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हर जगह के दर्शकों को लुभाना मुश्किल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी सिनेमा में आज की तारीख़ में कई ऐसे युवा निर्देशक हैं जिन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी है. अनुराग बासु ऐसे ही निर्देशकों में से एक हैं. टेलीवीज़न की दुनिया से अपना सफ़र शुरू करने वाले अनुराग बासु ने गैंगस्टर और मर्डर जैसी हिट फ़िल्में देकर सिनेजगत में भी अपनी जगह बनाई है. कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी भी उनके हौसले पस्त नहीं कर पाई है. उनकी नई फ़िल्म 'लाइफ़ इन ए मेट्रो' का हाल ही में लंदन के लेस्टर स्कवेयर में प्रीमियर हुआ. ये पहली हिंदी फ़िल्म है जिसका प्रीमियर यहाँ आयोजित किया गया है. बीबीसी ने अनुराग बासु से ख़ास बातचीत की: आपकी नई फ़िल्म है 'लाइफ़ इन ए मेट्रो', किस तरह की फ़िल्म है ये? लाइफ़ इन ए मेट्रो से पहले मैने मर्डर और गैंगस्टर बनाई थी. इन फ़िल्मों के बाद मैं सोच रहा था कि क्या करूँ. तो मैने सोचा कि आम आदमी गैंगस्टर नहीं है, क़त्ल नहीं करता लेकिन हम सबकी ज़िंदगी में काफ़ी ड्रामा होता है. लाइफ़ इन ए मेट्रो एक कोशिश है उसी ड्रामे को फ़िल्मी पर्दे पर उतारने की. ज़ाहिर है आपकी पिछली फ़िल्मों- मर्डर और गैंगस्टर से काफ़ी अलग है लाइफ़ इन ए मेट्रो . क्या कहीं न कहीं आपकी निजी अनुभवों पर भी आधारित है ये फ़िल्म? मेट्रो की कहानी दिमाग़ के अंदर करीब दो साल पहले पैदा हुई थी जब डॉक्टरों ने बताया कि मुझे कैंसर हैं. डॉक्टरों ने मुझसे कहा कि मैं बस 14-15 दिन और ज़िंदा रह पाउँगा. तब मेरे ज़हन में बात आई कि मैने पूरी ज़िंदगी ऐसे ही बर्बाद कर दी-भौतिक चीज़ों के पीछे भाग-भाग कर. मुझे लगा कि कैसे हम छोटी-छोटी चीज़ों के पीछे ज़िंदगी बर्बाद कर देते हैं.तब से ही दिमाग़ में था कि कोई फ़िल्म ऐसी बनाई जाए जो एक आईना हो लेकिन जिसमें भाषण न हो. लाइफ़ इन ए मेट्रो में सभी किरदारों की निजी कहानियाँ तो चलती ही हैं, लेकिन साथ ही आपने ये भी दिखाया है कि बड़े शहरों के हाई टेक ऑफ़िसों में पर्दे के पीछे कैसे-कैसे गंदे खेल होते हैं? बहुत से लोग शायद अपनी ज़िंदगी में इस सब से जूझते हैं. बिल्कुल, मेरे पड़ोस में होता है ऐसा. लाइफ़ इन ए मेट्रो में देखने को मिलता है कि शरमान जोशी का किरदार अपने ऑफ़िस में अफ़सरों को खुश करने के लिए अपने घर की चाबी उन्हें देता और घर में तमाम कुछ चलता है. मेरे घर के ठीक सामने एक फ़्लैट है. फ़्लैट के मालिक अमरीका में रहते हैं और छह-सात महीने में एक बार आते हैं. उस फ़्लैट में यही सब काम होता है. मैं अकसर देखता हूँ कि लोग आते हैं और जाते हैं. दोपहर को आते हैं...रात को भी नहीं. जब मेरे फ़्लैट के लोग ये फ़िल्म देखेंगे तो काफ़ी हँसेगे क्योंकि ये कहानी मेरे साथ, मेरे फ़्लैट में होती है. लाइफ़ इन ए मेट्रो में काफ़ी सारे अभिनेता हैं- शिल्पा शेट्टी,शाइनी, शरमन जोशी....लेकिन लगता है कि इरफ़ान खान चुपके से फ़िल्म को चुरा के ले जाते हैं. हालांकि उनका किरदार बड़ा ही साधारण है, ग्लैमरस नहीं है.
