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शुक्रवार, 30 सितंबर, 2005 को 15:40 GMT तक के समाचार
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हम तो आवाज़ हैं..

अचला शर्मा
अचला शर्मा ने संचालन किया मुंबई में कार्यक्रम का
सेंसेक्स का शहर मुंबई, बॉलीवुड का शहर मुंबई. एक ऐसा शहर जहाँ फ़िल्म, संगीत, कला-संस्कृति, शेयरबाज़ार और सपने- सभी में एक अदा है, एक बाँकपन है.

एक अर्से बाद मेरा मुंबई जाना हुआ. कारण था 27 सितंबर को मुंबई में बीबीसी हिंदी और उर्दू की एक विशेष साँझी शाम जिसने दो घंटों के लिए मुंबई और कराची को संगीत के माध्यम से एकात्म कर दिया.

आबिदा परवीन और शुभा मुदगल की आवाज़ों से भारत और पाकिस्तान के बीच एक पुल बना. आधुनिक टेक्नॉलॉजी का कमाल देखिए कि कराची में बैठे संगीत प्रेमी शुभा मुदगल को देख और सुन सकते थे और मुंबई में बैठे लोग आबिदा परवीन को.

एक तान मुंबई ने छेड़ी तो दूसरी कराची ने. कराची से बुल्ले शाह का सूफ़ी कलाम गूंजा तो मुंबई से कबीर की वाणी ने उठकर उसे गले लगाया.

कराची की तालियों की गड़गड़हाट मुंबई की तालियों में लीन हो रही थी और मुंबई की तालियाँ कराची की तालियों में. सुर और संगीत उस दूरी को मिटा रहे थे जो भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के साथ अक्सर आँख-मिचोली का खेल खेलती रही हैं.

शुभा मुदगल
शुभा मुदगल ने मुंबई में संगीत का जादू जगाया

तो ज़ाहिर है कि इस विषय पर मुंबई और कराची के बीच बहस भी हुई. लेकिन उसमें में भी कोई ज़्यादा बेसुरा नहीं हुआ.

मुंबई में हमने शायर और गीतकार ज़ावेद अख़्तर, अभिनेत्री किरण खेर और फ़िल्म निर्देशक गोविंद निहलानी को बहस में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया था.

कार्यक्रम शुरू होने से पहले मैने उन्हें जब बताया कि यह दो घंटे तक चलेगा तो सबके चेहरे पर आश्चर्य, व्यस्तता और मजबूरी का सा भाव दिखाई दिया.

दो घंटे? दो घंटे तक कौन बैठेगा? मगर सुर और संवाद का जो रिश्ता कराची और मुंबई के बीच बना, उसने दो घंटे बीतने के बाद तक सभी अतिथियों को बांधे रखा.

सबकी ज़बान पर एक ही बात थी ‘हमारे लिए एक नायाब अनुभव था. ऐसा कार्यक्रम न पहले कभी देखा न सुना.’ शुभा मुदगल के लिए भी यह एक अनोखा अनुभव था.

कार्यक्रम से एक दिन पहले रिहर्सल के दौरान शुभा ने कहा ‘यूँ तो मैं पहले एक बार आबिदा जी से मिल चुकी हूँ, एक ही महफ़िल में गाया भी है, लेकिन इतनी देर तक बातचीत पहली बार की है.’

सच पूछिए तो हमारे लिए भी यह एक नायाब अनुभव था. हमने भी पहली बार सुर का ऐसा रिश्ता जोड़ा.

लेकिन अब सोचती हूँ हमने आख़िर ऐसा क्या कमाल कर दिया. कमाल तो संगीत का था. कार्यक्रम के दौरान ज़ावेद अख़्तर ने संगीत की ताक़त की बात करते हुए मजरूह सुलतानपुरी का यह शेर पढ़ा था
‘रोक सकता हमें ज़िंदाने बला क्या मजरूह
हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं.’

66सुर का रिश्ता के गीत
कराची और मुंबई में एक साथ आयोजित संगीत समारोह के गीत सुनिए.
66देखिए और सुनिए
बीबीसी हिंदी उर्दू की साझा संगीत महफ़िल 'सुर का रिश्ता' के ऑडियो-वीडियो.
66सुरों का संगम
मुंबई और कराची में जुड़ा सुर का रिश्ता तस्वीरों में देखिए...
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