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गुरुवार, 23 अगस्त, 2007 को 22:07 GMT तक के समाचार
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ऐसे मत चक इंडिया!

चक दे इंडिया
‘चक दे इंडिया’ को भारत में हॉकी की स्थिति पर बनी फ़िल्म के रुप में प्रचारित किया जा रहा है.

ज़्यादातर मीडिया ने भी इसे इसी तरह से देखा और समझा है.

लेकिन क्या यह फ़िल्म सिर्फ़ कबीर ख़ान नाम के एक हॉकी खिलाड़ी की विफलता और सफलता की कहानी है? क्या यह खेल की राजनीति का मामला है या फिर क्रिकेट की तुलना में हॉकी के पिछड़ जाने का क़िस्सा भर है?

शायद नहीं क्योंकि इस फ़िल्म की कहानी में हॉकी की स्थिति से ज़्यादा मर्मांतक संदेश भी है और वह इस देश में मुसलमानों की स्थिति को लेकर है जहाँ उसे बार-बार अपने देश के लिए प्रतिबद्धता को न केवल कथनी में बल्कि करनी में साबित करने की चुनौती का सामना करना पड़ता है.

निष्ठा का सुबूत

एक खिलाड़ी का मुसलमान हो जाने भर से उसकी व्यक्तिगत विफलता को उसकी निष्ठा से जोड़कर देखा जाता है और इस तोहमत को धोने के लिए उसे बार-बार अपने आपको साबित करना पड़ता है.

‘चक दे इंडिया’ भले ही खेल के रोमांच और निराशाओं को उभारती है लेकिन एक मुसलमान खिलाड़ी के घर की दीवार पर सहजता से ‘ग़द्दार’ लिखने वाली भारतीय मानसिकता की पीड़ा को भी फ़िल्म बख़ूबी उकेरती चलती है.

 प्रतीक के तौर पर कभी फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को तो कभी एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाकर कब तक काम चलेगा? कब तक राजनीतिक पार्टियाँ हामिद अंसारी को उपराष्ट्रपति बनाकर अपने आपको मुसलमानों का हितचिंतक साबित करती रहेंगी?

जब यह फ़िल्म इस पीड़ा को प्रदर्शित कर रही है, भारत अपनी आज़ादी के साठ साल का जश्न मना रहा है.

और यह महज़ संयोग नहीं है कि फ़िल्म के बाहर भी मुसलमानों को इसी आज़ाद भारत में बार-बार अपनी निष्ठा और प्रतिबद्धता को साबित करना पड़ता है और साबित करने के पहले तक संदेहास्पद बने रहने पर मजबूर होना पड़ता है.

इसी आज़ाद भारत के आज़ादी के जश्न की पूर्व संध्या पर राजधानी दिल्ली में इस समय के एक महत्वपूर्ण शायर के साथ जो कुछ घटा वह भी ‘चक दे इंडिया’ की मर्मांतकता को रेखांकित करता है.

चौहद अगस्त की शाम दिल्ली के तुर्कमान गेट स्थिति एक होटल का कमरा शायर राहत इंदौरी को इसलिए खाली करने को कहा गया क्योंकि दिल्ली की पुलिस को लगता था कि इससे सुरक्षा व्यवस्था को ख़तरा हो सकता है.

राहत इंदौरी तो पहले एक अमन पसंद और नियम-क़ायदा मानने वाले भारतीय नागरिक की तरह कमरा खाली करने पर राज़ी भी हो गए थे. सामान लेकर बाहर निकल ही पड़े थे कि सहसा उनके मन में संदेह उपजा कि क्या उन्हें तब भी होटल खाली करने को कहा जाता यदि वे तुर्कमान गेट के पास एक साधारण होटल में न ठहरकर संसद या इंडिया गेट के पास किसी पाँच सितारा होटल में ठहरे होते?

उन्होंने दिल्ली पुलिस के उस हवलदार से जब पूछा कि क्या उन्हें होटल के कमरे से सिर्फ़ इसलिए निकल जाने को कहा जा रहा है कि यह मुसलमानों के इलाक़े का एक होटल है और उनका नाम ‘राहत इंदौरी’ है, तो ज़ाहिर तौर पर उस हवलदार के पास कोई जवाब नहीं था, सिवाय इसके कि ऐसा 'वॉल्ड सिटी' के सभी होटलों में किया जा रहा है. यानी दिल्ली के उसी इलाक़े में जहाँ मुसलमानों की आबादी ज़्यादा है.

उस रात अगर राहत इंदौरी के साथ कुछ पत्रकार मित्र न होते तो पता नहीं वे अपने आपको इस देश का भला नागरिक किस तरह साबित कर पाते? पता नहीं साबित कर पाते भी या नहीं?

दरअसल सवाल चाहे कबीर ख़ान के बहाने से ‘चक दे इंडिया’ में उठे या फिर राहत इंदौरी के बहाने से तुर्कमान गेट के एक साधारण से होटल में हुए हादसे से उठे लेकिन यह अपने आपमें एक बड़ा सवाल है कि कब तक इस देश में मुसलमानों को अपनी निष्ठा साबित करनी होगी?

प्रतीक के तौर पर कभी फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को तो कभी एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाकर कब तक काम चलेगा? कब तक राजनीतिक पार्टियाँ हामिद अंसारी को उपराष्ट्रपति बनाकर अपने आपको मुसलमानों का हितचिंतक साबित करती रहेंगी?

आज़ादी के साठ साल बाद यदि मुसलमानों को लेकर भारतीय समाज सहज नहीं हो सका है और उसे बार-बार संदेह होता है कि उसकी निष्ठा किसी पड़ोसी देश के प्रति है तो ऐसी आज़ादी की एक बार पड़ताल होनी चाहिए.

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