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शुक्रवार, 30 मार्च, 2007 को 13:53 GMT तक के समाचार
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मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कपीश’ का अंश
चित्रांकनः हरीश परगनिहा
चित्रांकनः हरीश परगनिहा

कसप, कुरु-कुरु स्वाह, हमजाद, कौन हूँ मैं जैसे उपन्यासों और हम लोग, बुनियाद मुंगेरी लाल के हसीन सपने जैसे धारावाहिकों के लेखक मनोहरश्याम जोशी एक साथ कई उपन्यासों पर काम कर रहे थे.

उनमें सबसे ज़्यादा महत्वाकांक्षी उपन्यास था कपीश जी. यह उपन्यास दो हिस्सों में लिखा जाना था-एक हिस्सा भारत में और दूसरा अमरीका में. भारत वाला हिस्सा जोशी जी मृत्यु से पूर्व पूरा कर चुके थे और अमरीका वाले हिस्से से संबंधित अनुसंधान वह पूरा कर चुके थे, लेकिन उसे लिखा जाना अभी शेष था. कपीश जी उपन्यास का नायक रंगकंगाली नामक भारतीय कस्बे के निर्धन अध्यापक और गाँधीवादी साहित्यकार के घर में छह पुत्रियों के बाद जन्म लेता और सो भी तब जब उसकी माँ अपने मुँह बोले और हनुमान को सिद्ध किए हुए देवर के साथ बजरंगगढ़ के मंदिर में मनौती माँगती है. हनुमान जी बालक को सपने में ही दर्शन देने और उसका मार्ग दर्शन करने लगते हैं. प्रबुद्ध अध्यापक के मूढ़मगज बालक को सपने में पर्चा आउट करा जाने से जो सिलसिला शुरू होता है वह स्वप्न में अब्राहम लिंकन से मिलाने और उसके देश अमरीका में चले जाने की सलाह देने तक चलता है. भारत में हर क्षेत्र में विफल रहने के बाद अमरीका जाकर जगदगुरु कपीश जी बन जाता है और ‘हाई ऑन हनुमान’ नामक एक पंथ चलाने लगता है. कंगाल से मालामाल बने विख्यात वानकॉकोर्ड परिवार की डबल तलाकशुदा बेटी कैथरीन उर्फ केटी के शामिल होने से पंथ के लिए पैसों की कोई कमी नहीं रहती और प्रसिद्ध लेखक टुबैल ओजमेलर के अनुयाई बन जाने से पंथ के लिए प्रचार की कोई कमी नहीं रह जाती.

मनोहर श्याम जोशी हमारे बीच नहीं रहे. उनकी पहली पुण्य तिथि 30 मार्च पर प्रस्तुत है उनके अप्रकाशित उपन्यास ‘कपिश’ का एक अंश-

प्रपितामह आदित्य स्वरुप राधेलाल शर्मा

रंगकंगाली में रंगकंगाली में रंग की अपेक्षा कंगाली ही अधिक थी. इसीलिए ऐसे हर व्यक्ति की ओर वह निगाह खिंचती थी जो रईस ही नहीं रंगीला भी हो अर्थात आगामी पीढ़ियों की कोई चिंता न करते हुए अपनी रईसी को अपने रंगीलेपन पर न्यौछावर करने का साहस रखता हो. कपीशजी के प्रपितामह राधेलाल शर्मा इस मामले में इतने साहसी थे कि रंगकंगाली के इतिहास में उनका स्थान अमर हो गया है.

अगर किसी भी रंगकंगाल से यह पूछा जाए कि तुमने राधेलाल शर्मा का नाम सुना है तो वह तुरंत कहेगा कि ज़रूर सुना है. इन्हीं राधेलाल जी ने तो कलकत्ता से आए फिरंगी हाकिम को अपनी रईस तबीयत से चकित-चमत्कृत कर दिया था. नोटों की आग पर उनके लिए चाय का पानी उबलवाया था. एक कप चाय ढाई हज़ार की पड़ी थी. और उस जमाने का ढाई हज़ार तो आज का ढाई करोड़ ही समझो.

नोटों की आग से चाय उबलवाने की यह घटना रंगकंगाली में एक सम्मानित मिथक का दर्ज़ा रखती है. नई चाल के कुछ लोग इसते इतिहास होने में थोड़ा संदेह करते हैं. बहरहाल इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि राधेलाल जी रईस और रंगीन मिज़ाज दोनों थे. रंगकंगालों के अनुसार राधेलाल जी ने रंगीली के बीज इसलिए पड़ गए कि उनके पिता ने बचपन में ही उन्हें फिरंगियों की भाषा पढ़ाना शुरू किया और इस सिलिसले में उनके लिए एक फिरंगी उस्तानी भी बहाल की.

