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प्रवासियों की त्रासदी बयां करती फ़िल्म | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका में भारतीय फ़िल्मों के शौकीन लोगों को न्यूयॉर्क में मीरा नायर की फ़िल्म 'द नेमसेक' रिलीज़ होने से कई महीने पहले ही देखने को मिल गई. वैसे यह फ़िल्म अगले साल मार्च में रिलीज़ होने वाली है लेकिन बुधवार को भारतीय मूल के फ़िल्मकारों के महोत्सव के पहले दिन यह फ़िल्म खासतौर पर दिखाई गई. मीरा नायर की यह फ़िल्म भारतीय मूल की ही अमरीकी लेखिका झुम्पा लहिड़ी के बहुचर्चित उपन्यास - 'द नेमसेक' पर आधारित है. पुलित्ज़र पुरस्कार प्राप्त लहिड़ी के उपन्यास में कई दशकों में फैली कहानी को दो घंटों में समेटने का काम मीरा नायर ने बखूबी अंजाम दिया है. पूरी फ़िल्म में कहीं बोरियत होती महसूस नहीं हुई. यह एक बंगाली परिवार की कहानी है. 1970 के दशक में एक दंपत्ति अशोक और अशिमा शादी के बाद कोलकता से न्यूयॉर्क आकर बस जाते हैं. फिर इस परिवार को अजनबी मुल्क में अजनबी संसकृति का सामना करना पड़ता है. नए मुल्क, नए तौर तरीक़े, फिर अपनी संस्कृति औऱ संस्कार का भी ख्याल रखना इस सबके साथ वह अपनी ज़िंदगी गुज़ारते हैं. अशोक और अशिमा के दो बच्चे किस तरह अमरीकी रंग में रंगते हैं, इस सबका चित्रण बहुत ही दिल्चस्प अंदाज़ में किया गया है. ख़ासकर अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को तो उनकी ज़िंदगी से मिलती जुलती कहानी के कारण बहुत ही मज़ा आ रहा था. बार बार कुछ हास्यासपद दृश्यों पर दर्शक ज़ोर के ठहाके लगाते थे. फ़िल्म का ताना बाना कुछ ऐसा है कि लोग पूरे समय बँधे रहे. उपन्यास की ही तरह ज़्यादातर इस फ़िल्म की कहानी भी दिल को छूने वाली है. कई बार दर्शकों की आंखें भी भर आती हैं. मीरा नायर को भारत में भी इस फ़िल्म के अच्छे प्रदर्शन की आशा है. इस फ़िल्म को वयस्कों की फ़िल्म का दर्जा दिया गया है. इन दृश्यों के बारे में मीरा नायर कहती हैं, “इस फ़िल्म में बॉलीवुड कि बहुत सी फ़िल्मों से कम ही अश्लीलता है. इस फ़िल्म को भारत में भी पूरा परिवार एक साथ बैठ कर देख सकता है. मैने ख़ासकर कुछ ऐसे सीन डाले हैं जिससे आम भारतीय परिवार उन मुद्दों पर खुलकर बातचीत करना शुरू करें.” नाम का विवाद यह फ़िल्म अंग्रेज़ी और बांग्ला भाषा में बनाई गई है. इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है तब्बू और इरफ़ान ख़ान जैसे बॉलीवुड के बड़े कलाकारों ने. और इसके अलावा भारतीय मूल के अमरीकी कलाकारों में काल पेन ने भी मुख्य भूमिका निभाई है. फ़िल्म में तब्बू के बेहतरीन अभिनय की प्रशंसा करते हुए मीरा नायर कहती हैं, “तब्बू तो भारत की मेरिल स्ट्रीप हैं. वह आसानी से किरदार में समा जाती हैं. अशिमा के किरदार को उन्होने बेहतरीन अंदाज़ में निभाया है. ” 'द नेमसेक' नाम की इस फ़िल्म में नाम को लेकर भी काफी विवाद होता है. बच्चे के जन्म के समय अमरीकी कानून का पालन करते हुए अशोक और अशिमा जल्दी में अपने शिशु का नाम गोगोल रख देते हैं. और इस इतमिनान में रहते हैं कि बाद में नाम बदल देंगे. लेकिन वह नाम तो जैसे बच्चे की ज़िंदगी के साथ जुड़ ही जाता है. गोगोल का किरदार भारतीय मूल के अमरीकी और उभरते हुए सितारे काल पेन ने बखूबी निभाया है. काल पेन की असल ज़िंदगी की भी इस फ़िल्म के विषय से मिलती जुलती कहानी है. उनके नाम को लेकर भी इसी तरह की कहानी है. काल पेन का असली नाम कलपेन मोदी है, जिसे उन्होंने अमरीकी सांचे में ढाल कर काल पेन कर दिया है.