सबका यही कहना है. जब इरफ़ान को मैने इस किरदार के बारे में बताया था कि इरफ़ान का कहना था कि उनके लिए करने के लिए कुछ नहीं है और बाकी लोगों के रोल ज़्यादा अच्छे हैं. तो मैने उनसे कहा था कि रोल की लंबाई न देखें क्योंकि फ़िल्म के पहले हाफ़ में इरफ़ान आते ही नहीं है-केवल दो बार आते हैं. तब मैने इरफ़ान से कहा था कि फ़िल्म देखने के बाद लोग तु्म्हारी ही बात करेंगे. लेकिन इरफ़ान काफ़ी असुरक्षित थे अपने रोल को लेकर. बहुत मुश्किल हुआ था उन्हें यकीन दिलाना. वे बार-बार कहते रहे कि वो कोई और फ़िल्म कर लेगें मेरे साथ. लेकिन आज इरफ़ान कहते हैं कि अगर ये फ़िल्म नहीं करते तो बहुत बड़ी ग़लती करते. शाइनी अहुजा अकसर आपकी सारी फ़िल्मों में रहते हैं? जी शाइनी बहुत अच्छे दोस्त हैं. वैसे ये फ़िल्म मेरे दोस्तों से भरी हुई है. शाइनी पहले अभिनेता थे जिन्हें मैने इस फ़िल्म के लिए साइन किया था. बतौर निर्देशक जब फ़िल्म बनाते हैं या जब कहानी लिखते हैं, तो आप प्रेरणा कहाँ से लेते हैं? अपने आस-पास, अपने आस-पड़ोस से. कहानी आपके आपके आस-पास घूमती रहती है. बस आपके अंदर वो बात होनी चाहिए, उसे पकड़ने की. लाइफ़ इन ए मेट्रो में जितने भी किरदार हैं, सब आस-पास से ही लिए हैं. कहते हैं कि‘ यू हैव टू एनहेल लाइफ़ टू एक्सहेल सिनेमा.’ बहुत से निर्देशक कहते हैं कि वे अपनी फ़िल्में नहीं देखते. तो क्या फ़िल्म बनाने के बाद आप देखते हैं कि आपने क्या बनाया कैसे बनाया. सही कहते हैं वो निर्देशक. मैं अकसर अपनी फ़िल्में बाद में नहीं देखता. ये होता है मेरे ख़्याल से. मुझे तो बाद में ख़ामियाँ नज़र आती हैं अपनी फ़िल्मों में, ऐसी ग़लतियाँ जो कि मुझे पता है शायद लोगों को नहीं पता. मैने और मेरे सहयोगियों ने जब लाइफ़ इन ए मेट्रो देखी तो यही लग रहा था कि ये ग़लत हो गया, वो ऐसे होना चाहिए था. हाँ पर कुछ चार-पाँच साल बाद कभी टेलीवीज़न पर अपनी कोई फ़िल्म चल रही हो, तो अच्छा लगता है. जिस तरह की फ़िल्में आजकल बन रही हैं, बहुत सारे नए और युवा निर्देशक भी हैं. तो किस तरह से देखते हैं भारतीय सिनेमा को. भारतीय सिनेमा आगे बढ़ रहा है और धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा की सैंसेब्लिटी बदल रही है. हम रातों-रात तो नहीं बदल सकते, रातों-रात नहीं कह सकते कि अलग तरह की फ़िल्में बनाना शुरु कर देंगे. हमें दर्शकों को भी मद्देनज़र रखना है. यूपी-बिहार के लोगों को भी फ़िल्में अच्छी लगनी चाहिए और मुंबई-दिल्ली के लोगों को भी. तो ऐसी फ़िल्में बनाना बहुत मुश्किल है जो पूरे हिंदुस्तान में भी लोगों को अच्छी लगें और विदेशों में भी. कोशिश तो