मिस रोज़ वेरी टॉमस नाम की यह बुढ़िया बहुत ख़ुशमिज़ाज और गाने-बजाने तथा नाटक-नौटंकी की शौकीन थी. बताते हैं कि राधेलाल में संगीत और सुरा का शौक इसी बुढ़िया ने पैदा किया. उसका तो यहाँ तक दावा है कि सुंदरियों का शौक भी राधेलाल को इसी बुढ़िया से मिला था और वही उसके जीवन में आई हुई पहली सुंदरी थी.

चित्रांकन-हरीश परगनिहा

राधेलाल अपने परिवार में फिरंगी भाषा ही नहीं, फिरंगी विद्या सीखे हुए भी पहले व्यक्ति थे. उन्होंने ओवरसियरी का इम्तिहान पास किया और सार्वजनिक निर्माण विभाग में नौकरी पाकर अच्छी कमाई की. अपने दादा, अपने बाप की कमाई में अपनी कमाई जोड़कर वह ब्राह्मण होते हुए भी रंगकंगाली के रईसों की बिरादरी में शामिल हो गए.

भोगी के रूप में अपना जीवन उन्होंने 10 वर्ष की कच्ची उम्र में शुरू किया और अपने जीवन के 40वें वर्ष तक वह अपनी इंद्रियों की भूख तरह-तरह से मिटाते रहने को ही जीवन का पहला और अंतिम लक्ष्य मानते रहे. उन्होंने रंगकंगालों की इस मान्यता को पुष्ट किया कि तीसरी पीढ़ी धन उड़ा देती है और धरोहर में मिला पैसा घोर विलास का रास्ता खोलता है.

जिसे सामान्य रंगकंगाल ने राधेलाल जी की विलासिता का सबूत मानते थे, उसे रंगकंगाली के कलाकार और कला-प्रेमी उनकी रसिकता गुण-ग्राहकता और कलात्मकता की निशानी ठहराते थे. राधेलाल जी स्वयं बहुत खूबसूरत थे, लेकिन उन्हें सुंदरता का संग्रह करने का बेहद शोक था. देसी-विदेशी चित्रकला और मूर्तिकला के सुंदर नमूने वह अपने संग्रहालय में रखते थे.

कहा जाता है कि उन्हें घूस देने के सिलिसले में रंगकंगाली के ठेकेदार तक कला-मर्मग्य हो उठे थे. राधेलाल जी ने स्थानीय चित्रकारों और मूर्तिकारों को बहुत प्रोत्साहित किया. उन्होंने उनसे न केवल परंपरागत रंगकंगाल शैली की कृतियाँ बनवाई, बल्कि फिरंगी कलाकृतियाँ दिखाकर उनकी नकलें बनाने को भी कहा. आज रंगकंगाली आधी भारतीय और आधी यूरोपीय शैली की जिस कला के लिए जानी जाती है, उसका जन्म राधेलाल जी की ही प्रेरणा से हुआ.

राधेलाल जी स्वयं भी चित्रकार बनने की बहुत कोशिश की. कला मे भी उन्हें श्रृंगारिक और रत्यात्मक कला ही अधिक पसंद थी और वह चाहते थे कि उनकी परिचित सुंदरियों के निर्वसन चित्र उनके पास हों. अपनी सुंदरियों को किसी और कलाकार को निर्वसन आंकदे दें, यह उन्हें स्वीकार नहीं था. इसीलिए उन्होंने स्वयं ही उनके चित्र आंकने का उद्यम किया.

दुर्भाग्य से इस आयोजन में वह अधिक सफल नहीं हो पाए उनकी विफलता का कारण कुछ लोग यह बताते हैं कि वह बहुत ही बेकार से चित्रकार थे और कुछ लोग यह कि वह बहुत ही कामुक व्यक्ति थे और अपनी नायिका को निर्वसन देखने के बाद उन्हें चित्रकला की सुध नहीं रहती थी.

राधेलाल जी की रखैलों की संख्या रंगकंगालों के अनुसार एक हज़ार से कुछ ऊपर थी. इनमें सभी उम्र और हर आकार-प्रकार की मादाएं शामिल थीं. इसके अतिरिक्त उन्होंने पाँच विवाह किए. अनेक ऐसी स्त्रियों से भी उनके शारीरिक संबंध रहे, जिन्हें सार्वजनिक रूप से पत्नी या रखैल का दर्जा़ देना सामाजिक मान्यताओं के अनुसार उनके लिए असंभव था आश्चर्य कि राधेलाल जी की इतनी देर सारी औरतों में से केवल राज्यों को ही रंगकंगाली में याद किया जाता है.

