

अमिताभ
अमिताभ बच्चन भारत में ही नहीं विदेश में भी लोकप्रिय हैं
अमिताभ बच्चन के बारे में इतना लिखा गया है और इतना कुछ सुना गया है कि ऐसा लगता है वो हम में से एक हैं. मगर सच तो ये है कि अमिताभ हमारे जैसे होकर भी हम सबसे अलग हैं.

बच्चन जैसी किस्मत भगवान कम ही लोगों को देते हैं.अस्थमा के मरीज़, एक जानलेवा दुर्घटना (कुली के सेटी पर), एक गंभीर बीमारी (माइसथिनिया ग्रेविस) फिर हाल ही में एक और गंभीर बीमारी (कोलाइटिस)...फिर भी अमिताभ बच्चन रुकने का नाम नहीं लेते.

लोग तो यही दुआ करेंगे कि वो कभी न रुके क्योंकि बहुत कम नायक हैं जिनके नाम पर दर्शक सिनेमाघरों में आते हैं. अभी तो अमिताभ बच्चन चरित्र भूमिकाओं में आते हैं लेकिन जब वो मुख्य नायक थे तब सिर्फ़ वो ही एक हीरो थे जिनकी फ़िल्में उनके नाम पर बिकती थीं.

फ़िल्म नहीं, अमिताभ को देखते हैं लोग

लोग अमिताभ बच्चन की फ़िल्में उन्हें देखने के लिए जाते थे, इसलिए कई बार उनकी कमज़ोर फ़िल्में भी औसत धंधा कर लेती थी.

 बहुत कम नायक हैं जिनके नाम पर दर्शक सिनेमाघरों में आते हैं. अभी तो अमिताभ बच्चन चरित्र भूमिकाओं में आते हैं लेकिन जब वो मुख्य नायक थे तब सिर्फ़ वो ही एक हीरो थे जिनकी फ़िल्में उनके नाम पर बिकती थीं.कई बार उनकी कमज़ोर फ़िल्में भी औसत धंधा कर लेती थी

ज़ंजीर फ़िल्म थी जिससे अमिताभ बच्चन की ऐंग्री यंग मैन की छवि बन गई. उसके बाद अमिताभ बच्चन की बहुत सारी फ़िल्में आईं जिनमें उन्हें व्यवस्था से या फिर ग़लत काम करने वालों के ख़िलाफ़ लड़ते हुए दिखाया गया.

अगर ज़ंजीर से अमिताभ ने ग़ुस्से को एक नया चेहरा दिया तो मनमोहन देसाई की अमर अकबर एंथनी से उन्होंने कॉमेडी में अपनी निपुणता दिखाई.

चुपके-चुपके, बड़े मियाँ छोटे मियाँ, हेरा फेरी, सत्ते पे सत्ता और ऐसी बहुत सी फ़िल्में थीं जिनसे कॉमेडी फ़िल्में ख़ास अमिताभ के लिए लिखी जाने लगीं.

अपनी दूसरी पारी में भी अमिताभ ने कॉमेडी के रोल (चीनी कम, कभी अलविदा न कहना) उतनी ही सरलता से निभाएँ हैं जितने कि एक्शन के रोल (खाकी) या भावुक रोल (वक़्त- दे रेस एगेंस्ट टाइम, बाग़बान, एक रिश्ता- द बॉंड ऑफ़ लव).

शानदार वापसी

अमिताभ ने केबीसी के ज़रिए शानदार वापसी की

जब अमिताभ ने अभिनय की दुनिया कुछ समय के लिए त्याग दी थी तो उनके आलोचकों ने सोचा था कि वे दोबारा इस दुनिया में कभी नहीं आ पाएँगे.

इन आलोचकों का सोचना कुछ समय तक सही भी लगने लगा.उनकी पहली पारी की आख़िरी फ़िल्म ख़ुदा गवाह जिस तरह से फ़्लॉप हुई, उसी तरह उनकी दूसरी पारी की पहली फ़िल्म मृत्युदाता भी पिट गई.

जब अमिताभ ने मृत्युदाता और सूर्यवंशम जैसी कुछ फ़्लॉप फ़िल्मों के बाद ख़ुद को बिना काम के पाया तो वे ख़ुद यश चोपड़ा के पास गए और उनसे काम माँगा.

