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सोमवार, 10 सितंबर, 2007 को 12:42 GMT तक के समाचार
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फ़िल्म-एक, निर्देशक-चार, मुद्दा-एड्स

मीरा नायर
मीरा नायर ‘सलाम बॉम्बे’, ‘मानसून वैडिंग’ और ‘नेम सेक’ जैसी फ़िल्में बना चुकी हैं
एड्स पर बनी फिल्में अक्सर गंभीर और उपदेशात्मक होती हैं, लेकिन मीरा नायर, विशाल भारद्वाज, संतोष सिवान और फ़रहान अख़्तर जैसे फ़िल्मकार इस विषय को कैमरे में क़ैद करें तो निस्संदेह परिणाम अलग ही होता है.

फ़िल्म ‘एड्स-जागो’ इस ख़तरनाक बीमारी के अलग-अलग पहलु्ओं को दर्शाती है, लेकिन दर्शकों का मनोरंजन करते हुए. दरअसल, ये फ़िल्म इन निर्देशकों की चार लघु फिल्मों का संग्रह है.

इस फ़िल्म को 32वें टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में नौ सितंबर को पहली बार प्रदर्शित किया गया.

छह सितंबर से 15 सितंबर तक चलने वाले इस महोत्सव में 55 देशों से 349 फ़ीचर फिल्में दिखाई जा रही है, जिनमें भारत से पांच फ़ीचर फ़िल्में और ‘एड्स-जागो’ शामिल है.

संकल्पना

हालाँकि हर निर्देशक ने स्वतंत्र रूप से अपना काम किया है, परंतु इस फ़िल्म की संकल्पना एवं निर्देशकों को साथ लाने का श्रेय मीरा नायर को जाता है.

 बिल और मेलिंडा गेट्स ने सीधे मुझसे पूछा कि तुम इस बारे में क्या कर सकती हो, तब एकदम से मुझे यह ख़्याल आया कि क्यों न 9/11 की तरह ही कुछ निर्देशक मिलकर काम करें
मीरा नायर, निर्देशक

ऐसे संग्रह की प्रेरणा उन्होंने अपने एक पूर्व अनुभव से ली, जिसमें 9/11 के हादसे पर 11 निर्देशकों ने मिलकर काम किया और सभी ने 11 मिनट की एक-एक लघु फ़िल्म बनाई.

संयोग की बात है कि इस फ़िल्म को भी कुछ साल पहले टोरंटो फ़िल्म महोत्सव में ही दिखाया गया था.

‘एड्स जागो’ की शुरुआत लगभग डेढ़ साल पहले हुई जब बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने मीरा को भारत में एड्स पीड़ितों की बढ़ती हुई संख्या से अवगत कराया.

मीरा कहती हैं, “उन्होंने सीधे मुझसे पूछा कि तुम इस बारे में क्या कर सकती हो, तब एकदम से मुझे यह ख़्याल आया कि क्यों न 9/11 की तरह ही कुछ निर्देशक मिलकर काम करें.”

फ़िल्म के माध्यम से लोगों तक पहुँचने के विचार के पीछे भी एक कारण था.

वे कहती हैं, “भारत में सिनेमा का महत्व मंदिर के समान है और अभिनेता, अभिनेत्री को जनता देवी- देवताओं का दर्ज़ा देती है. मैने ऐसे लोगों को संपर्क किया जिनके काम से मैं बहुत प्रभावित थी और जो अपने क्षेत्र में दिग्गज हैं. सौभाग्यवश ये सब तैयार भी हो गए.”

मनोरंजन पर ज़ोर

हालाँकि हर निर्देशक को अपनी फ़िल्म बनाने की पूर्ण स्वतंत्रता थी, लेकिन कुछ बातें शुरू में ही तय कर दी गई थी. मसलन फ़िल्म मनोरंजन से भरपूर होगी और इसमे नामी फ़िल्मी हस्तियाँ काम करेंगी.

 जब मीरा ने इसका जिक्र किया तो मै तुरंत राजी हो गया. हमने सोचा, अगर बीमारी और दवाइयों के बारे में बताएँगे तो कोई नही देखेगा इसलिए तय हुआ कि मस्त, चालू कहानियाँ सुनाएँगे और इसके जरिए जो भी कहना चाहेंगे वो कह सकेंगे
विशाल भारद्वाज, निर्देशक

‘सलाम बॉम्बे’, ‘मानसून वैडिंग’ और हाल ही में ‘नेम सेक’ जैसी फ़िल्में बनाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी मीरा कहती हैं, “हमें ऐसी फ़िल्में बनानी थीं जिन्हें लोग देखें, भागें नहीं. इसलिए यह भी ज़रूरी था कि हम बडे नामों वाले अभिनेता एवं अभिनेत्रियों को इसमें जोड़ें.”

