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गुरुवार, 30 मार्च, 2006 को 13:01 GMT तक के समाचार
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मनोहर श्याम जोशी - अध्याय का अंत

दाह संस्कार
जोशी की म़त्यु को एक बड़ी क्षति के रूप में देखा जा रहा है
'बुनियाद' और 'हमलोग' जैसे धारावाहिक, 'हे राम' जैसी फ़िल्में और 'हमजाद', 'कुरू-कुरू स्वाहा' जैसे उपन्यासों के लेखक, जाने-माने साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी अब हमारे बीच नहीं रहे.

उनके प्रशंसक उनकी मृत्यु को हिंदी साहित्य, कला जगत और पत्रकारिता के क्षेत्र में एक अध्याय के अंत के रूप में देख रहे हैं.

दिल्ली स्थित निगमबोध घाट पर जब उनके पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दी गई तो तमाम साहित्यकारों, पत्रकारों और उनके प्रशंसकों ने उन्हें कुछ इस तरह से याद किया.

आइए, जानते हैं उन्हीं लोगों की ज़बानी-

अब यह तो कहना बड़ा मुश्किल है कि उनके जाने से कितनी क्षति हुई है. कोई भी जाता है तो वह एक क्षति मान ली जाती है, चाहे वह 10 वर्ष से लिख रहा हो या फिर 20 वर्ष से पर मैं इस तरह से क्षति देखता हूँ कि वह अभी भी लिख रहे थे. वह बहुत से विषयों पर लिखना चाहते थे जिनके बारे में उनसे बातचीत भी होती रहती थी पर अब वह विषय और विमर्श अधूरे ही रह जाएंगे.

यह किसी मुहावरे के रूप में क्षति नहीं है बल्कि सचमुच में उनका जाना एक क्षति है और कई चीज़ों को अधूरा छोड़ गया है. वह अपने आख़िरी वक्त तक काफ़ी तैयार और ऑर्गनाइज़्ड रहते थे. उनमें तरह-तरह के काम कर सकने का एक प्रशिक्षण और अनुशासन था. दूरदर्शन जगत में तो उन्होंने अपनी पटकथाओं से एक क्रांति कर ला दी थी.

राजेंद्र यादव

उनकी हिंदी साहित्य में बिल्कुल अलग है और पत्रकारिता में दूसरी तरह की है. अलग-अलग क्षेत्रों और लोगों की भाषा का प्रयोग उन्होंने किया है. भाषा की पकड़ उनसे ज़्यादा हम लोगों में से किसी में नहीं है. हम लोग उसके सामने थोड़े छोटे हैं.
राजेंद्र यादव, संपादक-हंस

वह लिखते ज़्यादा थे और छपवाते कम थे. उनकी पहली पुस्तक 50 बरस की उम्र में छपी थी. मेरी तो 25 बरस के होने पर ही छप गई थी और आजकल तो 18 वर्ष के लोग ही पुस्तक छपवा लेते हैं. उन्होंने जहाँ-जहाँ काम किया, वहाँ-वहाँ हिंदी की क्षमता और विविधता को बढ़ाने का एक नया और सक्षम नमूना पेश किया.

चाहे धारावाहिकों में देखें या फिर पत्रकारिता में, भाषा का प्रयोग, मुहावरे को तोड़कर कुछ कह देना, भाषा का सही और सटीक प्रयोग करना उनका बख़ूबी आता था और उनकी निर्भीकता भी उनकी एक ख़ास पहचान थी. व्यर्थ की गंभीरता ओढ़े रहने की हिंदी साहित्यकारों की आदत से वह मुक्त थे.

उनको जो सम्मान मिले, वह कुछ देर से मिले और अकादमी पुरस्कार उन्हें अब मिला जबकि वह तो कुरू-कुरू स्वाहा के समय ही मिल जाना चाहिए था पर इसको लेकर उनके मन में कोई मलाल नहीं था. न तो कोई आकांक्षा थी और न इसको लेकर कोई क्लेश था. पुरस्कार वगैरह तो अब व्यर्थ के अलंकरण हो गए हैं. इनके न मिलने से किसी की प्रतिष्ठा कम नहीं होती.
अशोक वाजपेयी, साहित्यकार और आलोचक

वह 'हिंदुस्तान' के संपादक भी थे. भाषा के माध्यम से उन्होंने न केवल एक साहित्यकार थे बल्कि एक युवा वैज्ञानिक के तौर पर भी उनका चयन हुआ था.

साहित्यकार

उन्होंने प्रचलित मीडिया के लिए काम किया पर इस दौरान अपनी रचनात्मकता में कहीं पर कमी नहीं आने दी. मुझे याद आता है कि अपने आख़िरी धारावाहिक को उन्होंने इसीलिए छोड़ दिया था क्योंकि वहाँ उनकी रचनात्मकता को बाधित करना शुरू कर दिया गया था.

