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बीबीसी की हिंदी...

रोडशो
बीबीसी हिंदी के रोडशो के मौक़े पर बड़ी तादाद में श्रोता जुटे
रेडियो की भाषा कैसी हो, यह पाठ पहले पहल मुझे बीबीसी हिंदी सेवा में वरिष्ठ सहयोगी स्वर्गीय ओंकार नाथ श्रीवास्तव ने पढ़ाया था.

उन्होंने कहा, ‘भूल जाओ कि हिंदी में एमए किया है. रेडियो पर पाठ्यपुस्तकों की या साहित्य की भाषा नहीं चलती. भाषा ऐसी हो जिसमें श्रोताओं से बतियाया जा सके.’

बेशक, मुश्किल से मुश्किल विषय को आसान शब्दों में श्रोताओं तक पहुँचाने का हुनर ओंकार जी को आता था. बीबीसी की हिंदी को ज़िंदादिल बनाए रखने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है. उनसे पहले और उनके बाद भी प्रसारकों-पत्रकारों की कई पीढ़ियों ने बीबीसी की हिंदी को गढ़ने, सँवारने और उसकी परंपरा को क़ायम रखने में भूमिका निभाई.

बीबीसी हिंदी सेवा का जन्म 1940 में हुआ था लेकिन उस ज़माने में उसका नाम था ‘हिंदुस्तानी सर्विस’ और पहले संचालक थे ज़ेड. ए. बुख़ारी.

 आम जन की नज़र में ‘हिंदुस्तानी’ हिंदी और उर्दू की सुगंध लिए एक मिली जुली सादा ज़बान का नाम था, जो भारत की गंगा जमुनी सभ्यता का प्रतीक थी. यही गंगा जमुनी भाषा, बीबीसी की आज की हिंदी का आधार बनी.

विश्व युद्ध का ज़माना था. ब्रितानी फ़ौज में हिंदू भी थे और मुसलमान भी. उनकी बोलचाल की भाषा एक ही थी-हिंदुस्तानी. हालाँकि हिंदुस्तानी सर्विस नाम के जन्म की कहानी का एक राजनीतिक पहलू भी है.

मार्च 1940 में बुख़ारी साहब ने एक नोट लिखा जिसका विषय था ‘हमारे कार्यक्रमों में किस तरह की हिंदी का इस्तेमाल होगा.’ इस नोट में एक जगह उन्होंने लिखा—

"भारत में हाल की राजनीतिक घटनाओं और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की अपेक्षाओं के बीच, दूसरे शब्दों में, इन संकेतों के बीच कि स्वतंत्र भारत की सत्ता बहुसंख्यकों के हाथ में होगी, हिंदुओं ने अपनी भाषा से अरबी और फ़ारसी के उन तमाम शब्दों को निकालना शुरू कर दिया है जो मुसलमानों की देन थे. दूसरी तरफ़ मुसलमानों ने उर्दू में भारी भरकम अरबी-फ़ारसी शब्दों को भरना शुरू कर दिया है".

"पहले की उर्दू में हम कहते थे- मौसम ख़राब है. लेकिन काँग्रेस की आधुनिक भाषा में या मुसलिम लीग की आज की ज़बान में यूँ कहा जाएगा- मौसमी दशाएँ प्रतिकूल हैं या मौसमी सूरतेहाल तशवीशनाक है.…..हम अपने प्रसारणों को दो वर्गों में रख सकते हैं".

"पहला- अतिथि प्रसारक जिनकी भाषा पर हमारा कोई बस नहीं क्योंकि आप बर्नार्ड शॉ की शैली नहीं बदल सकते. दूसरे वर्ग में हमारे अपने प्रसारक आते हैं जिनकी भाषा में मौसम खराब हो सकता है, मौसमी दशाएँ प्रतिकूल नहीं होंगी. काँग्रेस ने हिंदुस्तानी नाम उस भाषा को दिया था जिसमें हम कहते हैं- मौसम ख़राब है".

मिलीजुली ज़बान हिंदुस्तानी

आम जन की नज़र में ‘हिंदुस्तानी’ हिंदी और उर्दू की सुगंध लिए एक मिली जुली सादा ज़बान का नाम था, जो भारत की गंगा जमुनी सभ्यता का प्रतीक थी. यही गंगा जमुनी भाषा, बीबीसी की आज की हिंदी का आधार बनी.

