BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 03 अगस्त, 2007 को 09:06 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
लोगों तक संदेश पहुँचाना भी ज़रुरी

संजय दत्त
फ़िल्म अभिनेता संजय दत्त अब यरवदा के जेल में हैं.

मुन्नाभाई के किरदार में गाँधीगिरी की वकालत करने वाले संजय दत्त, आज उसी आबो-हवा में सांस ले रहे हैं जहाँ साबरमती के संत बिन ढाल-बिन तलवार विदेशी शासन से मुक्ति के रास्ते तलाश रहे थे.

गाँधीजी ने यरवदा जेल में जाने से पहले और वहाँ जाने के बाद कभी इसकी शिकायत नहीं की. लेकिन गाँधीगिरी बताने वाले अभिनेता जेल जाने से पहले और वहाँ पहुँचने के बाद ज़ार-ज़ार रो रहे हैं.

महात्मा गाँधी ने कोई व्यक्तिगत अपराध नहीं किया था. वे अपने देश के लिए और अपने देश के लोगों के लिए अंग्रेज़ शासन के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे. यानी वे लोगों के लिए जेल गए थे और ख़ुशी-ख़ुशी गए थे.

गाँधीगिरी करने वाले संजय दत्त अवैध रूप से हथियार रखने के अपराध में जेल भेजे गए हैं.

और हां, संजय दत्त ज़बरदस्ती जेल भेजे गए हैं.

वे मानते हैं कि उनसे ग़लती हुई लेकिन चाहते हैं कि अब उन्हें माफ़ कर दिया जाए या सज़ा कम कर दी जाए क्योंकि वे 16 महीने जेल में रह चुके हैं.

अख़बार और टेलीविज़न संजय दत्त की दिनचर्या प्रकाशित कर रहे हैं.

सिनेमा जगत आँसू बहा रहा है और सहानुभूति की बाढ़ आई हुई है. तर्क दिए जा रहे हैं कि संजय दत्त अपने किए की सज़ा भुगत चुके हैं, उनके अपराध की तुलना में सज़ा ज़्यादा है, वे आतंकवादी नहीं हैं आदि-आदि.

इसी सहानुभूति की बाढ़ में केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुँशी भी बह गए. उन्होंने कहा कि अदालत के फ़ैसले से उन्हें आघात पहुँचा है और संजय दत्त को सुप्रीम कोर्ट से राहत दिलवाने के प्रयास किए जाएँगे.

देश का क़ानून कहता है कि अपराधी को सज़ा मिलनी चाहिए. अदालत ने क़ानून के अनुसार सज़ा सुना दी है.

कहते हैं कि क़ानून अँधा होता है. ऐसा इसलिए कहा जाता है कि वह अपराधी को नहीं देखता, उसके व्यक्तित्व और रुआब से प्रभावित नहीं होता और साक्ष्यों के आधार पर तय सज़ा देता है. क़ानून व्यक्ति की जगह व्यापक जनहित को पहचानता है.

लेकिन संजय दत्त के मामले में सबकुछ दरकिनार कर देने की अपील की जा रही है.

संजय दत्त ने दर्जनों और फ़िल्मों की तरह गाँधीगिरी वाली एक फ़िल्म में काम किया. वह उनका पेशा है, रोज़ी है. याद नहीं आता कि उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में व्यापक सार्वजनिक हित का कोई काम किया है.

तर्क दिए जा रहे हैं कि वे बहुत अच्छे इंसान हैं. रहम दिल हैं और मिलनसार हैं. ये बातें अदालत के संज्ञान में भी लाई ही गई होंगी.

किसी की लोकप्रियता, उसका राजनीतिक रसूख और व्यक्तिगत जीवन में उसका भलापन उसके अपराध को ढाँक नहीं सकता और न इन गुणों के आधार पर उसे क्षमा किया जा सकता है.

जेसिका लाल
धारणा है कि मीडिया और आमजन के दबाव में जेसिका लाल का मामला दोबारा खुला

ऐसे समय में जब जेसिका लाल से लेकर प्रियदर्शिनी मट्टू और संजीव नंदा से लेकर अलेस्टर परेरा तक के मामलों से साफ़ हो चुका है कि पैसे और पहुँच वाले लोग किस तरह अदालत की कार्रवाई को प्रभावित करते हैं, तब इस तबके के लोगों को सज़ा सुनाया जाना एक तरह से आम जनता को विश्वास दिलाता है कि देश में व्यवस्था क़ायम है.

संजय दत्त के पास प्राकृतिक न्याय के रास्ते अभी बंद नहीं हुए हैं और सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का रास्ता भी बचा हुआ है. वे वहाँ जाकर रहम की एक अपील और कर सकते हैं.