यही है. सिस्टम में रहते हुए सिस्टम को बदलना होगा. बॉलीवुड मसाला के अंतर्गत रहते हुए नई फ़िल्में बनाना बहुत बड़ी चुनौती है. आपके पसंदीदा निर्देशक कौन-कौन हैं? मेरे समकालीन जितने भी निर्देशक हैं सब बहुत अच्छे हैं. जैसे हम कहते हैं कि 70 का दशक हिंदी सिनेमा का गोल्डन युग था- बहुत अच्छे-अच्छे निर्देशक थे. ऋषिकेष मुखर्जी, बासु चैटर्जी, श्याम बेनेगल, मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा. हर तरह के निर्देशक थे. मुझे लगता है कि अब से तीस साल बाद लोग कहेंगे कि 2010 का दौर गोल्डन युग था क्योंकि बहुत अच्छे-अच्छे निर्देशक हैं आज की तारीख़ में. ऋषिकेष मुखर्जी, बासु चैटर्जी, श्याम बेनेगल..जिन निर्देशकों का आपने नाम लिया इनकी फ़िल्मों में आम आदमी, गाँव, छोटे कस्बे नज़र आते थे लेकिन आज की फ़िल्में ज़्यादातर शहरों के इर्द-गिर्द घूमती हैं. गाँव-कस्बे तो जैसे ग़ायब हो गए हैं.
हाँ क्योंकि पैसा बड़े शहरों से है. बहुत कम लोग छोटे शहरों में हॉल में जाकर फ़िल्में देखते हैं. वीडियो कैसेट और डीवीडी आने के बाद बाज़ार बहुत बदल गया है. लोग पचास रुपए की डीवीडी खरीदकर लाते हैं और 50 लोग मिलकर देखते हैं. सो गाँवों में तो लोग हॉल में जाते नहीं हैं. बड़े शहरों में पैसा है, विदेशों में पैसा है. तो इसलिए शायद फ़िल्में उनके लिए बन रही हैं. अभी किसी नई फ़िल्म पर काम कर रहे हैं? इंतज़ार कर रहा हूँ कि मेट्रो को कैसे लेते हैं लोग. उसके बाद निर्भर करता है कि जो सारे प्रोजेक्ट मेरी पाइपलाइन में हैं, उसमें से क्या मैं बाहर करना चाहूँगा. क्योंकि सफलता से बड़ा उत्साह बढ़ता है. आपने टेलीवीज़न के लिए भी काफ़ी काम किया है. तारा, कोशिश...जैसे सिरीयल बड़े सफल रहे हैं. तो क्या फ़िल्मों ने अब आपको टेलीवीज़न से छीन लिया है? नहीं मेरा एक पैर हमेशा टेलीवीज़न में रहता है. अभी भी टेलीवीज़न पर मेरे शो आ रहे हैं. हाँ रोज़ ख़ुद जाकर निर्देशित करना मुश्किल हो गया है. लेकिन मेरा प्रोडक्शन हाउस कई सालों से टेलीवीज़न कार्यक्रम बनाता आया है, अभी भी बना रहा है और बनाता रहेगा. क्योंकि आज मैं जो कुछ भी हूँ टेलीवीज़न की वजह से हूँ. आपने शुरू में बताया कि आपको कैंसर हैं. आपके प्रशंसक ज़रूर जानना चाहेंगे कि अभी आपका स्वास्थ्य कैसा है. अभी नियंत्रण में है. दवाइयाँ चल रही हैं. नियमित रूप से खून की जाँच करवानी पड़ती है. बस यही है. बाकी तो ज़िंदगी चल रही है. लोग डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर की दवाई खाते हैं, मैं कैंसर की खाता हूँ. यही फ़र्क है. |
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