चालीस के दशक से शुरू हुई इस परंपरा को कई जाने माने प्रसारकों ने मज़बूत किया जिनमें बलराज साहनी, आले हसन, पुरुषोत्तमलाल पाहवा, महेंद्र कौल, रत्नाकर भारती, गौरीशंकर जोशी, हिमांशु भादुड़ी, नीलाभ, परवेज़ आलम, जसविंदर समेत बहुत से नाम शामिल हैं.

आले हसन देवनागरी लिपि नहीं जानते थे. उर्दू में लिखते थे. मगर बीबीसी हिंदी के पुराने श्रोता उनकी ख़ूबसूरत आवाज़ और मीठी भाषा कैसे भूल सकते हैं!

अस्सी के दशक के शुरू में ऐसे ही एक और प्रसारक बीबीसी हिंदी के आकाश पर उदित हुए. नाम है शफ़ी नक़ी जामई. हिंदी भाषा सीखने का जज़्बा इतना प्रबल था कि शुरू-शुरू में बात बेबात कठिन से कठिन शब्दों का प्रयोग करने लगे.

जहाँ ‘बहुत ज़रूरी’ से बात बनती हो, वहाँ वे ‘अत्यावश्यक’ कहते. जहाँ ‘बिजली’ से काम चलता हो वहाँ ‘विद्युत’ कहते. उनका यह हाल देखकर उर्दू सेवा के सहयोगी यावर अब्बास से रहा न गया और उन्होंने एक शेर फ़र्माया-

शफ़ी, छोड़ दो अंदाज़ हिंदी वालों के
उठोगे हश्र में वरना तथा-तथा करते

 बीबीसी की हिंदी के इतिहास और परंपरा की बात करने के साथ-साथ उसके श्रोताओं की बात करना ज़रूरी है क्योंकि बीबीसी की हिंदी की एक अलग पहचान बनाए रखने में उसके श्रोताओं का बहुत बड़ा रोल रहा है.

यह वह समय था जब हिंदी और उर्दू भाषाओं में दूरियाँ बढ़ने लगी थीं. कुछ सुनने वालों को लगने लगा था कि उर्दू फ़ारसी के नजदीक जा रही है और उसकी देखा देखी हिंदी संस्कृतनिष्ठ हो रही है.

मुहावरेदार भाषा

लेकिन ख़ास बात है कि अपने हिंदी ज्ञान को साबित करने के इस प्रयास में शफ़ी यह कभी नहीं भूले कि उनकी सबसे बड़ी ताक़त उनकी मुहावरेदार भाषा है. मुहावरेदार भाषा बीबीसी की हिंदी की एक और पहचान है जिसे कुछ लोगों ने जीवित रखा.

बीबीसी की हिंदी के इतिहास और परंपरा की बात करने के साथ-साथ उसके श्रोताओं की बात करना ज़रूरी है क्योंकि बीबीसी की हिंदी की एक अलग पहचान बनाए रखने में उसके श्रोताओं का बहुत बड़ा रोल रहा है.

अस्सी के दशक के अंतिम वर्षों तक भारत में मीडिया आज की ‘मीडिया इंडस्ट्री’ जैसा नहीं था. श्रोताओं के पास विकल्प सीमित थे. बीबीसी हिंदी ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ नगरों-महानगरों में भी सुनी जाती थी.

सुनने वालों में नेता-अभिनेता, शिक्षक, पत्रकार, साहित्यकार, भाषाविद् सभी शामिल थे. आपातकाल के दौरान तो घरों में ही नहीं जेलों की कोठरियों में भी बीबीसी हिंदी की आवाज़ गूँजती थी. नब्बे के दशक के आरंभ में परिदृश्य तेज़ी से बदलना शुरू हुआ! टेक्नॉलॉजी ने बहुत कुछ संभव कर दिया. सैटलाइट और केबल टेलीविज़न चैनलों ने ढेरों विकल्प पैदा किए, देखते-देखते कई समाचार चैनल शुरु हुए और अब एफ़एम रेडियो.

लेकिन टेलीविज़न और एफ़एम चैनलों की इस भीड़ में भी आज, भारत के लगभग पौने दो करोड़ लोग बीबीसी के श्रोता हैं. वे बीबीसी हिंदी इसलिए सुनते हैं ताकि ख़ुद को दुनिया से जुड़ा हुआ महसूस कर सकें, अपने मन के आकाश को विस्तृत कर सकें.