लेकिन जो माहौल बन रहा है वह एक तरह से भयावह है. भारत का अभिजात्य वर्ग एकाएक संवेदनशील हो गया है. उसके भीतर मानवीयता जाग गई है. और आम भारतीय स्वभाववश चुपचाप इसे देख रहा है.

अभी सलमान ख़ान पर लापरवाही से गाड़ी चलाने और काले हिरण के शिकार के मामले चल रहे हैं. सैफ़ अली ख़ान पर भी अवैध शिकार का मामला है. फ़रदीन ख़ान नशीली दवाएँ रखने के मामले में फँसे हुए हैं.

इन मामलों में भी फ़ैसले आएँगे. हो सकता है कि इन कलाकारों की भी लोकप्रियता और उनकी भलमनसाहत की दुहाई देकर रहम की अपील की जाए.

लेकिन क्या अदालत इन अपीलों का संज्ञान ले सकती है...क़ानूनन शायद नहीं. लेकिन अगर अदालतें कथित जनभावनाओं के दबाव में आ भी गईं तो उसे कौन रोक सकता है?

पैरिस हिल्टन
पैरिस हिल्टन ने भी सज़ा से बचने के लिए कई बहाने बनाए थे

अमरीका में फ़ुटबॉल खिलाड़ी ओजे सिंपसन के मामले को इसी तरह से मीडिया ने तूल दिया था और कहा गया था कि वह मामला बीसवीं सदी का सबसे बड़ा मुक़दमा बन गया था. आख़िर में ज्यूरी ने सिंपसन को आपराधिक मामले में बरी कर दिया था लेकिन दीवानी अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था.

लोकप्रिय उपन्यासकार जेफ़्री आर्चर को धोखाधड़ी के एक मामले में लंबे समय जेल की हवा खानी पड़ी थी और हाल की में शराब पीकर गाड़ी चलाने के मामले में खरबपति उद्योगपति और मॉडल पैरिस हिल्टन को जेल जाना पड़ा था.

संजय दत्त के हितैषी शायद ये भूल रहे हैं कि इस मुल्क़ के क़ानून के तहत सज़ाएँ जाँच एजेंसियों के जुटाए साक्ष्यों और गवाहों के बयान के आधार पर दी जातीं हैं, व्यक्तिगत आचरण और अपराध से पहले और बाद में भलमानसहत के आधार पर नहीं.

उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि जो मीडिया आज उनके आसुंओं को लोगों के ड्राइंग रुम तक पहुंचा रहा है, वही मीडिया अदालत से मिलने वाली किसी भी संभावित राहत की भी बखिया उधेड़ सकता है.

लोकशाही में और ख़ासकर भारत जैसी लोकशाही में, ये संदेश अवाम तक पहुँचते रहना चाहिए कि अपराधी या अभियुक्त की पृष्ठभूमि कभी भी उसके अपराध की सज़ा को प्रभावित नहीं कर सकती.

लोकतंत्र में ऐसे उदाहरणों का होना लोक में विश्वास जगाता है और भारत में इस समय ऐसे उदाहरणों की सख़्त ज़रुरत है. कहना न होगा कि उदाहरण पेश करने की ज़िम्मेदारी अकेले अदालतों की नहीं है, प्रभावशाली और बड़े लोगों को भी कुछ उदाहरण पेश करने होंगे.

टीवीख़बरों की परिभाषा
भारत के टेलीविज़न चैनलों के लिए ख़बरें वह हैं जो टीआरपी दिलवाएँ.
हैरी पॉटर की हिंदी किताबहैरी पॉटर के बहाने
हैरी पॉटर की किताब के बहाने हिंदी के प्रकाशन संसार पर एक नज़र.
पानी में डूबी मुंबईपानी का रास्ता
कहते हैं कि पानी अपना रास्ता नहीं भूलता. लेकिन हम यह बात भूल गए.
सलमान रुश्दी का विरोधअपमान से बचाने...
हिंदी को अपमान से बचाने के लिए सरकार को कुछ नीतिगत निर्णय लेने चाहिए.
सलमान रुश्दी का विरोधहम और तुम का टकराव
सलमान रुश्दी के सम्मान पर प्रतिक्रियाएँ आईं लेकिन किस-किस तरह की...
राष्ट्रपति भवन'बाइप्रोडक्ट' में इतिहास
लगता नहीं कि राजनीतिक दलों की मंशा इतिहास रचने की थी. वह बाइप्रोडक्ट है.
विचारों की कमी
सत्ता प्रतिष्ठान आम आदमी की बात किसी नए विचार की तरह उछालता है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>