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चंद लोगों की उलझती-सुलझती कहानी... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बड़े-बड़े शहरों में बड़े-बड़े सपनों का पीछा करते लोग- सपना प्यार का, पैसे का, रुतबे का...और इसी दौड़ में लगे चंद लोगों की उलझती-सुलझती कहानी- इसी के इर्द गिर्द घूमती है फ़िल्म ‘लाइफ़ इन ए मेट्रो’. निर्देशक अनुराग बासु की इस फ़िल्म में सितारों की लंबी-चौड़ी लिस्ट है- शिल्पा शेट्टी, शाइनी अहूजा, कोंकना सेन शर्मा, इरफ़ान खान, शरमन जोशी, कँगना रानावत और केके मेनन. कहानी मुंबई में रहने वाले चार जोड़ों की है. शिल्पा शेट्टी और केके मेनन शादीशुदा हैं जिनकी ज़िंदगी में सब कुछ है- पैसा, बँगला, सुविधाएँ. नहीं है तो बस प्यार. प्यार की तलाश में, शादी के रिश्ते की दहलीज़ से बाहर क़दम रखती है शिल्पा जब उसकी मुलाक़ात शाइनी अहुजा से होती है. जबकि शादीशुदा जिंदगी से उकता चुके केके मेनन अपने ऑफ़िस में काम करने वाली कंगना रनावत के साथ संबंध बनाए हुए हैं. कॉल सेंटर में काम कर रही कँगना रानावत और शरमन जोशी प्यार नहीं पैसा हासिल करने की होड़ में हैं. पर दिल के किसी कोने में इन्हें भी प्यार की तलाश है. पर पैसा उन्हें कैसे-कैसे नाच नचाता है, ये फ़िल्म में बखूबी देखने को मिलता है. दूसरी ओर हैं कोंकना सेन शर्मा जो अपने ‘मिस्टर राइट’ की तलाश में एड़ी चोटी का ज़ोर लगाए हुए हैं. उधर इरफ़ान खान बेचारे अपनी 'श्रीमती' की तलाश में परेशान हैं. इरफ़ान का कमाल
फ़िल्म की जान है इरफ़ान खान और कोंकना सेन शर्मा के बीच की केमिस्ट्री. द नेमसेक के बाद इरफ़ान खान ने एक बार फिर बेहतरीन काम किया है. फ़िल्म में इरफ़ान की कॉमिक टाइमिंग ग़ज़ब की है. जब-जब फ़िल्म बोझिल होती नज़र आई, इरफ़ान के हँसी-फ़ुव्वारों ने माहौल हल्का किया. फ़िल्म में सभी कहानियाँ समानांतर चलती हैं- फ़िल्म सलाम-ए-इश्क और हनीमून ट्रेवल्स की तरह और सभी किरदार किसी न किसी तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. समानांतर कहानियों में एक रिस्क यही रहता है कि जब एक कहानी में आपकी दिलचस्पी बनने लगती है, तो अचानक उस कहानी का तार तोड़कर आपको दूसरी कहानी से जोड़ दिया जाता है. और इस चक्कर में कुछ कहानियाँ या किरदार पूरी तरह उभर कर नहीं पाते. अनुराग बासु की फ़िल्म भी आंशिक तौर से इस समस्या से जूझती है. फ़िल्म में शाइनी अहुजा के किरदार के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है. अपनी पिछली फ़िल्मों से काफ़ी प्रभावित करने वाले शाइनी अहुजा को इस फ़िल्म में ज़्यादा कुछ करने का मौका ही नहीं मिल पाया है. सरप्राइज़ पैकेज
फ़िल्म किसी फंतांसी में आधारित नो होकर असल ज़िंदगी में होने वाले ड्रामे को दर्शाती है. फ़िल्म के ज़्यादातर हिस्से किसी सेट के बजाय असल लोकेशनों पर फ़िल्माए गए हैं जो इसे 'रियल लाइफ़ फ़ील' देते है. फ़िल्म का सरप्राइज़ पैकेज रही धर्मेंद्र और नफ़ीसा अली की जोड़ी जिनकी विशेष भूमिका है. अधूरे प्यार को परवान चढ़ाती इस जोड़ी पर फ़िल्म के सबसे रोमांटिक दृश्य फ़िल्माए गए हैं. 70 साल के धर्मेंद्र जब सीढ़ी के सहारे चढ़कर नफ़ीसा अली को अपने मोटरसाइकल पर भगाकर ले जाते हैं...तो 60 के दशक वाले धर्मेंद्र की याद ताज़ा हो गई. दोनों पर चुंबन दृश्य भी फ़िल्माया गया है जो पहले से ही काफ़ी चर्चा में बना हुआ है. वैसे बड़े शहरों के अकेलेपन में अपने-अपने स्तर पर संघर्ष करते लोगों की कहानी कोई नई बात नहीं है. लेकिन निर्देशक अनुराग बासु ने कुछ समसामयिक विषयों को शामिल कर कहानी में कुछ ताज़गी लाने की कोशिश ज़रूर की है. फ़िल्म में महानगरों के बड़े-बड़े हाई टेक ऑफ़िसों में पर्दे के पीछे पैसे और सेक्स के गंदे खेल का पर्दाफ़ाश किया गया है. जो कहीं न कहीं मधुर भंडारकर की पेज-3 और कॉरपरेट की याद दिलाता है. फ़िल्म का संगीत प्रीतम ने दिया है जो अनुराग बासु की अन्य फ़िल्मों में भी संगीत दे चुके हैं. फ़िल्म के गानों आपको महिला गायक की आवाज़ सुनाई नहीं देगी. सभी गाने पुरुष गायकों ने ही गाए हैं- जेम्स, केके, अदनान सामी, सोहम और ख़ुद प्रीतम ने गानों को आवाज़ दी है. ख़ासकर जेम्स का गाया गाना 'रिश्ते तो नहीं रिश्तों की परछाइयाँ मिलें, ये कैसी भीड़ है बस यहाँ तनहाइयाँ मिलें' काफ़ी प्रभावित करता है. और शायद फ़िल्म की कहानी को एक वाक्य में बयाँ भी कर जाता है. फ़िल्म में शाहरुख़ खाननुमा सुपरस्टार तो नहीं है लेकिन बिग ब्रदर में चर्चा के आने के बाद से ये शिल्पा की पहली बड़ी फ़िल्म है. इसमें कोई शक नहीं है कि विदेशों में शिल्पा शेट्टी के नए सेलिब्रिटी स्टेट्स से कम से कम एनआरआई मार्केट में फ़िल्म को कुछ हद तक मदद ज़रूर मिलेगी. निर्देशक- अनुराग बासु |
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