हिंदी माध्यम भर है. इन श्रोताओं की सबसे बड़ी संख्या बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में है. बाक़ी मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल, महाराष्ट्र और गुजरात में बिखरे हैं. हर प्रांत में हिंदी के अलग-अलग रूप हैं. अलग-अलग रंग हैं.

ग्रामीण क्षेत्रों में बसे श्रोता

यह भी सच है कि बीबीसी हिंदी के श्रोताओं में से लगभग दो-तिहाई ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं. बहुत से स्थानों पर टेलीविज़न क्या, बिजली तक नहीं पहुँची. टेलीफ़ोन करना हो तो कई किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ता है. कंप्यूटर कैसा होता है, यह बहुतों को मालूम तक नहीं. इंटरनेट या वेबसाइट क्या बला है, यह सोचने की फ़ुर्सत किसे है.

ई-मेल का ज़िक्र, सुनते ही उन्हें लगता है जैसे हम उसके पोस्टकार्ड का हक़ छीन रहे हैं. उनकी भाषा में अंग्रेज़ी की घुसपैठ कम भले हो मगर क्षेत्रीय रंगों के साथ जीवित है.

बीबीसी हिंदी के श्रोताओं में 60 प्रतिशत से ज़्यादा युवा भी हैं. इनमें स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले, गाँव से शहर जाकर विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले, अपने भविष्य और कैरियर के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले शामिल हैं.

यह युवा वर्ग अपनी नन्ही-नन्ही महत्वाकांक्षाएँ लिए एक बड़ी सी दुनिया में क़दम रख रहा है. उसकी हिंदी अपने आसपास के तमाम बदलावों को ग्रहण कर रही है.

 यह भी सच है कि बीबीसी हिंदी के श्रोताओं में से लगभग दो-तिहाई ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं. बहुत से स्थानों पर टेलीविज़न क्या, बिजली तक नहीं पहुँची. टेलीफ़ोन करना हो तो कई किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ता है. कंप्यूटर कैसा होता है, यह बहुतों को मालूम तक नहीं. इंटरनेट या वेबसाइट क्या बला है, यह सोचने की फ़ुर्सत किसे है.

मौक़ा मिलने पर वह किसी साइबर कैफ़े में जाकर बीबीसीहिंदी.कॉम भी पढ़ता है, कभी-कभार ई-मेल भी लिखता है. अंग्रेज़ी या अन्य भाषाओं के प्रभावों से ज़्यादा परहेज़ नहीं करता. बल्कि शिकायत करने के नए-नए अंदाज़ ढूँढता है जैसे -‘आज कल आपके शाम के प्रसारण का रिमिक्स वर्जन ही सुनने को मिल रहा है. जब सुनो, रेडियो बीजिंग आपकी फ्रीक्वेंसी में हस्तक्षेप करता रहता है.’

यह श्रोता वर्ग नए-नए टीवी चैनल भी देखता है. एफ़एम रेडियो भी सुन लेता है.

नए मीडिया माहौल में बीबीसी हिंदी के सामने एक नई चुनौती उठ खड़ी हुई. श्रोताओं के इन दोनों वर्गों से एक सामान्य भाषा में बात करने की चुनौती. इस चुनौती का जवाब हमने अपनी परंपरा और प्रयोगधर्मी प्रकृति में ढूँढ़ा.

बोलचाल की भाषा

जवाब था, वह हिंदी जो आम आदमी की बोलचाल की भाषा है, वही हमारी आज की भाषा है. हमारे क्षेत्रीय संवाददाताओं ने उसमें अपने-अपने क्षेत्र के मुहावरों का रस घोला है. साथ ही नई पीढ़ी और नई टेक्नॉलॉजी की ज़रूरत के हिसाब से यहाँ-वहाँ अंग्रेज़ी शब्दों के सहज छींटों से भी हमें परहेज़ नहीं. इसलिए कि 21सवीं सदी की हिंदी भी नई चुनौतियों का सामना कर रही है.

तीन वर्ष पहले हमने अपने श्रोताओं से आमने-सामने बातचीत करने के लिए ‘रोड शो’ का सिलसिला शुरू किया. सवाल उठा अगर इसे रोड शो ही कहेंगे तो शायद शुद्धतावादी चौंकें, अंग्रेज़ीदाँ ‘यह मुँह और मसूर की दाल’ वाले भाव से देखें. पर भरोसा हिंदी के शुभेच्छुओं पर था कि कम-से-कम वे तो यह स्वीकार करेंगे कि रोड शो करने का अधिकार राजनीतिक पार्टियों को ही नहीं, हिंदीवालों को भी है.