काल पेन कहते हैं, “मेरी ज़िंदगी में भी गोगोल के जीवन की ही तरह कुछ हद तक उतार चढ़ाव आए. मै भी अमरीका में जन्मा हूं औऱ भारतीय औऱ अमरीकी संस्कृति का टकराव मैने भी महसूस किया है.” यूँ तो यह फ़िल्म न्यूयॉर्क के जीवन पर ज़्यादा आधारित है लेकिन इसमें मीरा नायर ने बार बार भारत के भी सीन पिरोए हैं. खासकर पशचिम बंगाल में कलकत्ता के बहुत से दृश्य हैं जिसमें इस बंगाली परिवार के लोगों को अलग-अलग तरह से दर्शाया गया है कहीं बंगाली रीति रिवाज से किया जाने वाला विवाह दिखाया गया है तो कभी गंगा के तट पर मृतकों के लिए पूजा-पाठ. असल ज़िंदगी भी करीब ढाई घंटे लंबी इस फ़िल्म के बाद काल पेन औऱ मीरा नायर ने फ़िल्म के बारे में चर्चा भी की. मीरा नायर ने बताया कि किस तरह उन्हें अजीबो-ग़रीब अंदाज़ में इस फ़िल्म को बनाने का ख़याल आया. जब से मीरा नायर ने जुंपा लहिड़ी का उपन्यास पढ़ा था वह उनके दिमाग पर सवार था.
पर इस फ़िल्म के बारे में उस वक्त सोचा जब वह खुद एक दुखद दौर से गुज़र रही थीं. मीरा नायर कहती हैं, “मेरी ज़िंदगी भी अमरीका और भारत के बीच बंटी हुई है. मेरे परिवार में एक हादसा हुआ कि मेरी सास अफ्रीका से इलाज कराने अमरीका आई थीं औऱ यहीं गलत इलाज के कारण उनकी म़त्यु हो गई थी. उन्हीं दुखद लमहों में मैने सोचा कि जुंपा लहीरी की नावेल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है क्यूं न इसी पर एक फ़िल्म बनाई जाए.” बस फिर क्या था. झटपट उस नावेल के अधिकार लेने की कार्यवाही शुरू की गई. नितिन साहनी ने फ़िल्म में संगीत दिया है जिसमे पश्चिम और पूरब का अच्छा मिश्रण हुआ है. फ़ॉक्स कम्पनी के बैनर तले बनी इस फ़िल्म की पटकथा 'सलाम बाम्बे' की पटकथा लिखने वाली सूनी तारापोरवाला ने लिखी है. कैनेडा में टोरोंटो फ़िल्म महोत्सव में 'द नेमसेक' को पुरस्कृत भी किया जा चुका है. मीरा नायर ने अब तक 17 फ़िल्मों का निर्देशन किया है जिनमें 'सलाम बॉम्बे' और 'मॉनसून वेडिंग' जैसी चर्चित फ़िल्में शामिल हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें न्यूयॉर्क में देसी फ़िल्म महोत्सव13 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका डेथ ऑफ़ अ प्रेज़ीडेंट और बैला पुरस्कृत17 सितंबर, 2006 | पत्रिका टोरंटो फ़िल्म समारोह में काबुल एक्सप्रेस28 जुलाई, 2006 | पत्रिका आठवाँ एशियाई फ़िल्म समारोह शुरू14 जुलाई, 2006 | पत्रिका मीरा की वैनिटी फ़ेयर फ़िल्म रिलीज़01 सितंबर, 2004 | पत्रिका हॉलीवुड और बॉलीवुड का अनूठा मिलन10 जुलाई, 2004 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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