|
बॉलीवुड में बढ़ रहा है महिलाओं का वर्चस्व | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बॉलीवुड में जिस तेज़ी से अभिनय के अलावा बाकी क्षेत्रों में भी महिलाओं का वर्चस्व और दखल बढ़ रहा है उसे देखकर लगता है कि जल्द ही महिलाएं फ़िल्म इंडस्ट्री पर प्रभावी रूप से अपने पैर जमा लेंगीं. पिछली रिलीज़ कई फ़िल्मों पर गौर किया जाए तो उसका निर्देशन और कहानी महिलाओं ने ही किया है जिसमें मीरा नायर, दीपा मेहता, कल्पना लाज़मी, अपर्णा सेन, फराह खान, तनुजा चंद्रा, मेघना गुलज़ार, शिबानी भटीजा जैसे नाम मुख्य हैं. महिला लेखकों की इस नई खेप ने इंडस्ट्री में एक नई बहार ज़रूर ला दी है. ‘कभी अलविदा न कहना’, ‘वो लम्हें’, ‘फ़ना’, ‘वाटर’, ‘मैं हूं ना’, ‘मिस्टर एण्ड मिसेस अय्यर’, ‘चिंगारी’, दमन, ‘ज़िंदगी रॉक्स’ जैसी तमाम फ़िल्मों की कहानीकार या निर्देशिका महिलाएं ही है. हाँ, लेकिन समय समय पर महिला लेखकों और निर्देशकों पर ये इल्ज़ाम ज़रूर लगते आए हैं कि अपने हाथ में कलम और दिशा मिलने पर वे उसे महिलाओं के इर्द-गिर्द ही घुमाने की कोशिश करती हैं. फ़िल्म ‘वो लम्हे’ की कहानीकार शगुफ़्ता रफ़ीक़ कहती हैं, “आज महिला लेखकों को फ़िल्म लिखने का मौका मिल रहा है, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है. इंडस्ट्री की ज़्यादातर महिलाएं, महिलाओं के ही इर्द-गिर्द अपनी कहानियां बुनती हैं जिसकी वजह से आजतक उन्हें ज़्यादा कामयाबी नहीं मिल पाई है. लेकिन आजकल महिलाओं ने दर्शकों को भांप लिया है और महिला केंद्रित कहानियां लिखने के बजाय बराबर की कहानियां लिखने लगी हैं और यही उनकी सफलता का राज़ भी है.” इंडस्ट्री की ही कई महिलाओं का यह भी मानना है कि पुरूष प्रधान देश में महिलाओं को काफ़ी दिक्कत होती है. जल्दी महिलाओं को कोई मौका नहीं देता है लेकिन फिर भी महिलाएँ धीरे-धीरे फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रही हैं. अहमियत लेकिन ‘हम तुम’ और ‘फ़ना’ जैसी सफल फ़िल्मों के निर्देशक कुणाल कोहली इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि इंडस्ट्री में महिलाओं को अहमियत नहीं दी जाती है. वे कहते हैं, “मेरी फ़िल्म फ़ना की कहानीकार शिबानी भटीजा भी एक महिला हैं. मैंने तो कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि काम करने वाला आदमी है या औरत, बस काम अच्छा होना चाहिए”.
वो आगे कहते हैं, “आज हर क्षेत्र में महिलाएं हैं और अपनी क्षमता को साबित भी कर चुकी हैं फिर चाहे वह कैमरामैंन का काम हो, साउंड रिकॉर्डिस्ट का काम हो या कुछ और.” कुछ हद तक कुणाल की बातों से सहमत नज़र आती टेलीविज़न में लेखकों की दुनिया की रानी मानी जाने वाली विंता नंदा कहती हैं, “पहले काम करने वाले ज़्यादातर पुरूष थे और इसलिए महिलाओं को आगे आने में थोड़ा समय ज़रूर लगा लेकिन आज महिलाएं भी किसी से कम नहीं हैं”. वो कहती हैं, “मैं कभी यह सोचकर काम करने नहीं जाती कि मैं एक महिला हूं बल्कि एक सामान्य तरीके से अपना काम करती हूं और सफलता भी मिलती है.” कई लोगों का कहना है कि महिलाएं अपने झिझक और पहले आगे न आने की वजह से कुछ नहीं कर पाती हैं. जैसा कि लेखिका-निर्देशिका तनुजा चंद्रा कहती हैं, “मैं तो मानती हूं कि आधा इल्ज़ाम तो महिलाओं पर ही है कि वो ख़ुद आगे नहीं आती हैं. अब धीरे-धीरे महिलाओं में झिझक निकल रही है और वो आगे आने की कोशिश भी कर रही हैं जो बहुत अच्छी बात है”. जानी-मानी निर्देशिका कल्पना लाज़मी कहती हैं, “आज के बीस साल पहले इंडस्ट्री में इतनी महिलाएं नहीं थी. अब महिलाएं भी मानती हैं कि काबिलियत को महिला और पुरुष के आधार पर नहीं बांटना चाहिए. पुरानी कहानी और निर्देशन कहीं नहीं चलते हैं फिर चाहे वह पुरूष हों या महिलाएं.” तनुजा की बात से सहमति जताते हुए वो कहती हैं, “टेलीविज़न के हर विभाग में आपको ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं ही नज़र आएंगी जिसके मुकाबले फ़िल्मों में महिलाओं बहुत कम है.” बहरहाल गौर करने वाली बात ये है कि आज ज़्यादातर महिलाएं न ही महिला केंद्रित फ़िल्में बनाने में ज़्यादा दिलचस्पी ले रहीं हैं और न ही अपने को महिला-पुरुष जैसे दायरों में बांधकर काम करती नज़र आ रही हैं. बल्कि कहानी और निर्देशन को ज़्यादा से ज़्यादा दिलचस्प बनाने के लिए कमर कस ली है और फ़िल्म इंडस्ट्री में खुद को साबित करना भी शुरू कर दिया है. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||