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गुरुवार, 30 अगस्त, 2007 को 14:05 GMT तक के समाचार
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एक अरब से भाग देना मत भूलिए

बाज़ार की यह चमक इंडिया में है, भारत मे नहीं
इंडिया में हो रहे आर्थिक विकास की तेज़ी को लेकर किसी को संशय नहीं है, वर्ल्ड बैंक से लेकर अमरीकी राष्ट्रपति तक सभी अभिभूत हैं.

लगभग हर रोज़ मैरिल लिंच, स्टैंडर्ड एंड पुअर या प्राइसवाटर हाउसकूपर जैसी कोई प्रतिष्ठित संस्था बताती है कि जल्दी ही इंग्लैंड और जापान जैसे देश पीछे रह जाएँगे.

भारत की बात वर्ष में एक बार होती है जब संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट आती है, पिछले वर्ष की रिपोर्ट ने बताया कि दुनिया की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और शौचालय की उपलब्धता वगैरह के मामले में 126वें नंबर पर है, स्लोवेनिया और टोंगा से जैसे देशों से काफ़ी पीछे.

मॉल, मल्टीप्लेक्स, मोबाइल फ़ोन के बीच आरामदेह जीवन गुज़ार रहा इंडिया अक्सर यह भ्रम पाल लेता है कि उसका देश सचमुच दुनिया के विकसित देशों की श्रेणी आ गया है, या बस अब आने ही वाला है.

मगर सच यही है कि भारत आज भी इंडिया से बहुत बड़ा है. मीडिया, सरकार, शहरी मध्य वर्ग सभी जाने-अनजाने इंडिया की चादर को भारत के ऊपर तान देना चाहते हैं, लेकिन उस चादर में 70 करोड़ ग़रीब, अशिक्षित, बीमार, बेरोज़गार लोग नहीं लपेटे जा सकते.

भारत क्रय क्षमता के मामले में दुनिया की पाँचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, जब यह ख़बर आई तो कई समाचारपत्रों ने इसे इस तरह प्रकाशित किया जैसे भारत दुनिया का पाँचवा सबसे समृद्ध देश बन गया हो.

ऐसे करोड़ों लोगों को किस खाते में रखा जाता है?

यह कहना मुश्किल है कि इसमें ख़बर को समझने की भूल कितनी थी और 'राइजिंग इंडिया' का नया जोश कितना था, जोश जो कई ठोस सचाइयों और कई भ्रमों पर बराबर-बराबर टिका है.

एकबारगी लगने लगा है कि अर्थव्यवस्था ही जीती-जागती चीज़ है और लोग आँकड़ों में तब्दील हो गए हैं.

देश की एक अरब से अधिक की आबादी का लगभग तीस प्रतिशत हिस्सा एक सक्षम उपभोक्ता वर्ग है जो अमरीका की कुल आबादी के बराबर है. लेकिन बाक़ी के सत्तर प्रतिशत लोगों कब गिना जाता है और किस खाते में रखा जाता है?

देश का सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है यह तो रोज़ बताया जाता है लेकिन हम कैसे भूल सकते हैं उसे एक अरब से विभाजित करने पर ही प्रति व्यक्ति आय निकलती है जो लगभग 700 डॉलर सालाना यानी तीस हज़ार रुपए है. इसमें अंबानी, टाटा, बिड़ला, प्रेमजी जैसे अरबपतियों की कमाई भी शामिल है.

किसी देश के विकास का सही पैमाना क्या है, उसमें कितने अरबपति हैं या फिर वहाँ कितने लोगों को पीने का साफ़ पानी मिलता है?

संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक में पिछले पाँच वर्षों से दुनिया का पहले नंबर का देश है नॉर्वे जहाँ सिर्फ़ चार अरबपति हैं जबकि 126वें नंबर के देश भारत में 23 अरबपति हैं.

अब तय करना है कि अमरीका के कुल अरबपतियों की संख्या (313) का मुक़ाबला करना है या नॉर्वे का, जहाँ सबको शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पक्की गारंटी है.

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