हमें चिंता सिर्फ़ अपने ग्रामीण श्रोताओं की थी कि क्या वे ‘रोड शो’ शब्द को सहज स्वीकार कर पाएँगे? इसलिए हर रोड शो को एक शीर्षक दिया गया. पहले वर्ष नाम दिया-‘बीबीसी हिंदी का कारवाँ’.

दूसरे वर्ष ‘आपकी बात-बीबीसी के साथ’ और पिछले वर्ष के रोड शो का शीर्षक था ‘आपकी दुनिया-आपकी आवाज़’. मज़े की बात यह है कि हमारे श्रोताओं को ये अलग-अलग शीर्षक शायद याद नहीं मगर यह याद है कि बीबीसी ने उनके क्षेत्र में रोड शो किया.

उनकी बोलचाल की भाषा क्षेत्रीय बोलियों की कोख से निकली है. वहाँ उर्दू के शब्दों का भी स्वागत है और अँग्रेज़ी के शब्दों का भी. अपने रोड शो के दौरान हम एक बार बलिया, उत्तर प्रदेश गए. चर्चा का विषय था, अगर आप सांसद होते तो क्या करते.

चर्चा गर्म रही. लेकिन जो बात हमें आज तक याद है, वह है एक श्रोता का यह वक्तव्य—‘हमार बात सुन लेअल जाई, बलिया पॉलिटिक्स का केंद्र बा. परिवर्तन की हर आँधी एहिजे से उठल बा. बलिया का हर नौजवान क़ुर्बानी देवे में सबसे आगे रहल बा.’ इस पर भला किसे आपत्ति होती.

 रोड शो ने हमारी इस आस्था को और पक्का कर दिया कि बीबीसी हिंदी और उसके श्रोता एक दूसरे की बात अच्छी तरह समझते हैं. उनके बीच विचारों के परस्पर आदान-प्रदान में भाषा दीवार नहीं बनती. हमारे श्रोताओं को रोड शो, मीडिया, रिपोर्ट जैसे शब्दों पर कोई आपत्ति नहीं. ना ही कारवाँ, दुनिया, आवाज़ जैसे शब्दों से ऐतराज़.

झारखंड में बीबीसी के श्रोताओं ने बताया कि ‘हियाँ जादे करके लोग बीबीसी का साँझ वाला प्रोग्राम सुनते हैं. आप लोग पूरा दुनिया का न्यूज देते हैं. बाकी सब तो ओतना नहीं देते हैं.’ बेगूसराय के सुनने वालों का कहना था कि ‘बीबीसी के जे बात हमरा सबसे ज्यादा पसंद छई उ ई कि बिना लाग लपेट के, बिना कोनो तरफदारी के सच बोलइछे.’

रोड शो ने हमारी इस आस्था को और पक्का कर दिया कि बीबीसी हिंदी और उसके श्रोता एक दूसरे की बात अच्छी तरह समझते हैं. उनके बीच विचारों के परस्पर आदान-प्रदान में भाषा दीवार नहीं बनती. हमारे श्रोताओं को रोड शो, मीडिया, रिपोर्ट जैसे शब्दों पर कोई आपत्ति नहीं. ना ही कारवाँ, दुनिया, आवाज़ जैसे शब्दों से ऐतराज़.

असल में समस्या उन मुट्ठी भर लोगों की रही है जो हिंदी को कभी राजनीति, कभी धर्म, तो कभी शुद्धता के नाम पर बदलने और आगे बढ़ने से रोकना चाहते हैं. उनका एजेंडा अलग है.

बीबीसी की हिंदी समय-समय पर अंग्रेज़ी के शब्दों के प्रयोग पर आपत्तियों और आरोपों का निशाना बनती आई है. कुछ साल पहले तक आपत्ति रही कि ‘बीबीसी हिंदी डिस्पैच या रिपोर्ट जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों करती है? इनके स्थान पर ‘संवाद’ शब्द उचित है.’