इस फ़िल्म से जुड़े दो और निर्देशक विशाल भारद्वाज (जिनकी ‘मक़बूल’ तीन साल पहले टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में प्रदर्शित हुई थी) और संतोष सिवान भी टोरंटो आए हुए हैं.

भारद्वाज कहते हैं, “जब मीरा ने इसका जिक्र किया तो मै तुरंत राजी हो गया. हमने सोचा, अगर बीमारी और दवाइयों के बारे में बताएँगे तो कोई नही देखेगा इसलिए तय हुआ कि मस्त, चालू कहानियाँ सुनाएँगे और इसके जरिए जो भी कहना चाहेंगे वो कह सकेंगे.”

मीरा की फ़िल्म इस बात को दर्शाती है कि एचआईवी वाइरस कितना तांत्रिक है (न जात देखता है, न वर्ग). वहीं भारद्वाज की फ़िल्म दर्शाती है की एचआईवी वाइरस के साथ भी जिया जा सकता है.

संतोष सिवान की फिल्म का केंद्र है एड्स से जुडे कलंक का एक परिवार पर प्रभाव और फ़रहान अख़्तर की फ़िल्म दर्शाती है एड्स का पारिवारिक संबंधों पर असर.

हालाँकि खचाखच भरे सिनेमा हॉल में काफ़ी लोग मीरा नायर का नाम सुनकर आए थे, पर सभी फ़िल्मों को काफ़ी सराहना मिली.

मुश्किलें

 भारत के कई सिनेमा विक्रेता इस बात पर राज़ी हैं कि फ़िल्म की ढ़ाई मिनट की झलकी एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस पर दूरदर्शन पर प्रसारित की जाए
मीरा नायर, निर्देशक

चर्चा सत्र में मीरा नायर ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि हिंदी सिनेमा के कुछ प्रसिद्ध सितारों ने पहले फ़िल्म में काम करने की इच्छा ज़ाहिर की और फिर मुकर गए.

पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बहुत से लोगों से उन्हें मदद भी मिली. बाकी निर्देशकों का कहना था कि उन्हे अभिनेताओं से काफ़ी मदद मिली.

इन फिल्मों में शबाना आज़मी, बोमान इरानी, पंकज कपूर, शाइनी आहूजा, समीरा रेड्डी, सिद्धार्थ और दक्षिण भारत के स्टार प्रभु देवा, सरोजा देवी और रम्या आदि ने काम किया है.

अब सवाल यह है कि इन फ़िल्मों को आम जनता तक कैसे पहुँचाया जाए? मीरा कहती है, “भारत के कई सिनेमा विक्रेता इस बात पर राज़ी हैं कि फ़िल्म की ढ़ाई मिनट की झलकी एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस पर दूरदर्शन पर प्रसारित की जाए. साथ ही चर्चा सत्र आयोजित करने के प्रयास भी होने चाहिए.

फ़िल्म की अवधि मात्र 80 मिनट की होने के कारण अभी यह तय नहीं हुआ है कि इसे फ़ीचर फ़िल्म की तरह रिलीज़ किया जाएगा या नहीं.

लेकिन मीरा कहती है कि एक संभावना यह भी है कि कुछ थिएटरों में एक हफ़्ते के लिए इसे दिखाया जाए. भविष्य में इन निर्देशकों की नई फ़िल्मों के डीवीडी में उनकी ये लघु फ़िल्म शामिल होगी.

द नेमसेक में तब्बू और इरफ़ानद नेमसेक
मीरा नायर की नई फ़िल्म 'द नेमसेक' प्रवासियों के उलझन को दिखाती है.
शबाना आज़मी'औरत मेरी पहचान'
शबाना आज़मी का कहना है कि औरत और हिंदुस्तानी होना उनकी पहचान है.
एक और करगिल फ़िल्म
फ़रहान अख़्तर की 'लक्ष्य' में करगिल संघर्ष का चित्रण अलग ढंग से हुआ है.
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