हालांकि वह इस मामले में काफ़ी व्यावहारिक थे पर हर चीज़ की एक सीमा होती है. साहित्य को तो उनका योगदान काफ़ी अलग और बेहतर किस्म का था. उन्होंने हमेशा इस बात की कोशिश की कि किस तरह से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचा जाए.
विष्णु नागर, संपादक-कादंबिनी

साहित्य में महिला विमर्श को लेकर जोशी जी ने जो लिखा, वह सही अर्थों में जिस तरह का विमर्श हंस ने चलाया, उससे बिल्कुल अलग था. वैसे भी वह कटाक्ष के लेखक थे. उनके उपन्यासों में स्त्री एक प्रतीक के रूप में दिखती है. इसमें कोई शक नहीं कि 'कसप' जैसे उपन्यास में 'बेबी' का जो चरित्र उन्होंने गढ़ा है, उसमें कहीं न कहीं उस पात्र को वह आज़ादी दी गई है, जो आमतौर पर पहाड़ी कुटुम्बों में नहीं होता है.

चित्रा मुदगल

स्त्री विमर्श से ज़्यादा वह सामाजिक विषयों के लिए याद किए जाएंगे. उनके धारावाहिकों और लेखन में हमें निम्न-मध्यमवर्गीय स्त्री नज़र आती है. विभाजन की त्रासदी से बच्चों के सपने और शराबी पति को संभालना, ऐसे कितने ही बिंब हैं मनोहर जी के धारावाहिकों के और यह हर तरह के दर्शकों को प्रभावित करते हैं.

उनका बहुआयामी योगदान रहा है. नेताजी कहिन हैं की बात करें या फिर उनके लेखों की, उनकी जगह को भरने में काफ़ी वक्त लगेगा.
चित्रा मुद्गल, साहित्यकार

मुझे व्यक्तिगत रूप से भी और हमारे प्रकाशन को भी क्षति हुई है. उनका एक बड़ा पाठक वर्ग था और वह राजनीतिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर लिखते रहे हैं. उनमें ज़्यादातर देखेंगे तो सामाजिक मूल्यों की बातें होती थीं. एक व्यापक कैनवास और बड़ी दृष्टि के साथ उन्होंने लिखा.

सामान्य तौर पर लोगों को विदेशी पुस्तकें और पत्रिकाएं पढ़ने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी क्योंकि उनका निचोड़ वह हमें दिया करते थे. हो सकता है कि टाइम जैसी पत्रिका में जो लेख आप आज पढ़ रहे हों, उसपर वह छह महीने पहले ही कुछ लिख चुके हों.
आलोक मेहता, संपादक- हिंदी आउटलुक साप्ताहिक

उनकी पत्रकारिता बड़ी गंभीर पत्रकारिता थी और उनके साप्ताहिक में अज्ञेय जैसे लोग लेख लिखते थे. 'दिनमान' में जिस तरह का काम उनका रहा है, वह गंभीर और सिद्धांतो-मूल्यों वाली पत्रकारिता थी.

पत्रकारिता जगत में अपने अंतिम दौर में जो उन्होंने लिखा, मैं उसे भी एक साहित्य के तौर पर देखता हूँ. उन्हें भाषा के साथ खेलना आता था और उनको यह महारत हासिल थी कि जो जैसा चाहे, उस तरह से भाषा का इस्तेमाल कर सके.

मुझे नहीं लगता कि हमारे वर्ग के किसी पत्रकार या साहित्यकार को यह हुनर हासिल है.
ओम थानवी, संपादक-जनसत्ता

मनोहर श्याम जोशी जी मेरे चाचा के बेटे थे और मेरे बड़े भाई थे. हमने उनके साहित्य को हमेशा सराहा और वह ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने विभिन्न विधाओँ में महारत हासिल की.

कमलेश्वर और मुरली मनोहर जोशी

राजनीतिक व्यंग्य तो ऐसे लिखे कि उनपर धारावाहिक भी बने और आज भी याद किए जाते हैं. मैं नहीं जानता कि ऐसा साहित्यकार दोबारा कैसे मिल सकेगा.

उनके दिवंगत होने से हमें पारिवारिक क्षति तो हुई ही है पर साहित्य जगत को जो नुकसान हुआ है, उसका पूरा होना तो निकट भविष्य में संभव नहीं दिखता.

हमारे बीच विभिन्न विचारों का आदान-प्रदान भी होता रहा है गहरी समझ हम दोनों में थी इसलिए कोई ऐसा द्वंद जैसा शब्द उनके स्वभाव में ही नहीं था.
मुरली मनोहर जोशी, भाजपा नेता और मनोहर श्याम जोशी के रिश्तेदार

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