हमारा तर्क था, अगर आपको रिपोर्ट या डिस्पैच जैसे शब्द पर आपत्ति है तो साइकल, बस, टिकट, कैमरा या फ़िल्म जैसे शब्दों पर क्यों नहीं. और अगर हम अंग्रेज़ी शब्दों से सिर्फ़ इसलिए बचना चाहते हैं कि वे हिंदी की शुद्धता पर बट्टा लगाते हैं तो ख़ुद को यह याद दिलाते रहना चाहिए कि किसी भी भाषा के जीवित रहने और फलने-फूलने के लिए, बदलाव पहली और विस्तार आख़िरी शर्त है.

अँग्रेज़ी की ऑक्सफ़र्ड डिक्शनरी हर साल हिंदी के कई नए शब्द शामिल करती है. मिसाल के तौर पर, ‘हवाला’, ‘बंद’, ‘ढाबा’ और ‘धरना’ जैसे शब्द हाल ही में शामिल किए गए हैं.

और फिर, मीडिया की हिंदी सरकारी कामकाज की हिंदी नहीं हो सकती. कृपया मीडिया की हिंदी को सरकारी भाषा का स्टेटस दिलाने की कोशिश न करें. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब इसी चक्कर में हिंदी आम जन से बहुत दूर चली गई थी.

पर मेरे विचार में हिंदी को अब उन लोगों से ज़्यादा ख़तरा नहीं रहा जो हिंदी को अंग्रेज़ी से कोसों दूर रखना चाहते थे. आज मीडिया ने, हिंदी को सही मायनों में जनसंचार की भाषा बनाने में ही मदद नहीं की बल्कि उसे ‘कमर्शियल’ दुनिया से भी जोड़ दिया है.

हिंदी के नाम पर अब पैसा लगाया जाता है. हिंदी नए-नए प्रयोग कर रही है, नए शब्द गढ़ रही है. हो सकता है आज ये शब्द सुनने में बुरे लगें, मगर कल हिंदी के किसी नए शब्दकोश का हिस्सा बन सकते हैं.

बीबीसी नाटक
बीबीसी हिंदी अपने प्रसारणों में सहज भाषा का इस्तेमाल करती है

मेरी नज़र में हिंदी को बड़ा ख़तरा उन लोगों से है जो उसे राजनीति और धर्म के अखाड़े में धकेलने की कोशिश करते हैं. हाल में इन मुट्ठी भर लोगों ने कई बार हिंदी के विरुद्ध इस तरह के षडयंत्र रचने का प्रयास किया.

एक छोटा सा गुट है जो मीडिया की हिंदी में उर्दू के सामान्य से सामान्य शब्दों पर एतराज़ करता है. विभिन्न मीडिया चैनलों को पत्र और ई-मेल लिखकर हिंदी की ‘शुद्धता’ की दुहाई देता है, अभद्र शब्दों में हिंदी की गंगा जमुनी तहज़ीब का अपमान करता है.

पिछले कुछ समय से बीबीसी की हिंदी के ख़िलाफ़ भी ऐसा अभियान चल रहा है. हिंदी के एक ‘पक्षधर’ ने लिखा, “बीबीसी हिंदी सेवा मुद्दा, ख़बरें, सुर्ख़ियाँ, नज़र जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है. ऐसे लोगों को शर्म आनी चाहिए जो हिंदी के नाम पर पैसा कमाते हैं और उर्दू-अँग्रेज़ी का प्रचार करते हैं.”

एक और सज्जन ने लिखा- “आशा है बीबीसी हिंदी के लोग हिंदी के खिलाफ़ कोई साज़िश नहीं कर रहे. षड्यंत्र रचने की उम्मीद आप लोगों से करना बेकार है क्योंकि शायद आपको षड्यंत्र शब्द मालूम भी नहीं होगा”.

चलिए, इस तरह की टिप्पणियों को हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नांम दे देंगे. लेकिन हद तो तब होती है जब हमारे आलोचक व्यक्तिगत और धार्मिक पृष्ठभूमि के आधार पर हमें हिंदी के हिमायती या हिंदी के विरोधी होने का फ़तवा देते हैं.

हिंदी के ये कथित प्रचारक और शुभचिंतक कहते हैं कि हमें हिंदी नहीं आती, हम हिंदी को दूसरी भाषाओं की मिलावट से दूषित कर रहे हैं. वे भूल जाते हैं कि हिंदी अगर आज फल-फूल रही है तो सिर्फ़ इसलिए कि वह कभी इतने छोटे दिल की नहीं रही.

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