 गंगादेवी के अनुसार- कोई रंडी-टंडी, रखैल-ठखैल नहीं थी जी यह रज्जो. एक ऊँचे खानदान में जन्मी और एक ऊँचे खानदान में ब्याही हुई ख्तरन थी. शौखीन मिज़ाज ज़रूर थी बिचारी. अच्छा पहनना-ओढ़ना चाहवे थी. ख़ूब नाचना-गाना चाहवे थी. देखने में भी ऐसी खूबसूरत मानो इंद्रलोक की अप्सरा हो. गोरी-चिट्टी तो ख़ैर थी ही, कहै भी हैं कि ख्तरन से गोरी, तो पिंड रोगी. छुआ, मैली हो जाए

रज्जो, जिसका पूरा नाम राज राजेश्वरी था, राधेलाल जी की ब्याहता स्त्री नहीं अंतिम रखैल थी. रज्जो रंगकंगालों के लिए एक मिथक नायिका का दर्जा़ रखती है और रंगकंगाल अपनी आदत से लाचार उसके विषय में किसी एक बात पर भी सहमत नहीं हो पाते. वह रुमसी थी या नहीं, इसको लेकर भी झगड़ा हो जाता है. अपने पूर्वजों से सुनी बातों के आधार पर बहुत से लोग यह फतवा दे देते हैं कि रज्जो देखने-सुनने में बहुत मामूली थी. राधेलाल उस पर आसक्त हो गए तो इसीलिए कि वह उम्र में उनसे बहुत छोटी थी और उनकी तरह ही एक भले खानदान की लड़की थी. उसे बिगाड़ने के शौक में ही वह उसके चंगुल मं फंग गए. उधर कुछ लोगों का कहना है कि रज्जो बेहद खूबसूरत थी और उसे बिगाड़ने के लिए राधेलाल जी को जरा भी मेहनत नहीं करनी पड़ी.

मैं ख़ुद रंगकंगाली की सबसे बूढ़ी महिला गंगा देवी की गवाही को ज़्यादा वजन देना चाहूँगा. क्योंकि भले ही ख़ुद उन्होंने राज्यों को अपनी आँखों से न देखा हो, कम से कम उनकी माँ ने तो देखा था. अन्य लोग तो दादा-परदादा के हवाले से अपनी बात कहते हैं. गंगादेवी के अनुसार- कोई रंडी-टंडी, रखैल-ठखैल नहीं थी जी यह रज्जो. एक ऊँचे खानदान में जन्मी और एक ऊँचे खानदान में ब्याही हुई ख्तरन थी. शौखीन मिज़ाज ज़रूर थी बिचारी. अच्छा पहनना-ओढ़ना चाहवे थी. ख़ूब नाचना-गाना चाहवे थी. देखने में भी ऐसी खूबसूरत मानो इंद्रलोक की अप्सरा हो. गोरी-चिट्टी तो ख़ैर थी ही, कहै भी हैं कि ख्तरन से गोरी, तो पिंड रोगी. छुआ, मैली हो जाए. आँखें बड़ी-बड़ी और नाक लंबी पतली. कद लम्बा और देह भरी-भरी.

बाप विचारी का बचपन में ही गुजर गया था और माँ बड़ी मुश्किलों से परिवार को पाल रही थी. तो जी कच्ची ही उमर में उसने रज्जो खाते-पीते खानदान में एक बूढ़े से ब्याह दी. बूढ़े के पैसों पर उसे छोटे भाइयों की नज़र थी जी. इस मारे वो निपूते बूढ़े से सादी कर लेने से बहुत नाख़ुश हुए मन ही मन उन्होंने रज्जो को बिगाड़ने की कोशिश की और उससे बात ना बनी तो बदनाम करके की कोशिश की. रज्जो के लौंडा हुआ तो उन्होंने कही कि यह हमारे भाई का नहीं है. रज्जो बिचारी ऐसी अभावन थी कि इधर पेट से हुई और ऊधर उसके आदमी ने खाट पकड़ ली. लौंडे के जन्म से महिना भर पहले ही चल बसा. उसके भाइयों ने अपने विधवा भाबी को धक्के मारके घर से बाहर निकाल दिया.’’