आदित्य चोपड़ा ने उनको मोहब्बतें में केंद्रिय भूमिका दी. और बस सुपरस्टार की दूसरी पारी ने ऐसा मोड़ लिया कि उन्हें दोबारा पीछे देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी.

बच्चन छोटे पर्दे पर भी वैसे ही चमके जैसे बड़े पर्दे पर. दरअसल जब अमिताभ टेलीवीज़न के लिए कौन बनेगा करोड़पति करने की सोच रहे थे तो उनके चाहनेवालों ने उन्हें ख़ूब रोका क्योंकि इन लोगों का सोचना था कि घर बैठे लोगों को छोटे पर्दे पर अगर अमिताभ बच्चन मुफ़्त में दिख जाएँगे तो वो पैसे ख़र्च करके उनकी फ़िल्में देखने क्यों आएँगे.

लेकिन अमिताभ ने इन लोगों के दिमाग़ की न सुनते हुए अपने दिल की सुनी और नतीजा सारी दुनिया ने देखा.

न सिर्फ़ टेलीवीज़न शो ने रॉकेट की तरह उड़ान भरी बल्कि फ़िल्मों पर भी शो का कोई बुरा असर नहीं पड़ा.

क्यों हैं सुपरस्टार?

मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और ऋषिकेश मुखर्जी अमिताभ बच्चन के करियर में ख़ास मायने रखते हैं. इन तीन निर्देशकों ने बच्चन को बहुत सारी हिट और सुपरहिट फ़िल्में दीं.

रमेश सिप्पी का नाम तो बच्चन के करियर में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा क्योंकि धर्मेंद्र और अमिताभ के साथ शोले रमेश सिप्पी ने ही बनाई थी.

अमिताभ बच्चन की शान के निर्देशक भी रमेश सिप्पी ही थे पर वो फ़िल्म पिट गई.

उनकी दूसरी पारी में आदित्य चोपड़ा और करण जौहर का योगदान भुलाया नहीं जा सकता. इसके अलावा संजय लीला भंसाली की ब्लैक से जो अमिताभ बच्चन को प्रशंसा मिली वो शायद कम फ़िल्मों में मिली थी क्योंकि ब्लैक में उनका काम और किरदार बिल्कुल अलग था.

अग्निपथ भले ही पैसे नहीं कमा पाई मगर उस फ़िल्म के लिए अमिताभ बच्चन को अपना पहला राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला.

अगर अमिताभ की यादगार और सुपरहिट फ़िल्मों का नाम लें तो ऊपर लिखी फ़िल्मों के अलावा अभिमान, आनंद, अंधा क़ानून, बॉम्बे टू गोआ, कुली, कभी-कभी, ख़ुद्दार, लावारिस, मर्द, मुक़दर का सिंकदर, नमक हलाल, नसीब, परवरिश, रोटी कपड़ा और मकान, शराबी, त्रिशूल और वीर ज़ारा जैसी फ़िल्में भी आएँगी.

उनकी बड़ी फ़्लॉप फ़िल्मों में बूम, निशब्द, राम गोपाल वर्मा की आग, शक्ति, अकेला और अजूबा शामिल हैं लेकिन लगभग सभी फ़िल्मों में बच्चन के काम की आलोचना नहीं हुई. उनके काम को ज़्यादातर पसंद ही किया गया-फिर फ़िल्म चाहे हिट हुई या फ़्लॉप.

ये एक और कारण है कि अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार का ख़िताब दिया गया है. सही में उनके जैसे कलाकार कम ही बनते हैं.

अमिताभ बच्चनसफ़रनामा...
अमिताभ बच्चन की दूसरी पारी का सफ़र
अमिताभ बच्चनतस्वीरों में सफ़र
अमिताभ बच्चन का सफ़र: 1969 से 1990 तक
ब्लैकअमिताभ बच्चन सर्वश्रेष्ठ
राष्ट्रीय पुरस्कार में अमिताभ सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और सारिका सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री.
अमिताभशहंशाह हैं सुपर भगवान
लेखिका जेसिका हाइंस ने अमिताभ बच्चन को सुपर भगवान की संज्ञा दी.
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ऐश्वर्या-अभिषेक ने रविवार को तिरुपति के वेंकटेश्वर मंदिर के दर्शन किए.
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