गंगा देवी के अनुसार ससुराल से निकाली गई विधवा रज्जों को मायके में भी जगह नहीं मिली. बिचारी मजबूर होकर मिशन अस्पताल में फिरंगी डाक्टरनी के यहाँ चली गई. कुछ अन्य रंगकंगालों का कहना है कि मिशन अस्पतालों में राज्जो गई ही इसलिए कि उसका वहाँ के एक कंपाउंडर से कुछ चक्कर था और यह कंपाउंडर उसके मायके के पड़ोस में रहा करता था. जो हो, इसमें संद्रह नहीं कि रज्जो ने मिशन कंपाउंड में ही अपने पुत्र को जन्म दिया और वहीं उसने लिखना-पढ़ना और गाना-बजाना सीखा. वह स्वयं खतरन से ब्रितानी हो गई कि नहीं, इस बारे में रंगकंगालों मं मतभेद है. लेकिन कुल मिलाकर गंगा देवी का यह कथन ही सही प्रतीत होता है कि मिशन वालों के साथ रहने के बावजूद रज्जो न ख़ुद ब्रिसतान बनी और न उसने अपने बेटे का बपतिस्मा करवाया. वो तो बड़ा होकर ख़ुद ही ख्रिसतान बन गया.

चित्रांकन-हरीश परगनिहा

रज्जो बिगड़ी भले न हो, बदनाम पूरी तरह हो चुकी थी. उसके रूप यौवन के और गायन-नर्तन के बहुत चर्चे थे. उसने सेंधिया घराने के एक गायक फत्तू से जो कि आफताबेमौसकी रज्जू का नवासा था और मिशन कंपाउंड की लड़कियों को देसी तर्ज पर प्रार्थनाएं सिखाने आया करता था, बाकायदा शास्त्रीय संगीत की तालीम ली. राधेलाल जी को इस रूपसी के विषय में कुतूहल हुआ हो तो कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि वह रूप के पुजारी ही नहीं, संगीत के साधक भी थे और चित्रकला में विफल हो जाने के बाद संगीतज्ञ के रूप में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे. उन्होने उस्ताद हश्मत अली उर्फ हश्शू से गंडा बंधवाया था. जो बैनदिया घराने से ताल्लुक रखते थे.

बैनदिया और सैनदिया घरानों में आपस में बहुत लगती थी और हमेशा एक होड़ का सा भाव रहा करता था. अगर गंगा देवी की बात सच मानी जाए तो इसी तरह की एक होड़ राधेलाल और रज्जो के बीच भी पैदा हो गई. राधेलाल की बूढ़ी उस्तानी रोज़ मेरी टामस के मिशन की डाक्टरनी की मार्फ्त रज्जो को राधेलाल की रंगीन महफिल में खींच लाने की बड़ी कोशिश की, लेकिन वह आसानी से हत्थे नहीं चढ़ी. वह सेनादिया घराने की थी इसलिए बैनदिया घराने के पाँव पूजने वाले राधेलाल जी से कोई मतलब नहीं रखना चाहती थी.

यहाँ बैनदिया और सैनदिया इन दो घरानों की उत्पत्ति और आपसी झगड़े के बारे में रंगकंगाल संगीतज्ञ सनेही लाल जी कपूर का वक्तव्य उद्धत करने का लोभ सम्बरण नहीं कर पा रहा हूँ. कपूर साहब का कहना है,‘‘बैनदिया घराना भारतीय संगीत को रंगकंगाली की विशिष्ट देन है. इसमें बोलों पर, उनकी मूल भावना पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है. सैनदिया घराना बैनदिया की ही एक उपयासी है. घराने अलग-अलग कैसे हो गए, इसकी एक बड़ी दिलचस्प कहानी है.

बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी के दूसरे दशक में उस्ताद नियाज़ अली खाँ उर्फ नज्जू करके बैनदिया घराने के एक बहुत बड़े गायक हुए, जिनको एक बेटा कल्लू और एक बेटी हुई. कल्लू के साथ-साथ उन्होंने अपने जंवाई नब्बू को बी तालीम दी. कल्लू के कोई आल-औलाद ना हुई और नब्बू के दो बेटे हुए, सद्दू और अज्जू. वालिद के कहने पर कल्लू ने अपने छोटे भांजे अज्जू को गोद ले लिया. तो अज्जू ने ननिहाल में अपने मामा और नाना से तालीम हासिल की और सद्दू ने अपने में वालिद से. सद्दू अज्जू के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा तैयार और जीवटदार गवैया निकला. लेकिन उस्ताद नज्जू खां ने अज्जू को ही आगे बढ़ाया और बैनदिया घराने की बागडोर उसे ही सौंपी. होते-होते सद्दू के वंशज पूरी तरह उपेक्षित कर दिए गए.

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